मां के स्तनों में तैयार होती है वो दवाई जो किसी मेडिकल स्टोर पर नहीं मिलती, विस्तार से समझिए

बेटी का जन्म होने के बाद मुझे स्तनपान करवाने में बहुत मुश्किल हो रही थी, ऐसा लाखों महिलाओं के साथ होता है। लेकिन मेरी मां और डॉक्टर ने समझाया कि स्तनपान सिर्फ बच्चे के लिए ही नहीं, मेरे लिए भी जरूरी है। मां का दूध कितना जादुई होता है, कैसे बनता है और किस तरह मां व बच्चे दोनों के लिए फायदेमंद है। पढ़ें डियर मां की ये सातवीं किस्त-

मां के स्तनों में तैयार होती है वो दवाई जो किसी मेडिकल स्टोर पर नहीं मिलती, विस्तार से समझिए

डियर मां सीरीज के 7वें भाग में पढ़िए स्तनपान क्यों जरुरी है, मां के स्तन में दूध बनता कैसे है, उसकी अहमितय क्या है।

अगर आप मां हैं, तो इतना जान लीजिए- रियल टाइम मेडिसिन तैयार कर रहा है आपका शरीर, बच्चे के लिए ये किसी अमृत से कम नहीं

मेरी प्रेगनेंसी के नौ महीनों की कहानी आप 'डियर मां' की पिछली किस्‍तों में पढ़ चुके हैं। किस तरह मेरी प्रेगनेंसी के पूरे नौ महीने मुश्किल भरे रहे। किस तरह हमें न चाहते हुए भी सिजेरियन डिलीवरी के लिए तैयार होना पड़ा और किस तरह मैंने एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया। अब बात इसके आगे के सफर की।

वो सफर जो शुरू होता है आपके मां बनने के बाद...

मां बनने के बाद आपकी सबसे पहली और अहम जिम्मेदारी होती है, बच्चे को दूध पिलाना। हॉस्पिटल में तीन दिन रहने के दौरान मैं अपनी बच्ची को ठीक से दूध नहीं पिला पाई थी। मुझे लैक्टेशन एक्सपर्ट ने कुछ टिप्स और ट्रिक्स बताए थे, जिससे मैं सहज होकर दूध पिला सकूं, मगर ये अपने आप में एक मुश्किल भरा काम होता है।

मुझे याद है हॉस्पिटल में डिस्चार्ज के वक्त किस तरह मेरी ब्रेस्ट में मुझे बहुत ज्यादा कसाव और दर्द महसूस हुआ था। तब मेरी डॉक्टर ने मुझसे कहा था, 'बच्चे को दूध जरूर पिलाना है। वरना तुम्हें भी बुखार आ सकता है या फिर ब्रेस्ट में गांठें भी बन सकती हैं। दूध पिलाना सिर्फ बच्चे के लिए ही नहीं, मां के शरीर के लिए भी जरूरी है।'

उस वक्त शायद मैंने डॉक्टर की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था, लेकिन अब मैं बहुत अच्छी तरह समझती हूं कि स्तनपान करवाना कितना अहम होता है।

हॉस्पिटल में नर्स की मदद से थोड़ा बहुत दूध मैं पिला लेती थी, मगर घर आने के बाद वो भी मुश्किल हो गया। मैं चाहकर भी दूध नहीं पिला पा रही थी। बच्ची गोद में आकर भी रोने लगती थी क्योंकि स्तनों से दूध नहीं निकल पा रहा था। बच्ची भूख से परेशान न हो जाए, ये सोचकर मैंने आनन-फानन में पाउडर मिल्क से लेकर ब्रेस्ट पंप तक मंगवा लिया। ऑपरेशन के टांकों की वजह से उठने-बैठने में भी मुझे दिक्कत हो रही थी। उस पर दूध न पिला पाना एक बड़ी परेशानी बन गया था।

