कमाई की दौड़ में ‌सिनेमा के पर्दे से गायब हो रहा ग्रामीण भारत

किसी दौर में भारतीय सिनेमा को समाज का आईना कहा जाता था। तर्क दिया जाता था कि जो समाज में होता है, वही पर्दे पर दिखता है। रजत पट पर चलने वाली कहानी को लोग यथार्थ से जोड़ने लगते थे, फिल्मी किरदारों को वास्तविक जीवन में निभाने लग जाते थे। लेकिन अब सिनेमाई पर्दे से यह सब गायब हो गया है।

कमाई की दौड़ में ‌सिनेमा के पर्दे से गायब हो रहा ग्रामीण भारत

- अंजलि शर्मा

एक दौर था जब गांव और ग्रामीण परिवेश भरतीय सिनेमा की पहचान हुआ करते थे, पर जैसे बाजार-व्यापार का जोर बढ़ा और वैश्वीकरण का दौर आया सिनेमा के पर्दे से गांव गायब होते चले गए। भारतीय सिनेमा का इतिहास खंगालें तो पता चलेगा कि देश में चित्रपट की शुरुआत गांव की पगडंडियों से होकर गुजरी है। खेतों-खलिहानों में अंगुली पकड़कर सिनेमा आगे बढ़ा है। वी. शांताराम की दो बीघा ज़मीन, विमल राय की यादगार बंदिनी, राज कपूर की आवारा और श्री 420 या फिर बूट पॉलिश जैसी फिल्मों ने देश और दुनिया को समाज की समस्याओं और उनके असल जीवन से रूबरू करवाते थे।

कोरोना काल में लॉकडाउन के चलते करोडों प्रवासी मजदूरों और कामगारों की समस्याओं ने हमें न केवल श्रमिकों की समस्याओं से रूबरू करवा बल्कि वर्षों पूर्व बनी केए अब्बास की फिल्म 'शहर और सपना' को हकीकत में दिखा दिया। हालांकि जैसे-जैसे समय बढ़ा सिनेमा का रंग बदलता गया। अब तो आलम यह है कि ग्रामीण समाज भारतीय सिनेमा से बिल्कुल गायब सा हो गया है।

सामाजिक बदलाव में फिल्मों की बड़ी भूमिका

समाज का प्रतिबिंब माना जाने वाला सिनेमा अब फैशन और स्टाइल का पर्याय बन गया है। शहरों की भागदौड़ भरी ज़िंदगी और उसकी चकाचौंध वाली जीवनशैली की चमक से सिनेमा का पर्दा और चमकरदार बन गया है। अधिकांश हिंदी फिल्में महज़ व्यापारिक सफलता को ध्यान में रख कर बनाई जा रही हैं। बॉक्स-ऑफिस पर कोई एक फार्मूला हिट होते ही उस पर आधा दर्जन फिल्में बन जाती हैं। ‌

सिनेमा के इस नए दौर में यह कह पाना मुश्किल है किब फिल्में समाज का प्रतिबिम्ब हैं या समाज फिल्मों का। आजकल की फिल्मों में अगर गांव दिखता भी है तो इस रूप में कि वहां के बच्चे अच्छी पढ़ाई के लिए शहरों का रुख करते हैं। शहरी तौर-तरीकों को सीखकर आगे बढ़ते हैं। कई बार फिल्मों में उन्हें उपहास का पात्र भी बनाया जाता है।

हिंदी सिनेमा मतलब अंधाधुंध कमाई की होड़

हिंदी फिल्मों से ग्रामीण विषय गायब होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि इनसे अब कमाई नहीं होती। मौजूदा हिंदी सिनेमा 100 और 200 करोड़ क्लब की होड़ में शामिल है। फिल्म में कहानी के नाम पर कुछ भी ऊट-पटांग डाल दिया जाता है और एक बडी भीड़ उस पर पैसे लुटाने को तैयार ही रहती है। हालांकि 'स्वदेश' जैसी फिल्में भी इस बीच बनी, जो ग्रामीण भारत की मिट चुकी पहचान को वापस दिलाने और उन्हें अपनी मातृभूमि की ओर वापस लौटने के विषय पर आधारित थी। हालांकि ऐसी फिल्मों को दर्शक बहुत कम मिलते हैं।

