केजीएमयू के डॉक्टरों ने बेसहारा मरीज को दी नई जिंदगी, माता-पिता से भी मिलवाया

ट्रेन से गिरकर घायल विक्रम को गोंडा पुलिस ने कोमा की हालत में केजीएमयू में कराया था भर्ती

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   3 Jun 2019 12:04 PM GMT

केजीएमयू के डॉक्टरों ने बेसहारा मरीज को दी नई जिंदगी, माता-पिता से भी मिलवाया

लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के चिकित्सकों ने एक बेसहारा मरीज को न सिर्फ नई जिंदगी दी बल्कि उसके परिवार से मिला भी मिलाया। बिहार के रहने वाले इस मरीज को यूपी के गोंडा से केजीएमयू में रेफर किया गया था, जहां से पुलिस ने उसे ट्रॉमा सेंटर में कोमा की हालत में भर्ती कराया था।

न्यूरोसर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. बीके ओझा ने बताया, " करीब दो सप्ताह पहले गोंडा के बाबू ईश्वर सरन जिला अस्पताल से रेफर किये गये मरीज विक्रम को पुलिसकर्मी सतीश यादव द्वारा ट्रॉमा सेंटर लाया गया था। मरीज शुरू में कोमा में था। बाद में जब स्थिति में सुधार हुआ और धीरे-धीरे जानकारी देने लायक स्थिति हुई तो मरीज ने बताया कि, उसका नाम विक्रम(18वर्ष) है, उसके पिता नाम देव मलिक और मां का नाम कलावती है। मरीज ने अपना पता बिहार के जिला अररिया का गाँव सिसवा बताया।"

ये भी पढ़ें: 'मेरा बेटा ना होता तो मैं मर ही जाता'


विक्रम के पिता देव मलिक ने बताया, " मेरा बेटा हरियाणा के रोहतक में रहकर नौकरी करता था। 15 मई को वह ट्रेन से गाँव के लिए रवाना हुआ था। रास्ते में यूपी के गोंडा के पास किसी यात्री ने उसे धक्का दे दिया, जिससे वह चलती ट्रेन से गिरकर घायल हो गया। सिर में चोट लगने के कारण वह कोमा में चला गया था। बाद में गोंडा पुलिस ने उसे केजीएमयू में भर्ती कराया।"

बेटे के घर नहीं पहुंचने के गम में विक्रम की मां कलावती देवी का बुरा हाल हो चुका था। बेटे की याद में बेशुध होकर कई दिनों तक कुछ खाया पीया नहीं। हर वक्त विक्रम-विक्रम की रट लगाए रहती थी। घर वालों ने बड़ी मशक्कत से उन्हें संभाला। कलावती देवी ने बताया, " ये डॉक्टर नहीं बल्कि मेरे लिए किसी भगवान से कम नहीं हैं। मेरे कलेजे का टुकड़ा पता नहीं कहां चला गया था। जब मुझे पता चला कि मेरा बेटा लखनऊ के एक अस्पताल में भर्ती है, तब जाकर जान में जान आई।"

ये भी पढ़ें: बांग्लादेश की इकलौती महिला रिक्शा चालक, इन्हें लोग पागल आंटी कहते हैं


डॉ. ओझा ने बताया," हमारे सीनियर रेजीडेंट डॉ. अनूप ने इंटरनेट के माध्यम से संबंधित पुलिस चौकी से संपर्क करने के बाद विक्रम के परिवार से संपर्क किया और उन्हें मामले से अवगत कराया। घरवालों को जैसे ही यह पता चला उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इस तरह से जिंदगी की जंग जीतने वाले विक्रम के लिए पहली जून का सूरज अपने परिजनों से मिलने की खुशी लेकर लाया।"

ये भी पढ़ें: महिला समाख्या की एक सार्थक पहल, उत्तर प्रदेश के 14 जिलों में चलती हैं 36 नारी अदालतें


More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top