क़िस्सा मुख़्तसर : जब फ़ैज़ से मिली शबाना आज़मी ...

क़िस्सा मुख़्तसर : जब फ़ैज़ से मिली शबाना आज़मी ...फैज़ अहमद फ़ैज़ और शबाना आज़मी

फ़ैज़ उन दिनों मॉस्को फ़िल्म फ़ैस्टिवल में शिरकत कर रहे थे। वहां शबाना आज़मी समेत हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की भी तमाम हस्तियां मौजूद दी। शबाना को जब 'फैज़ चाचा' के वहां होने के बारे में पता चला तो उन्होने मिलने की ख़्वाहिश ज़ाहिर करते हुए ख़त भेजा। फ़ैज़ साहब, अपने ख़ास दोस्त क़ैफी आज़मी की बेटी शबानी आज़मी को उनके बचपन से जानते थे, बल्कि गोद में खिलाया था। फ़ैज़ साहब ने शाम के वक्त मिलने को कहा। एक तवील अर्से के बाद होने वाली उस मुलाक़ात को लेकर शबाना बहुत खुश थीं।

शाम के वक्त शबाना उनसे मिलने पहुंची। लंबे वक्त के बाद हुई मुलाक़ात से फ़ैज़ साहब भी खुश हुए। थोड़ी देर बाद बातचीत के दौरान फैज़ साहब ने एक काग़ज़ का टुकड़ा उनकी तरफ बढ़ाते हुए कहा "ये कुछ नए शेर हुए हैं, पढ़ो तो ज़रा" शबाना ने सर खुजलाते हुए कहा "फ़ैज़ चाचा मैं .. उर्दू ...नहीं पढ़ पाती"। वो अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए बोले, "क्या मतलब है तुम्हारा" अपने खास दोस्त पर गुस्सा ज़ाहिर करते हुए बुदबुदाए "तुम्हारे अब्बा की ख़बर लेता हूं मैं, मिलने दो अबकि" शबाना ने सफाई देते हुए कहा "नहीं.. नहीं ऐसी बात भी नहीं है, मैं शायरी समझती खूब हूं.. आपके कई शेर तो मुझे ज़बानी याद हैं.. जैसे कि.. वो...वो" फैज़ कुर्सी पर बैठ गए और सिगरेट जला ली। शबाना की तरफ यूं देखने लगे जैसे शेर का इंतज़ार कर रहे हों। शबाना ने कहा

"देख कि दिल से कि जां से उठता है,

ये धुआं सा कहां से उठता है"

फैज़ साहब ने एक लंबा कश लिया और बोले - "हम्म, लेकिन ये शेर तो मीर का है", शबाना के माथे पर पसीने की बूंदे आ गई, बोली - "सॉरी वो, वो, मैं भूल गई नर्वसनेस में.. ये तो मीर का ही है, आपका तो वो शेर है ना, वो-

"बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो ना थी"

उन्होने सिगरेट ऐशट्रे में रखी और कान खुजाते हुए बोले, "भई मीर की हद तक तो ठीक था लेकिन बहादुर शाह ज़फ़र को मैं शायर नहीं मानता"

एक इंटरव्यू में बक़ौल शबाना आज़मी

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