'दंगल' और 'दबंग' जैसी फिल्में भी आईं, जिनकी पृष्ठभूमि ग्रामीण तो रही पर पूरी फिल्म, शहर में अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद के इर्द-गिर्द बनी रही। एक फिल्म 'पीपली लाइव' भी आई, जो वास्तव में ग्रामीण समाज की सच्चाई और वहां की समस्याओं पर आधारित थी। हालांकि दुर्भाग्य यह रहा कि बहुत बड़े तबके को यह फिल्म समझ ही नहीं आई। बॉक्स-ऑफिस पर इसका औंधे मुँह गिरना ही इस बात को दर्शाता है कि न तो लोगों को ऐसी फिल्में पसंद आती हैं और न आधुनिक हिंदी सिनेमा ऐसी फिल्मों को स्वीकार करता है। आज के हिंदी सिनेमा की सफलता का पैमाना 100 और 200 करोड़ क्लब में शामिल होना भर है।


सिनेमा से गायब हो गई 66 फीसदी आबादी

कामर्शियल हिंदी सिनेमा सिर्फ़ पैसा, शहर और काल्पनिकता के दायरे में कहानियां बुनता हुआ और ग्रामीण समाज को रौंदते हुए आगे बढ़ रहा है। विश्व बैंक की 2019 की रिपोर्ट बताती है कि देश की कुल आबादी का 66 फीसदी ग्रामीण भारत में रहता है। देश की सकल घरेलू आय में 46 फीसदी योगदान ग्रामीण अर्थव्यवस्था का है। इसमें काम करने वाले 70 फीसदी कार्यबल ग्रामीण भारत में रहता है। इन अनगिनत ग्रामीणों के कंधों को सीढ़ी बनाकर फिल्में करोडों के क्लब में शामिल होती हैं लेकिन ये कामगार नेपथ्य में ही रह जाते हैं। ग्रामीण सिनेमा अब निरर्थक चर्चा और सार्वजनिक भाषणों तक सिमटकर रह गया है।

मायानगरी मुंबई बस बाज़ार बन कर रह गई

समानान्तर सिनेमा और समकालीन सिनेमा में अंतर को गहराई से जानने के लिए गांव कनेक्शन ने अभिनेता वीरेंद्र सक्सेना से बात की। समानान्तर सिनेमा के अन्वेषक वीरेंद्र कहते हैं, "मुंबई शहर को सपनों का शहर माना जाता है। गांव से निकलकर लोग यहां सपने पूरे करने आते हैं। लोगों के इन्ही सपनों को अलग-अलग विषयों में परोसने का काम समकालीन हिंदी सिनेमा कर रहा है। ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की होड़ में फिल्म के नाम पर कुछ भी दिखाया जा रहा है। बड़ी विडंबना यह है कि दर्शक कुछ भी देख रहे हैं।"

वीरेंद्र कहते हैं कि मुंबई अब रहने और सपने पूरे करने का शहर नहीं बचा बल्कि बाज़ार बन गया है। यहां विविध विचारधारा और सोच वाले लोग रहते हैं। बावजूद इसके सभी इस एक बात पर सहमत हैं कि ग्रामीण समाज और उनकी कहानियों से हिंदी सिनेमा का वाणिज्यिक विकास नहीं हो सकता।

सच्चाई और ईमानदारी के प्रतीक माने जाने वाले किरादार निभाने वाले सक्सेना कहते हैं, "ग्रामीण जीवन पर आधारित फिल्मों को सरकार सिर्फ क्षेत्रीय स्तर तक प्रोत्साहित करती है। हम शहरी लोगों का स्वभाव कपोल कल्पित है। काल्पनिक जीवन की चाह में हमने ग्रामीण स्वभाव, ईमानदारी और भोलेपन का गला घोंट दिया है। पहले की स्थिति दोबारा लाने के लिए शिक्षा नीति में परिवर्तन की आवश्यकता है। स्कूलों में मधुबनी चित्रकारी के माध्यम से ग्रामीण समाज के वर्चस्व को एक बार फिर से स्थापित किया जा सकता है।"


रोजमर्रा की जिंदगी में भी नहीं बचा है गांव

व्यवसायी और शौकिया यात्री रह चुकी अभिनेत्री रेणुका शर्मा ने गांव कनेक्शन से कहा, यह बहुत अफ़सोस की बात है कि बॉलीवुड ने ग्रामीण सिनेमा को बहिष्कृत कर दिया है। काफ़िर, गिलटी, शकुंतला देवी और एचटी नेबर्स किचन जैसी फिल्मों और कई सीरियल में काम कर चुकी रेणुका शर्मा कहती हैं कि फिल्म इंडस्ट्री ग्रामीण लोगों से भरी पड़ी है। लेकिन इंडस्ट्री इन लोगों को आगे बढ़ने नहीं देती। उनकी प्रतिभा दबाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। कुछ सोचने और नया करने का जज़्बा इंडस्ट्री के ज़बरदस्त हस्तक्षेप की वजह से दब सा गया है।

