प्रधानमंत्री जी, सिर्फ महिलाओं के लिए नहीं है रसोई का बजट 

Anusha MishraAnusha Mishra   4 Feb 2018 1:40 PM GMT

प्रधानमंत्री जी, सिर्फ महिलाओं के लिए नहीं है रसोई का बजट रसोई का बजट

1 फरवरी को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में बजट पेश किया। हमेशा की तरह इस बार भी महिलाओं के लिए ख़ास बजट पेश किया गया। इस बजट में उन्होंने 8 करोड़ गरीब महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन देने की बात कही है। अच्छी बात है कि सरकार ग्रामीण महिलाओं की सेहत का ख्याल रखते हुए ज़्यादा से ज़्यादा घरों तक मुफ्त में गैस कनेक्शन पहुंचा रही है। गाँव में महिलाएं चूल्हे पर खाना बनाती हैं, वो चूल्हे के सामने घंटों बैठी रहती हैं। जब लकड़ियां चूल्हे में आग नहीं पकड़तीं और धुंआ तेज़ होता है तो उनकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं, गला रूंध जाता है लेकिन उसे रूंधे गले से फूकनी से लकड़ियों को फूंकती हैं और आग जलाती हैं। इस धुएं का उनकी आंखों पर बुरा असर पड़ता है, वे अस्थमा की मरीज़ हो जाती हैं लेकिन इस सब से बेख़बर वे अपने काम में लगी रहती हैं।

भारत में रसोई, चूल्हा, गैस, खाना बनाना, बर्तन धोना जैसे कामों से हमेशा महिलाओं को ही जोड़कर देखा जाता है। किसी घर में जब गैस कनेक्शन आता है तो पूरा घर उस पर बना खाना खाता है लेकिन इससे जुड़ा बजट महिलाओं के लिए ख़ास होगा। जब खाने पीने की चीज़ें महंगी होती हैं तो सुर्खियां बनती हैं - महिलाओं के बजट पर पड़ेगा असर। ये अच्छी बात है कि आप उन्हें रसोई का सर्वे सर्वा बना देते हैं लेकिन ये बुरा है कि रसोई की बात होने पर सिर्फ महिलाओं की ही बात होती है।

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ऐसा नहीं है कि ये हाल सिर्फ भारत की महिलाओं का ही है। दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में महिलाओं को खाने, झाड़ू, पोछा, बर्तन, कपड़े तक ही सीमित रखा जाता है। इसका बेहतरीन उदाहरण हॉलीवुड अभिनेत्री मेघन मार्केल ने दिया था। दिसंबर 2017 में एक कार्यक्रम के दौरान मेघन मार्केल ने बताया था कि 11 साल पहले जब वह स्कूल में थीं तब अमेरिका में टीवी पर एक बर्तन धोने वाले साबुन का विज्ञापन आता था, जिसमें एक लाइन थी - पूरी अमेरिका की महिलाएं चिकने बर्तनों से लड़ रही हैं। इस विज्ञापन को लेकर मार्केल की क्लास के दो लड़कों ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि लड़कियां तो सिर्फ रसोई का काम करने के लिए ही बनी हैं। मार्केल बताती हैं कि मैं उस दिन घर आई और मैंने अपने पापा को इसके बारे में बताया। इसके बाद मैंने उस समय की अमेरिका की प्रथम महिला हिलेरी क्लिंटन, नागिरक अधिकारों की वकील ग्लोरिया एलर्ड, पत्रकार लिंडा एलर्बी व उस कंपनी को इसके बारे में एक ख़त लिखा। इसके एक महीने बाद उस कंपनी ने विज्ञापन की उस लाइन को पूरे अमेरिका की महिलाएं से बदलकर पूरे अमेरिका के लोग कर दिया।

ये एक घटना है जो ये बताती है कि महिलाओं को सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं किया जा सकता और ये बात उस कंपनी को भी माननी पड़ी। वो कोई छोटी मोटी कंपनी नहीं थी। एफएमसीजी बाज़ार की सबसे बड़ी कंपनी कही जाने वाली प्रॉक्ट एंड गैंबल थी लेकिन आज भी जब संजीव कपूर देश के सबसे बड़े शेफ माने जाते हैं, जब बड़े - बड़े होटलों में पुरुष खाना बनाते हैं। जब, देश में खाना खाने वालों की संख्या महिलाओं के मुकाबले पुरुषों की ज़्यादा है (ये मैं इसलिए कह रही हूं क्योंकि देश में पुरुषों के मुकाबले 6 करोड़ महिलाएं कम हैं) तब भी गैस कनेक्शन को महिला बजट से जोड़ा जाता है।

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सरकार महिलाओं के बारे में बहुत अच्छा सोचती है लेकिन महिलाओं के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ों में से एक माने जाने वाले सैनिटरी नैपकिन को लेकर कोई योजना नहीं लाती। देश में आज भी 70 फीसदी महिलाएं सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल नहीं करतीं। इसके कारण वे कई बीमारियों का शिकार हो जाती हैं। जब जीएसटी लागू हुआ तब से सैनिटरी नैपकिन को टैक्स फ्री करने की मांग उठ रही है लेकिन ऐसा नहीं हुआ। महिलाओं ने सोचा था कि शायद बजट में सैनिटरी नैपकिन के लिए अलग से कुछ हो लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ। गैस कनेक्शन को तो सामान्य बजट में भी रखा जा सकता था जब विशेष तौर पर महिलाओं की बात हो रही थी तो उनके लिए ज़रूरी चीज़ों के लिए मद दिया जाता लेकिन शायद सरकार अभी भी इस पूर्वाग्रह से बाहर नहीं आ पाई है कि महिलाओं की दुनिया गैस कनेक्शन और रसोई के परे भी है। अब मैं यहां पर महिलाएं किस क्षेत्र में क्या -क्या कर रही हैं और पुरुषों के बराबर हैं या नहीं इसके उदाहरण नहीं गिनवाऊंगी क्योंकि वो आप भी जानते हैं लेकिन शायद अपनी पुरानी सोच से अभी बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

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