भ्रष्टाचार हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है

Dr SB MisraDr SB Misra   30 Nov 2016 7:09 PM GMT

भ्रष्टाचार हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका हैफोटो साभार: इंटरनेट

आज भ्रष्टाचार की हालत यह है कि हमारे देश का आम आदमी पुत्र प्राप्ति, मुकदमा जीतने, बीमारी से उबरने के लिए भगवान को रिश्वत का वादा करता है। फिर चाहे मन्दिर में प्रसाद चढ़ाने, कथा सुनने या मज़ार पर चादर चढ़ाने की रिश्वत हो। इससे भगवान या देवी-देवताओं पर तो असर नहीं पड़ता लेकिन हमारी मानसिकता का पता चलता है। मोदी ने बड़े नोट बन्द किए लेकिन भ्रष्टाचार के दूसरे तरीके भी हैं। दक्षिण के मन्दिरों में सोने का मुकुट चढ़ाते हैं या चांदी छत्र चढ़ाते हैं। इन नादान लोगों को पता नहीं भगवान को श्रद्धासुमन चाहिए, सच्चे मन से समर्पण भाव।

बच्चे अगर स्कूल में जाने-अनजाने किसी दूसरे का सामान ले लेते हैं और घर ले आते हैं तो हम उन्हें प्रिंसिपल के पास जमा करने को नहीं कहते, समझाते भी नही, गाँवों में तो बच्चों के हाथ गुरु जी के घर कद्दू, लौकी, मट्ठा और विविध सामान भिजवाते थे। बच्चे जब परीक्षा देकर आते हैं और बताते हैं कैसे नकल किया तो घर के लोग उन्हें हतोत्साहित नहीं करते। इस तरह बच्चों की सोच का अंग बन जाता है अनुचित तरीका।

अभी कुछ दिन पहले कुछ गाँवों में चकबन्दी हुई और कुछ में हो भी रही है, गरीब अमीर सभी किसानों ने लेखपाल और दूसरे चकबन्दी कर्मचारियों, अधिकारियों को हजारों रुपए रिश्वत में दिए और मनमाने चक यानी भूखंड बनवा लिए। जमीन भी बढ़वा ली और जिसने नहीं दिया उसकी जमीन घटी जिन्होंने रिश्वत नहीं दी और ईमानदारी के रास्ते पर चलने का प्रयास किया उन्होंने कीमत चुकाई और नुकसान उठाया। आज कितने लोग ईमानदारी की कीमत चुकाने को तैयार हैं?

गाँवों में इन्दिरा आवास, लोहिया आवास, विधवा पेंशन, वृद्धावस्था पेंशन सभी में ग्रामीणों द्वारा रिश्वत दी जाती है और प्रधानों द्वारा ली जाती है। गाँव का ही रहने वाला प्रधान उससे भी हम डटकर मुकाबला नहीं कर सकते क्योंकि ईमान से बड़ा है स्वार्थ। खेतों से बिजली की लाइन निकलती है तो एक छोटी सी मोटर कंधे पर रख कर जीन पाइप लेकर बोरिंग पर जाते हैं और कटिया लगा देते हैं आराम से खेत की सिंचाई कर लेते है। उनकी आत्मा को नहीं खटकता कि हम बिजली की चोरी कर रहे हैं। घरों में बिजली रोज जलती है किन्तु न तो मीटर लगा है और न पैसा देते, हैं मुफ्त की आदत जो डाल दी है हमारे नेताओं ने।

चोरी का माल खरीदने में तनिक भी संकोच नहीं। दिल्ली में तो चोर बाजार नाम का मार्केट ही है। पुलिस या आरटीओ हमारी गाड़ी अपने कब्जे में लेते हैं बाद में पता चलता है उसकी बैटरी चली गई या टायर बदले हैं या टूल्स गायब हैं। यहां तक कि डॉक्टर मरीज का ऑपरेशन करता है तो शरीर का कोई अंग ही गायब हो जाता है जैसे एक किडनी।

गाँव कनेक्शन ने अनेक उदाहरण छापे हैं जहां पर लोहिया आवास के लिए 20 हजार की रिश्वत निर्धारित है और भूमिहीनों को पट्टा के लिए भी प्रति एकड़ एक लाख की रिश्वत चलती है। आप का रुपया बकाया है तो दस प्रतिशत पहले नकद बाबू को देना होता है। इन बातों को प्रमाणित करना सरल नहीं है। यदि आप एक स्कूल खोलते हैं तो उसकी मान्यता लेने, अनुदान सूची में नाम डलवाने, परीक्षा केन्द्र बनवाने से लेकर प्रत्येक कदम पर रिश्वत देते हैं। सरकारी स्कूलों के अध्यापकों का नियुक्ति पत्र, तबादला, प्रमोशन और एरियर प्राप्ति में रिश्वत के बिना काम नहीं चलता। हर काम के भाव निश्चित हैं लेकिन आप उसे प्रमाणित नहीं कर सकते। ऐसी परिस्थितियों में यदि नक्सलवाद का जन्म हो जाय तो आश्चर्य नहीं।

भ्रष्टाचार के मामले में इतना बुरा हाल तो गुलामी के जमाने में भी नहीं था। अंग्रेजों द्वारा लूट के बावजूद आम आदमी भ्रष्ट नहीं था। अंग्रेजों के बाद देश की बागडोर कांग्रेस के हाथ में आई थी और गांधी जी के आदर्श हमारे सामने थे, कुछ दिन ठीक चला। आज तो हवा में ही भ्रष्टाचार व्याप्त है। मोदी कहते हैं कि कांग्रेस मुक्त भारत चाहिए लेकिन क्या ऐसा भारत भ्रष्टाचार मुक्त भी होगा, मुझे सन्देह है।

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