उस दौरान मेरी एक सहेली से बात हुई, उसने मुझे बताया कि किस तरह शुरुआत में दूध पिलाने में सिर्फ मां को ही परेशानी नहीं होती, बच्चे के लिए भी ये एक मुश्किल काम होता है। ऐसे में दोनों को एक-दूसरे का सपोर्ट बनना पड़ता है। उसने मुझे बताया कि बच्चा पूरी ताकत लगाकर शुरुआत में दूध नहीं खींच सकता। मुझे एक हाथ से अपने स्तन को दबाकर दूसरे हाथ की उंगलियों से निप्पल को बच्चे के मुंह में डालकर ये प्रैक्टिस करनी होगी। धीरे-धीरे बच्चे को भी समझ आएगा और वो खुद ही दूध पीना सीख जाएगा। इस प्रैक्टिस को लगभग एक हफ्ते तक करने के बाद कहीं जाकर मुझे वो पल मिला, जब बस बच्ची को सीने से लगाना होता था और वो आसानी से दूध पीने लगी।

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कोरोना (covid-19) ने समझाई मां के दूध की अहमियत

ये बात हुई बच्चे की भूख मिटाने के लिए उसे दूध पिलाने की, लेकिन मां का दूध सिर्फ भूख मिटाने वाला भोजन नहीं होता। इस बात को मैंने बहुत गहराई से उस वक्त महसूस किया, जब मैं कोरोना की शिकार हुई। बेटी के जन्म के तीन महीने बाद एक दिन हल्की खांसी, सर्दी और बुखार हुआ। टेस्ट कराया, तो मालूम चला मैं कोरोना पॉजिटिव (covid-19 positive) हूं। एक हाथ में रिपोर्ट थी और दूसरे में बेटी। बेटी को खुद से दूर किया। आंसू नहीं रुके, लेकिन दिमाग जैसे बिल्‍कुल रुक गया। मुझमें कोरोना (Corona) से जुड़े लक्षण साफ नजर आ रहे थे, इसलिए पति और बेटी दोनों को खुद से दूर कर दिया।

मगर तीन महीने के बच्चे को मां से कितना दूर रखा जा सकता है भला! इस बारे में बेटी के डॉक्टर से बात की। उन्होंने कहा- बहुत ध्यान रखना होगा। मास्क नियमित रूप से लगाना है। ग्‍लव्‍स पहनकर ही बच्चे को उठाएं और दूध पिलाकर खुद से अलग रखने की कोशिश करें। दो दिन तक ठीक ऐसा ही किया। हर वक्त मन में डर था और बच्चे से दूर रहना भी मुश्किल लग रहा था। उस दौरान किसी तरह मेरे पति ने बेटी को संभाला। मगर दो दिन बाद मेरे पति भी कोविड पॉजिटिव हो गए। अब कोई चारा नहीं बचा था। बच्चे को किस तरह रखा जाए। किसके पास रखा जाए। बाहर से कोई आ नहीं सकता था। हम बाहर जा नहीं सकते थे। रो-रोकर मेरी हालत बुरी होती जाती थी और कोरोना शरीर पर जो असर डाल रहा था, उसकी वजह से बिस्तर से उठना तक मुश्किल हो गया था।

मन में फिर से बुरे ख्याल आने लगे। फोन पर बातचीत में कुछ लोगों ने कहा-बच्चे को दूध नहीं पिलाना चाहिए। छूना भी नहीं चाहिए। खुद से बिल्‍कुल दूर कर देना चाहिए।

मगर क्या तीन महीने के बच्चे के साथ ऐसा किया जाना संभव है? इस सवाल ने मुझे मजबूर किया नए सिरे से सोचने पर। मैंने फिर कई डॉक्टरों से बात की। नतीजा ये निकला कि मां का दूध बच्चे के लिए वो दवाई है, जो किसी मेडिकल स्टोर पर नहीं मिल सकती।

बेशक मां कोविड पॉजिटिव हो, लेकिन उसके दूध के जरिए बच्चे को मिलने वाली एंटीबॉडीज ही बच्चे को किसी भी बीमारी से लड़ने की ताकत देती हैं। बच्चे को दूध न पिलाना और खुद से दूर कर देना किसी भी सूरत में कारगर उपाय नहीं हो सकता। इसी दौरान मैंने और भी कई रिसर्च पढ़ीं। तब मुझे मालूम चला कि मां के दूध को बच्चे के लिए अमृत क्यों कहा जाता है।

