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मोदी सरकार ने विकास का फोकस एडजस्ट किया

मोदी सरकार ने विकास का फोकस एडजस्ट कियागाँव कनेक्शन

मोदी सरकार ने आते ही विकास का शंखनाद किया था जिसके फोकस में था एफडीआई, मेक इन इंडिया, औद्योगीकरण, चमचमाते शहर, हवा से बातें करती रेलगाड़ियां और चमकती सड़कें लेकिन आर्थिक प्रबन्धन यानी बैंकिंग सिस्टम में सुधार और धन की उपलब्धता के बिना यह सब कैसे होगा। बैंकें लुट चुकी हैं, लुटेरे बाहर भाग रहे हैं और विदेशों का काला धन वापस आने का नाम नहीं ले रहा है, स्वदेशी कालाधन मुस्तंड हो रहा है। सरकार बचाने का एक ही उपाय है पुरानी सरकारों की तरह गरीब गुरबा की ढफली बजाओ।

वाजपेयी सरकार की दूरगामी योजनाओं जैसे सड़कों का स्वर्णिम चतुर्भुज, नदियों को आपस में जोड़ने का काम, मनरेगा को कृषि से सम्बद्ध करना आदि के साथ ही बुलेट ट्रेन, अत्याधुनिक शहरों का निर्माण, आईटी यानी इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, मैनुफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा, स्किल विकास और वे तमाम बातें जो अटलजी की सरकार करना चाहती थी, मोदी के एजेंडा में थीं लेकिन वोटर तुरन्त राहत चाहता है जैसे असम से घुसपैठिए बाहर करना और भविष्य में न आने पाएं इसका प्रावधान करना तथा बाढ़ पर नियंत्रण। बात बन गई। 

पुरानी सरकारों द्वारा आरम्भ की गई योजनाएं अधूरी पड़ी हैं। कितनी ही सड़कें, पुल, ओवरब्रिज, अस्पताल, मंडीघर, कारखाने और विद्यालय जिनका शिलान्यास हो चुका है, काफी काम पूरा हो चुका है, सरकार बदलने से उनके प्रति नजरिया बदल गया है। अगर नेताओं की मूर्तियां अधूरी रह जाएं तो कोई विशेष बात नहीं होगी मगर जनहितकारी योजनाओं के विषय में भ्रम नहीं होना चाहिए, वे नहीं रुकनी चाहिए। विकास के मामले में महात्मा गांधी का नजरिया बिल्कुल साफ था, वह ग्राम स्वराज्य के पक्षधर थे, गाँवों का विकास पहले चाहते थे। हम तथाकथित नेहरूवियन विकास मॉडल से चिपके रहे जब तक सारी दुनिया में रूसी मॉडल फेल नहीं हो गया। 

खेत-खलिहान को नजरअन्दाज करना देश को बहुत महंगा पड़ा, देश भुखमरी के कगार पर आ गया। जब चीन जैसा देश सत्तर के दशक में उदारीकरण की डगर पकड़ रहा था तो इंदिरा गांधी ने समाजवादी शिकंजा कसते हुए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, पटेल का सरकारी वादा झुठलाकर प्रिवी पर्स समाप्त किया और उद्योग-धंधों को सरकारी नियंत्रण में ले लिया। सभी उद्योग घाटे में चलते रहे और आर्थिक हालात बहुत बिगड़े। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए विकास का फोकस बदलना देश के लिए अहितकर हो गया। 

कांग्रेस की विकास की योजनाओं का फोकस काम पर कम, नाम पर अधिक था। इन योजनाओं में प्रमुख हैं जवाहर रोजगार, जवाहर नवोदय विद्यालय, नेहरू रोजगार, इंदिरा आवास, इंदिरा मातृत्व सहयोग, इंदिरा गांधी पेंशन, इंदिरा गांधी विवाह शगुन, राजीव गांधी जीवनदायी आरोग्य, राजीव गांधी उद्यमी मित्र, राजीव आवास, राजीव गांधी ग्राम विद्युतीकरण और राहुल गांधी व्यक्तित्व विकास आदि। ऐसी योजनाएं नाम के लिए थीं और नाम की ही रह गईं।

कुछ सरकारों ने खैरात बांटने को ही विकास माना जैसे टीवी, लैपटॉप, साड़ियां, कम्बल, साइकिलें, किसानों को मुफ्त में पानी, बिना पैसे की बिजली, लगान की माफी और ना जाने क्या-क्या सब खैरात में। विकास के दूसरे उपाय सोचे गए कम ब्याज पर किसानों को ऋण, फसली ऋण, खाद-बीज-बैल और ट्रैक्टर खरीदने के लिए ऋण आदि। यह सब ठीक था परन्तु इन्तहा तब हो गई जब यह मान लिया गया कि इस विकास के मॉडल में किसान अपना कर्जा कभी चुका नहीं पाएगा और बैंकों से लिया गया कर्जा ही माफ कर दिया गया। किसान की आदत बिगड़ गई और कर्ज चुकाने का संकल्प और कर्ज लेने की हविश बढ़ गई। ऐसे ही माहौल में पैदा हुए विजय माल्या जैसे लोग जिन्होंने, कहते हैं पांच लाख करोड़ कर्जा लिया है मगर दिया नहीं। वे सब माल्या की डगर पकड़ेंगे।  

एक बार मुलायम सिंह यादव ने सटीक बात कही थी कि ‘‘योजना का शिलान्यास तो करा रहे हो पूरा कब करोगे।” हमारे देश की जनता को इस बात के लिए सरकारों पर दबाव डालना होगा कि नई योजनाओं का शिलान्यास करने के पहले आधी अधूरी पड़ी परियोजनाओं को पूरा किया जाए। विकास के मामले में कुछ निरन्तरता और आम राय होनी चाहिए जैसे विदेश नीति में रहती है। यह बात अटलजी को पता थी और शायद मोदी को भी पता होगी। आशा करनी चाहिए कि लोकप्रिय योजनाओं और राष्ट्र निर्माणकारी परियोजनाओं में सन्तुलन बना रहेगा।     

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