नेता लोग कुछ भी कहें, कृषि तो इन्द्र देवता पर ही निर्भर

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पिछले दो साल से सूखे में झुलस रहा किसान यह सुनकर आंखें खोल ही रहा था कि इस साल अच्छी वर्षा होगी लेकिन दूसरी खबर आ गई कि मानसून आने में विलंब होगा। इधर केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में बाढ़ जैसे हालात बनते-बनते रुक गए हैं। अब समय आ गया है कि पानी के भगवान की मनमानी से बचने के उपाय सोचने ही होंगे। उपाय जिनसे अतिवृष्टि और अनावृष्टि के चक्रव्यूह से बचा जा सके।

राजनैतिक दल सोचते हैं कि वे देश की अर्थव्यवस्था चलाते हैं परन्तु इस देश की अर्थव्यवस्था तो चलाते हैं पानी के भगवान यानी इन्द्र देवता। हमारे वैज्ञानिक भी इन्द्रदेव के द्वारा रचित चक्रव्यूह को तोड़ नहीं सके हैं। 60 के दशक में गाँवों में देश की 80 प्रतिशत आबादी रहती थी लेकिन अनिश्चित आय और शहरों के औद्योगीकरण के कारण अब केवल 70 प्रतिशत रहती हैं, शेष आबादी रोटी-रोजी की तलाश में शहरों को चली गई। आने वाले वर्षों में गाँवों की आबादी और भी घटेगी।

मौसम वैज्ञानिकों के प्रयासों से अब कुछ सीमा तक मौसम का पूर्वानुमान हो पाता है परन्तु वह अनुमान तो अनुमान है। देश के मौसम वैज्ञानिक निरंजन और उनके साथी शोधकर्ताओं ने अपनी रिसर्च का परिणाम 2013 में छापा और इंटरनेट पर उपलब्ध कराया है। इसमें कहा गया है कि 1901 से 2010 के बीच में 21 बार सूखा पड़ा है। सन 2000 से 2002 की अवधि में लगातार सूखा पड़ा था। इस समय भी दो साल से सूखे के हालत हैं।

दूसरे देशों में किसानों की संख्या कम है, अरब देशों में 43 प्रतिशत, मध्य यूरोप में 38 प्रतिशत, यूरो क्षेत्र यानी जहां यूरो सिक्का चलता है वहां 24 प्रतिशत, दक्षिण अमेरिका में 21 प्रतिशत, तेल निर्यातक देशों में 20 प्रतिशत और सारी दुनिया में 47 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं। स्वाभाविक है कि हमारे देश की नीतियों का फोकस खेती पर होना चाहिए था परन्तु नेहरू की नीतियों का फोकस साइंस और टेक्नॉलोजी पर रहा। चीन जैसे देशों ने तकनीकी विकास के साथ-साथ कृषि व्यवस्था को मजबूत किया परन्तु भारतीय सरकारों को गांधी जी का ग्राम विकास का सिद्धान्त याद ही नहीं आया।

साठ के दशक में कृषि का महत्व पहली बार समझ में आया जब अमेरिका से पीएल-480 का गेहूं मांगना पड़ा था। सूखा समाप्त हुआ, हालात सुधरे और हरित क्रान्ति का समय आया और तब की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया। नारा देने से गरीबी हटने वाली नहीं थी और भ्रम टूट गया जब इन्द्रदेव ने बाढ़ का तांडव खेला। 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार ने सूखा और बाढ़ की मिलीजुली मार से बचने के लिए दस्तूर कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार भारत की नदियों को जोड़ने की योजना बनाई जिससे अनवरत पानी मिल सके। 

किसान की खेती के लिए औसत वर्षा का महत्व नहीं है बल्कि महत्व इस बात का है कि कितने कितने अन्तराल पर पानी बरसा। साल की पूरी बरसात में पानी न बरसे और अन्त में घनघोर पानी बरस जाए और औसत पूरा हो जाए तो इससे किसान की फसल का भला नहीं होगा। फसल को बढ़वार के हिसाब से पानी चाहिए, बुवाई के समय, जब पौधों में कल्ले फूट रहे हों, जब दाने पड़ रहे हों या जब जरूरी दिखे लेकिन इन्द्रदेव तो अपने हिसाब से पानी देंगे और असिंचित भूमि में पैदावार इन्द्रदेवता की इच्छानुसार समय-समय पर घटती बढ़ती रहेगी। 

जब खेतों में नहर या ट्यूबवेल का पानी भर दिया जाता है तो पानी की फिजूलखर्ची तो होती ही है फसल को पूरा लाभ भी नहीं मिलता। इस पर पर्याप्त रिसर्च नहीं हुई है कि किसान को प्रभावी सिंचाई के लिए सस्ते दामों पर उपकरण कैसे मिलें। सरकारें भी खैरात बांटते समय इसका ध्यान नहीं रखतीं।

मौसम सम्बन्धी अनुभव के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों के लिए फसलों का निर्धारण होता है। अब मौसम ने अपना धर्म बदल दिया तो हमें भी अपनी रणनीति बदलनी होगी। हमें अध्ययन करना चाहिए कि इजरायल ने कम पानी होते हुए रेगिस्तानी इलाके में किस तरह फसलों और सिंचाई का तालमेल बिठाया और किस तरह अच्छी पैदावार ली। दुनिया में अतिवृष्टि के इलाके भी कम नहीं हैं उनका अनुभव हमारे काम आ सकता है। 

sbmisra@gaonconnection.com

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