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बच्चे के रियल टाइम मेडिसिन तैयार करता है मां का शरीर

रिसर्च बताती हैं कि जब बच्चे को किसी बैक्टीरिया या वायरस की वजह से कोई परेशानी होती है, तब मां का शरीर एकदम से सक्रिय हो जाता है और उसे ब्रेस्ट मिल्क के तौर पर रियल टाइम इम्यूनिटी पहुंचाने का काम शुरू कर देता है। मां के दूध से बच्चे को लाभकारी बैक्टीरिया मिलते हैं, जो उसके पाचन तंत्र को न सिर्फ मजबूत बनाते हैं, बल्कि पाचन से जुड़ी समस्याओं को भी दूर करते हैं।

इसे इस तरह भी समझ सकते हैं। आपका शरीर किसी इनफेक्शन (संक्रमण) के संपर्क में आते ही उसका नया रोगप्रतिकारक बना लेता है। जब आपके बच्चे को सर्दी-जुकाम होता है, तो जुकाम का विषाणु बच्चे से आप तक भी पहुंच जाता है। ऐसे में आपका इम्यून सिस्टम उससे लड़ने के लिए काम करना शुरू कर देता है और विषाणु से लड़ने के लिए रोगप्रतिकारक बनाता है। ये रोगप्रतिकारक आपके दूध में जाते हैं और जब आप स्तनपान करवाती हैं, तब ये बच्चे के शरीर में पहुंचकर संक्रमण से लड़ने में मदद करते हैं।

इसके बारे में और ज्यादा पढ़ने में एक दिलचस्प रिसर्च अमेरिका की एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी से सामने आती है। इस यूनिवर्सिटी से जुड़ी मशहूर बायोलॉजिस्ट केटी हिंडे इस पूरी प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताती हैं। उनके मुताबिक जब बच्चा मां की छाती से दूध लेता है, तब एक वैक्यूम बनता है। इस वैक्यूम के जरिए बच्चे का सलाइवा स्तन के निप्पल में वापस जाता है, जहां उसके मैमेरी ग्लैंड (स्तन ग्रंथि) के रिसेप्टर्स यानी ग्राही कोशिकाओं तक ये सिग्नल के रूप में पहुंचता है। हिंडे इसे ' बेबी स्पिट बैकवॉश ' कहती हैं और उनके मुताबिक इस स्पिट बैकवॉश के जरिए मां के शरीर को बच्चे के इम्यून सिस्टम की जानकारी मिलती है। वैज्ञानिक मानते हैं कि बच्चे का स्पिट बैकवॉश ही वो वजह है जिसके जरिए मां का दूध अपने रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले कंपोजिशन को तैयार करता है।

अगर मैमेरी ग्‍लैंड के रिसेप्टर्स को ऐसा लगता है कि बच्चे के सलाइवा में कुछ पैथोजन्स यानी रोगाणु मौजूद हैं, तो वो मां के शरीर को ऐसी एंटीबॉडीज बनाने के लिए उकसाता है, जिससे बच्चा उन रोगाणुओं के खतरे से लड़ सके। ये एंटीबॉडीज मां के दूध के जरिए बच्चे के शरीर में पहुंचती हैं और इंफेक्शन से लड़ने में मदद करती हैं। जानकार तो यहां तक कहते हैं कि बच्चा जब बीमार होता या कुछ नहीं खा रहा होता, तब भी उसे स्तनपान करवाना काफी फायदेमंद होता है। बीमारी से ठीक होने में दवाओं के अलावा स्तनपान की अहम भूमिका होती है।

नोएडा में बीते एक दशक से प्रैक्टिस कर रहे पीडियाट्रिशियन डॉ. सौरभ कटारिया कहते हैं, 'अपने बच्चे के लिए जो सबसे अहम काम आप कर सकती हैं, वो है उसे दूध पिलाना। मां के दूध में एंटीबॉडीज के साथ वो भी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं, जो बच्चे के विकास के लिए जरूरी होते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, मां का दूध बच्चे की रक्षा उसकी पूरी जिंदगी करता है। जिन बच्चों को पर्याप्त मात्रा में मां का दूध मिलता है, उनके आगे चलकर मोटापे, हाइपरटेंशन और डायबिटीज जैसी समस्याओं से ग्रस्त होने की आशंका भी कम होती है।'