रेणुका कहती हैं, ग्रामीण महिलाएं मजबूत इरादों वाली और बेहद मेहनती होती हैं। पर पुरुषों द्वारा उत्पीड़न और हिंसा ने इनकी क्षमता को विकसित नहीं होने दिया। इनकी वास्तविक सच्चाई दब गई। हाल ही में इस विषय पर बनी 'बरेली की बर्फी' फिल्म का जिक्र करते हुए कहा रेणुका ने कहा, इस सिनेमा में ग्रामीण भारत के सामने उन्नतिशील समाज को गोते लगाते हुए बखूबी दिखाया गया है। हिंदी सिनेमा में चीज़ें बदल तो रही हैं पर गति बहुत ही धीमी है।

रेणुका कहती हैं कि वह अपने दादा-दादी और नाना-नानी को ग्रामीण समाज के महत्व को समझाने के लिए दिल से धन्यवाद देती हैं। रेणुका सलाह देती हैं कि हर भारतीय परिवार को बच्चों को मूल पृष्ठभूमि की जानकारी देनी चाहिए। शहरी बनने की होड़ में हम अपनी ज़मीन भूल गए हैं। सच्चाई भूल गए हैं। सिनेमा ही नहीं बल्कि सामान्य ज़िन्दगी से भी ज़मीनी हकीक़त गायब है।


समानान्तर सिनेमा ने भी ग्रामीण भारत को नेपथ्य में डाला

हिंदी सामानान्तर सिनेमा को ग्रामीण समाज और उनकी कहानियों का प्रतिबिंब कहा जाता है। अंकुर, पार, दो बीघा ज़मीन, सूरज का सातवां घोड़ा और अंतर्नाद जैसी कुछ उम्दा फिल्में ग्रामीण भारत का प्रतिनिधित्व करने में सफल रहीं। ऐसी चुनिंदा फिल्में भारत की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था की गतिविधियों को उजागर करने में श्रेष्ठ साबित हुई हैं। अब ऐसी फिल्में कहाँ बनती हैं?

ग्रामीण समाज की विविध समस्याओं और कहानियों को बखूबी चरितार्थ करने में माहिर अभिनेता वीरेंद्र सक्सेना निराश होकर कहते हैं कि समानांतर सिनेमा ने ग्रामीण भारत के साथ बुरा किया। इन्हें मार डाला। फिल्मों ने अपना स्वरूप बदल लिया है। शांति, सच्चाई और ईमानदारी की प्रतीक मानी जाने वाली फिल्मों ने झूठ, फरेब और काल्पनिकता का चादर ओढ़ लिया। शहरों की चकाचौंध, हिंसा, खून खराबा आधुनिक फिल्मों के विषय बन गए हैं।

ज्ञान का खज़ाना है ग्रामीण भारत

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के अनुसार समानान्त र वातावरण में ज्ञान की कमी की समस्या का समाधान तभी हो सकता है, जब हम स्वदेशी ज्ञान को शामिल करें। इनके पास पर्यावरण, मौसम और परिस्थितिकी के संबंध में ज्ञान का भंडार है। अनेक शोध प्रमाण हैं कि ग्रामीण भारत विज्ञान, उद्योग, खेती, कला और संस्कृति के सम्बन्ध में अपार जानकारी रखता है। जिस प्रकार प्राचीन भारत को समझने के लिए इतिहास और वास्तुकला को समझना-पढ़ना ज़रूरी है, उसी तरह मौजूदा हालात को देखते हुए भारतीय सिनेमा की गरिमा बनाए रखने की भी जरूरत है। पूरा परिवार एक साथ बैठकर फिल्में देख सके, आनंद ले सके और जानकारी भी हासिल कर सके।

फिल्म निर्माता और सरकारी संस्थाहओं की ज़िम्मेदारी है कि समानान्तर और समकालीन सिनेमा के बीच की खाई भरें और ऐसी फिल्मों को बढ़ावा दें जो मनोरंजन का खज़ाना तो हों ही, साथ में देश को एक सार्थक उद्देश्य दें। एक धागे में पिरोने का काम अब हम सबका है।

अनुवाद- इंदु

इस स्टोरी को मूल रूप से अंग्रेजी में यहां पढ़ें।

(अंजलि शर्मा कृषि, पर्यावरण और विकासशील अर्थशास्त्र विषय में शोधार्थी हैं, जो साहित्य और सिनेमा के विषय में लिखती रहती हैं।)

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