किस्सागोई: उसकी आवाज से तो दुनिया वाकिफ है, उसकी ऊंगलियों का जादू क्या जानते हैं आप?

किस्सागोई: उसकी आवाज से तो दुनिया वाकिफ है, उसकी ऊंगलियों का जादू क्या जानते हैं आप?आपको जानकर ताज्जुब होगा कि भूपिंदर सिंह बेहद शानदार गिटारिस्ट भी हैं

साल 1962 की बात है। आकाशवाणी दिल्ली के एक अधिकारी के सम्मान में एक समारोह का आयोजन किया गया था। इस सम्मान समारोह में करीब 21-22 साल के एक लड़के ने कुछ गाने गाए। उसकी आवाज में एक अलग ही नशा था। जाने-माने संगीतकार मदन मोहन भी उस सम्मान समारोह में थे। उन्हें उस नौजवान गायक की आवाज इतनी पसंद आ गई कि उन्होंने उसी वक्त उसे मुंबई आने का न्यौता दे दिया।

कुछ ही समय बाद वो नौजवान कलाकार मुंबई पहुंच गया और अगले ही साल उसने एक सुपरहिट फिल्म का सुपरहिट गाना गाया। उस गायक को आज पूरी दुनिया जानती है। दिलचस्प बात ये कि उस गायक में छिपे एक दूसरे कलाकार को बहुत कम लोग जानते हैं। आज किस्सागोई में हम उस गायक के भीतर छिपे दूसरे कलाकार को खोजेंगे। इस खोज को शुरू करने से पहले आपको सत्तर और अस्सी के दशक के कुछ ‘पॉपुलर’ और ‘सुपरहिट’ गानों की याद दिलाना बहुत जरूरी है।

जिस कलाकार के लिए नौशाद साहब कहते थे- ‘उसके आस-पास कोई नहीं है’

फिल्म- यादों की बारात का वो गाना आपको याद ही होगा- ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’। इसके अलावा फिल्म- हरे रामा हरे कृष्णा का ‘दम मारो दम’, फिल्म- शोले का ‘महबूबा-महबूबा’, फिल्म- अमर प्रेम का चिंगारी कोई भड़के। इन सभी गानों में गिटार के इस्तेमाल को याद कीजिए। आपका दिल खुश हो जाएगा। इन लाजवाब गानों में गिटार बजाने वाले कलाकार का नाम है भूपिंदर सिंह। जी हां वही भूपिंदर सिंह जिन्हें हम एक बेहद सम्मानित गायक के तौर पर जानते हैं। पत्नी मिताली सिंह के साथ जिनकी जोड़ी ग़ज़ल गायकी में भी बहुत मशहूर है।

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आपको जानकर ताज्जुब होगा कि भूपिंदर सिंह इतने शानदार गिटारिस्ट हैं कि उनके बारे में मशहूर संगीतकार नौशाद साहब कहा करते थे कि “जहां गिटार की बात आती है वहां भूपिंदर के आस-पास भी कोई पहुंच नहीं सकता है।” भूपिंदर सिंह ने आरडी बर्मन, खय्याम साहब और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जैसे धुरंधर संगीतकारों के साथ फिल्मों का बैकग्रांउड म्यूजिक तैयार किया। बतौर गिटारिस्ट भूपिंदर सिंह ने जब फिल्म हंसते जख्म में ‘तुम जो मिल गए हो तो ये लगता है’ गाने में गिटार बजाया तो पूरी इंडस्ट्री ने गिटार पर उनकी ऊंगलियों का लोहा मान लिया था।

अब जिस सुपरहिट फिल्मी गाने का जिक्र हमने शुरुआत में किया था उसकी कहानी सुनाते हैं। 1964 में एक फिल्म आई थी हक़ीक़त। फिल्म के डायरेक्टर थे चेतन आनंद। भारत-चीन की 1962 की लड़ाई की पृष्ठभूमि में बनाई गई इस फिल्म में बलराज साहनी, धर्मेंद्र, विजय आनंद जैसे अभिनेता थे। फिल्म के गीत कैफी आजमी ने लिखे थे और संगीत मदन मोहन का था। उस फिल्म में एक गाना था- ‘होके मजबूर तुझे उसने बुलाया होगा।’ जो बेहद लोकप्रिय हुआ। इस गाने को गाने वाले गायकों में मोहम्मद रफी, तलत महमूद, मन्ना डे जैसे दिग्गज गायक थे। इनके साथ-साथ एक और नए कलाकार ने वो गीत गाया था और उस कलाकार का नाम है- भूपिंदर सिंह। इसी गाने को गवाने के लिए ही मदन मोहन ने भूपिंदर को मुंबई आने का न्यौता दिया था।