डॉ. सौरभ तो यहां तक कहते हैं, 'जिन बच्चों को मां का दूध मिलता है, उनका आईक्यू लेवल भी फॉर्मूला मिल्क पीने वाले बच्चों की तुलना में बेहतर होता है। दरअसल मां का दूध बच्चे के लिए किसी दवाई से भी ज्यादा असरकारक और फायदेमंद है। बेशक बाजार में फॉर्मूला मिल्क सरीखे कई विकल्प हैं, लेकिन ब्रेस्ट मिल्क का कोई और विकल्प नहीं हो सकता है।'

मां के लिए भी जरुरी है स्तनपान

और फिर ये बात भी स्तनपान करवाने वाली मां को नहीं भूलनी चाहिए कि स्तनपान करवाना सिर्फ बच्चे के लिए ही फायदेमंद नहीं है, मां के शरीर को भी इसके कई फायदे होते हैं। जैसा कि मुझे मेरी गायनेकोलॉजिस्ट ने बताया था- स्तनपान करवाने से वजन कम करने में मदद मिलती है। शरीर को हल्का महसूस होता है, तनाव भी कम होता है और फिर स्तनपान के जरिए मां को बच्चे के ज्यादा करीब रहने और लेटने-बैठने व आराम करने का भी मौका मिलता रहता है:)

आखिर मां का दूध बनता कैसे है?

जब मुझे मां के दूध के जादुई असर के बारे में पता चला, तो ये जानने की उत्सुकता और भी बढ़ गई कि आखिर मेरे ही शरीर में तैयार होने वाला ये जादुई आहार तैयार कैसे होता है? इसके लिए फिर मैंने इंटरनेट को खंगालना शुरू किया। तब पता चला कि एक मां का शरीर कितना जादुई होता है और प्रकृति उस शरीर पर कितनी ज्यादा मेहरबान है।

जब एक औरत गर्भवती होती है, तभी से उसका शरीर बच्चे के लिए दूध बनाने की तैयारी शुरू कर देता है। आपने ध्यान दिया होगा कि गर्भावस्था के दौरान ही स्तनों में बदलाव दिखने लगता है। ये बदलाव ही स्तनों को दूध बनाने के लिए तैयार करता है। गर्भावस्था के दौरान जिस तेजी से प्लेसेंटा का आकार बढ़ रहा होता है, उसी तेजी से एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन जैसे हार्मोन्स भी रिलीज हो रहे होते हैं, जो कि आपके स्तनों में दूग्ध उत्पादन की प्रक्रिया शुरू करते हैं। स्तनों में स्तन ग्रंथियां होती हैं, जो दूध का उत्पादन करती हैं।

इन स्तन ग्रंथियों के अलग-अलग हिस्से दूध बनाने से लेकर शिशु तक दूध पहुंचाने में अपनी-अपनी भूमिका अदा करते हैं। मसलन एल्वियोली स्तनों वो हिस्सा है, जहां दूध तैयार होता है। छोटी नलिकाएं दूध को एल्वियोली से मिल्क डक्ट्स यानी दुग्ध नलिकाओं तक लाती हैं, जिससे शिशु दूध आसानी से अपने मुंह में ले पाता है। जब शिशु दूध पीता है, तो आपके मस्तिष्क को प्रोलेक्टिन और ऑक्सीटोसिन जैसे हार्मोन्स रिलीज करने का संदेश पहुंचता है। प्रोलेक्टिन एल्वियोली को और दूध उत्पादन करने के लिए प्रेरित करता है और ऑक्सीटोसिन एल्वियोली की मांसपेशियों को संकुचित कर दूध को दुग्ध नलिकाओं तक पहुंचाने में मदद करता है। तो इस तरह आपके स्तनों में तैयार होता है दूध और पहुंचता है एक बेस्ट आहार के रूप में आपके शिशु तक। है ना ये सब कुछ किसी जादू की तरह :)

परिचय- लेखिका, दिल्ली में रहने वाली पत्रकार हैं। उपरोक्त उनके निजी विचार और अनुभव हैं

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