एचआईवी पॉजिटिव दंपति भी दे सकते हैं स्वस्थ बच्चे को जन्म

कुछ समय पहले तक एचआईवी पॉजिटिव मरीज आपस में शादी तो कर सकते थे, लेकिन गाइडलाइन के अनुसार बच्चे पैदा नहीं कर सकते थे। वहीं नई दवाओं के आने के बाद से माता-पिता से इन्हें संतान में जाने से भी रोका जा सकता है।

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   14 Dec 2019 6:03 AM GMT

एचआईवी पॉजिटिव दंपति भी दे सकते हैं स्वस्थ बच्चे को जन्म

लखनऊ। "शादी के चार साल बीत चुके थे। हर महिला की तरह मेरी भी ख्वाहिश थी कि मेरी गोद में मेरा बच्चा खेले, लेकिन मुझे डर था कहीं मेरा होने वाले बच्चे को भी एचआईवी न हो जाये। एक दिन पति के साथ डॉक्टर से मिली। डॉक्टर की बताई सावधानियों को बरता और नियमित दवाएं ली जिससे मैंने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।" ये कहना है उत्तर प्रदेश के कानपुर की रहने वाली ममता (बदला हुआ नाम) का।

ममता आज अपने छह माह के बेटे के साथ हंसी खुशी जिंदगी जी रही है। ममता को एचआईवी (ह्युमन इम्युनडिफिशिएंशी वायरस) कैसे हुआ, इसके बारे में वह बताती हैं, "मेरे पति को एचआईवी है ये बात उन्हें भी नहीं पता थी। शादी के दो साल बाद जब वह एक रिश्तेदार को खून देने गए थे तब उन्हें इसके बारे में पता चला। उनके कहने पर मैंने भी अपनी जांच कराई तो पता चला कि मुझे भी एचआईवी है। ये बात जानकर हम लोगों के पैर तले जमीन खिसक गई। हम दोनों बहुत डर गए थे। इधर घर वाले एक बच्चे की जिद कर रहे थे, लेकिन हमें डर था कि कहीं हमारा बच्चा भी इस वायरस से संक्रमित न हो जाए इसलिए हम दोनों ने बच्चा न पैदा करने की सोची।"

एचआईवी एक विषाणु होता है जो मानव शरीर में बाहरी रोगों से लड़ने वाली कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। कुछ समय पहले तक एचआईवी पॉजिटिव मरीज आपस में शादी तो कर सकते थे, लेकिन गाइडलाइन के अनुसार बच्चे पैदा नहीं कर सकते थे। वहीं नई दवाओं के आने के बाद से माता-पिता से इन्हें संतान में जाने से भी रोका जा सकता है। इस कार्यक्रम का नाम है प्रीवेन्शन पेरेन्ट टू चाइल्ड ट्रांसमिशन (पीपीटीसीटी) है।

"एक अखबार में पढ़ा कि हम जैसे लोगों के भी स्वस्थ बच्चे पैदा हो सकते हैं। हमने केजीएमयू के एआरटी सेंटर में संपर्क किया। डॉक्टर ने हम लोगों की काउंसलिंग की। ईश्वर ने हम लोगों की सुन ली और छह माह पहले मैंने एक बच्चे को जन्म दिया। सबसे अच्छी बात है हमारा बेटा एचआईवी निगेटिव है। डॉक्टर कहते हैं वह पूरी तरह से स्वस्थ है। कई बार तो हम लोगों ने अपनी जिंदगी खत्म करने की सोच ली थी, लेकिन अब हमारा बेटा हमारी जिंदगी जीने का मकसद बन गया है। " ये कहते-कहते ममता के आंखों में आंसू आ गए।


किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ के एआरटी सेंटर (एंटी रेट्रोवायरल ट्रीटमेंट) के डॉ. सौरभ पॉलीवाल बताते हैं, "एचआईवी कोई आनुवांशिक बीमारी नहीं है, इसलिए एचआईवी संक्रमित दंपति के बच्चे के स्वस्थ होने की संभावनाएं बहुत अधिक रहती हैं। अक्सर देखने में आता है कि एचआईवी संक्रमित माताओं के ज्यादातर बच्चे स्वस्थ (एचआईवी निगेटिव) होते हैं। जिस तरह से ब्लड प्रेशर या मधुमेह से पीड़ित मरीज एक गोली दवा खाकर सभी काम करता है। उसी तरह एचआईवी (एड्स) पीड़ित व्यक्ति भी रोज एक गोली खाकर स्वस्थ रह सकते हैं।"