भूपिंदर सिंह के बचपन के बारे में ये किस्सा बहुत मशहूर हैं कि पिता का अनुशासन ऐसा था कि भूपिंदर को एक समय संगीत से चिढ़ होने लगी थी। बाद में वो दोबारा संगीत से जुड़े। दिलचस्प बात ये भी है कि एक से एक हिट गाने देने के बाद भी उन्होंने फिल्गी गानों का मोह बहुत आसानी से छोड़ दिया। उनके लिए हमेशा गानों के बोल बहुत मायने रखते थे।

इसके बाद भूपिंदर ने हिंदी फिल्मों में एक से बढ़कर हिट गाने गाए। ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन’, ‘एक अकेला इस शहर में रात में और दोपहर में’, ‘नाम गुम जाएगा’, ‘करोगे याद तो’, ‘मीठे बोल बोले’, ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां’, ‘किसी नजर को तेरा इंतजार’ जैसे फिल्मी गीत और गजलें अब भी कान में गूंजते रहते हैं। इतने कामयाब और हिट गाने देने के बाद भी फिल्मी इंडस्ट्री ने भूपिंदर सिंह को बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दीं। एक इंटरव्यू में भूपिंदर सिंह ने कहा था उस दौर में फिल्म इंडस्ट्री में इतने दिग्गज गायक थे कि उसमें अपनी जगह बनाना आसान नहीं था। ये बात सौ फीसदी सच है। बाद में भूपिंदर सिंह ग़ज़ल गायकी की दुनिया में आ गए। 1980 में ‘वो जो शायर था’ में गुलजार साहब ने नज़्म और गज़ल लिखीं, जिसे भूपिंदर सिंह ने गाया।

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भूपिंदर सिंह का जन्म 6 फरवरी 1940 को पंजाब के शहर अमृतसर में हुआ था। पिता प्रोफेसल नत्था सिंह खुद गायक थे। उनके बचपन के बारे में ये किस्सा बहुत मशहूर हैं कि पिता का अनुशासन ऐसा था कि भूपिंदर को एक समय संगीत से चिढ़ होने लगी थी। बाद में वो दोबारा संगीत से जुड़े। दिलचस्प बात ये भी है कि एक से एक हिट गाने देने के बाद भी उन्होंने फिल्गी गानों का मोह बहुत आसानी से छोड़ दिया। उनके लिए हमेशा गानों के बोल बहुत मायने रखते थे। वो सस्ती चीजें गाने को बिल्कुल तैयार नहीं थे। इसकी शायद एक बड़ी वजह यह रही कि भूपिंदर सिंह गुलजार साहब के बहुत बड़े मुरीद थे। इन्हीं सारी वजहों के चलते भूपिंदर सिंह धीरे-धीरे करके फिल्मी गायन से दूर होते चले गए।

जगजीत सिंह से मिलती जुलती भूपिंदर की कहानी

भूपिंदर सिंह की जिंदगी में काफी कुछ चीजें जगजीत सिंह से मिलती- जुलती हैं। जगजीत सिंह की तरह ही वो भी सिख परिवार में पैदा हुए थे। जगजीत सिंह की तरह उनकी भी जीवनसाथी बांग्ला लड़की ही बनी। जगजीत सिंह की तरह ये जोड़ी भी गायन से जुड़ी। भूपिंदर सिंह ने बांग्लादेशी गायिका मिताली से अप्रैल 1983 में शादी कर ली। भूपिंदर और मिताली की मुलाकात कैसे हुई, ये जानना भी जरूरी है। भूपिंदर ने मिताली को दूरदर्शन के कार्यक्रम आरोही में सुना। उन्होंने कहा कि ऐसी आवाज मैंने पहले नहीं सुनी थी। मिताली भी संगीत से जुड़े परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उन्हें उनके भाई ने भूपिंदर का एक बांग्ला गाना सुनवाया था जिसके बाद से वो भूपिंदर की आवाज को पसंद करने लगी थीं। पहली बार मिलने पर जब मिताली ने अपना परिचय दिया, तो भूपिंदर ने कहा कि हां, मैं आपको जानता हूं। आपको मैंने दूरदर्शन पर सुना है। बगैर देखे हुआ प्यार मिलने के बाद परवान चढ़ा और फिर शादी हो गई। मिताली के एक जन्मदिन पर उनके लिए भूपिंदर ने खासतौर पर एक गीत तैयार किया – यादों को सरेशाम बुलाया नहीं करते।

भूपिंदर-मिताली को देख शादी-शुदा जोड़े को मिली सीख

उनका प्यार और संगीत दूसरों की जिंदगी पर भी असर करता रहा है। कनाडा की एक घटना है। साल था 1991। भूपिंदर और मिताली की पसंदीदा गजलों में एक है – शमा जलाए रखना, जब तक कि मैं न आऊं....। उन्होंने स्टेज परफॉर्मेंस में ये गाई। इसके बाद एक भारतीय जोड़ा स्टेज पर आया। उन्होंने कहा कि हम तलाक लेने वाले थे लेकिन ये गजल और आप दोनों को देखकर हमने तय किया है कि अपनी शादी को एक मौका और देंगे।

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