वे आगे बताते हैं, "हमारे पास बहुत ऐसे मरीज आते हैं जिन्हें इस बात का डर होता है कि कहीं एचआईवी का वायरस हमारे होने वाले बच्चे को तो नहीं हो जाएगा। हम उन्हें समझाते हैं कि डरने की कोई बात नहीं है। यह जरूरी नहीं है कि अगर माता पिता एचआईवी संक्रमित हैं तो उनके बच्चे भी एचआईवी संक्रमित होंगे। समय रहते एचआईवी पॉजीटिव गर्भवती महिला अपना ईलाज शुरू करवा देती है तो होने वाले बच्चे को एचआईवी के खतरे से बचाया जा सकता है।"

"गर्भवती महिला से उसके होने वाले बच्चे को ये संक्रमण होने की सबसे ज्यादा आशंका होती है। एचआईवी संक्रमित दंपति को शुरू से ही एआरवी (एंटी रेटरो वॉयरल) थेरेपी देकर दवा दी जाती है। रात में खाने के बाद रोजाना एक गोली खाई जाती है। गर्भवती महिलाओं को लगातार यह दवा खानी होती है। बच्चा पैदा होने के बाद भी महिला की दवा चलती रहती है। इससे नवजात में कई प्रकार के संक्रमण से बचाव होता है। आने वाले समय में भी बच्चे को एचआईवी होने का खतरा बहुत कम होता है।" डॉक्टर पॉलिवाल आगे बताते हैं।

एआरवी के तहत सीडी-4 काउंट के कम होने का इंतजार किये बिना, एचआईवी पॉजिटिव गर्भवती महिला की एआरवी थेरेपी शुरू कर दी जाती है, जिससे गर्भावस्था में पूरी होने तक वायरल लोड कम हो जाता है। वहीं बच्चे के पैदा होने के बाद भी उसकी भी थेरेपी चलाई जाती है। शिशु की 18 माह तक जांच की जाती है। अगर बच्चा एचआईवी निगेटिव होता है तो उसके बाद से बच्चा नार्मल की श्रेणी में माना जाता है। गर्भावस्था से मां के एआरटी थेरेपी लेने से बच्चे में एचआईवी संक्रमण की संभावना 90 प्रतिशत तक कम हो जाती है।

राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के अनुसार भारत में वर्ष 2017 में करीब 21.4 लाख लोग एचआईवी से ग्रस्त थे, जिनमें करीब 40 प्रतिशत महिलाएं थीं। वर्ष 2000 के बाद से एचआईवी संकमण के सालाना नये मामलों में 60 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है, लेकिन 2010 और 2017 के बीच गिरावट की दर 27 प्रतिशत रही। जो संक्रमण के नये मामलों में 2020 तक 75 प्रतिशत कमी लाने के लक्ष्य पर पहुंचने के लिहाज से बहुत पीछे है।

एचआईवी/एड्स से निपटने का एकमात्र उपाय है, इसकी रोकथाम। भारत की 99 प्रतिशत जनसंख्या अभी एड्स से मुक्त है, बाकि एक प्रतिशत जनसंख्या में इसके फैलने की प्रवृति के आधार पर इस महामारी की रोकथाम एवं इस पर नियंत्रण करने संबंधी नीतियां बनाईं जा रही हैं।

भारत सरकार ने 1992 में एड्स विरोधी अभियान के रूप में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम (प्रथम चरण) की शुरुआत की जिसका उद्देश्य देश में एचआईवी संक्रमण के प्रसार एवं एड्स के प्रभाव को कम करना था ताकि एड्स से मरने वाले लोगों की संख्या में कमी लाई जा सके एवं इसे वृहत स्तर पर फैलने से रोका जा सके।


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