जून में लगने वाली इमरजेंसी के जनवरी 1975 में मिलने लगे थे संकेत

राज नारायण के मामले में कोर्ट का निर्णय इमरजेंसी का तात्कालिक कारण था। लेकिन इसकी भूमिका पहले से ही तैयार होने लगी थी। 1975 की सर्दियों में ही राजनीतिक गर्मी का एहसास हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर जून में जो कुछ हुआ, वह इतिहास है।

जून में लगने वाली इमरजेंसी के जनवरी 1975 में मिलने लगे थे संकेत

1975 का जून ख़त्म होने को था। लोग मानसून का इंतज़ार कर रहे थे। जिस समय गर्मी से राहत मिलनी चाहिए थी, वहाँ देश की राजनीति में पारा रातों-रात चढ़ गया। राजनीति की यह गर्मी ऐसी कि 19-20 महीने विपक्ष, खासकर जनसंघ (आज की भाजपा) और आरएसएस से जुड़े लोगों ने और सैंकड़ों स्वतंत्र पत्रकारों जेल में राजनीति की इस गर्मी की तपन को सीधे महसूस किया। इन हज़ारों-लाखों लोगों में तमाम तो ऐसे थे जो यह उम्मीद ही छोड़ चुके थे कि वे अपने जीवन में लोकतंत्र के वट-वृक्ष के नीचे फिर से खुली हवा में सांस भी ले पाएंगे। लेकिन जो हुआ सो हुआ।

इमरजेंसी की चर्चा करते वक़्त हम शायद ही कभी जून से पहले होने वाली घटनाओं को याद करते हैं और सिर्फ मान लेते हैं कि इमरजेंसी राज नारायण केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी के विरुद्ध दिए गए फैसले का परिणाम थी। यह सही है कि राज नारायण के मामले में निर्णय इमरजेंसी का तात्कालिक कारण था। लेकिन इसकी भूमिका पहले से ही तैयार होने लगी थी।

1967 के बाद देश में गैर-कांग्रेसी/मिलीजुली सरकारों का दौर शुरू हो गया था। ऐसे में कांग्रेस और इसके नेतृत्व के ख़िलाफ़ भी आवाज़ें उठने लगी थीं। लेकिन 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण, राजाओं के प्रिवी-पर्स की समाप्ति, गरीबी हटाओ का नारा, 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में मिली जीत और बांग्लादेश के निर्माण से इंदिरा गांधी की बुलंदियों का सितारा सातवें आसमान पर था। फिर भी 1973 से चीजें बदलने लगीं। कांग्रेस और इसके नेतृत्व के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठीं। इन आवाज़ों में गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन और बिहार का छात्र आंदोलन प्रमुख थे। गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन में छात्रों के सामने राज्य सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा फिर उसके बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा था।

बिहार में भी छात्रों का आंदोलन हुआ। अप्रैल 1974 में यहाँ गांधीवादी जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। मानो यह सब कम था जो लेबर यूनियन नेता जॉर्ज फर्नाडीस के नेतृत्व में देश भर में सफ़ल रेल हड़ताल कर दी गई।

इन घटनाक्रमों से किसी भी सरकार का सकते में आना स्वाभाविक था, कांग्रेस सरकार भी आई और उसने इससे निपटने के लिए उपलब्ध विकल्पों पर विचार करना शुरू कर दिया।

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लेबर यूनियन नेता जॉर्ज फर्नाडीस के नेतृत्व में देश भर में सफ़ल रेल हड़ताल कर दी गई।

संवैधानिक और क़ानूनी प्रावधानों से निकलते हुए इमरजेंसी की रूप रेखा बनाने वाले पश्चिम बंगाल के मुख्य मंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने जनवरी 1975 में ही इंदिरा गांधी को यह सलाह दे डाली थी कि कुछ अलग किया जाना बहुत जरूरी है। सिद्धार्थ शंकर रे बंगाल से आने वाले आरंभिक स्वतंत्रता सेनानियों में प्रमुख सी.आर.दास के पोते थे।

उस समय इंडियन एक्सप्रेस के संपादक रहे कुलदीप नैयर ने अपनी किताब इमरजेंसी रीटोल्ड में इसका ज़िक्र किया है। वे लिखते हैं; जेपी और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का निर्णय जनवरी में ही ले लिया गया था। मुझे प्रधानमंत्री सचिवालय के एक व्यक्ति से पता चला है कि कैसे 'टेक ओवर' करना है। इस व्यक्ति को ज्यादा जानकारी नहीं थी लेकिन इतना पता था कि जेपी की गिरफ्तारी और आरएसएस को प्रतिबंधित किया जाएगा।

चूंकि मामला स्पष्ट नहीं हो रहा था तो कुलदीप नैयर ने इन तथ्यों को जनसंघ के पत्र MotherLand को भेज दिया। मदरलैंड में जितना संभव था, इस कहानी को हवा देते हुए छापा लेकिन इंडियन एक्सप्रेस ने संतुलन बनाते हुए जेपी और आरएसएस से जुड़े तथ्यों के बिना ख़बर छापी।

लेकिन 1975 की सर्दियों यानि जनवरी में यह बात आई कहाँ से?

इसका थोड़ा सा जिक्र भी कुलदीप नैयर की किताब में है। वह यह कि 8 जनवरी को सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर आरएसएस को बैन करने के लिए कहा था।

आगे कुलदीप नैयर लिखते हैं; इंदिरा गांधी का आरएसएस के प्रति विरोध/नफ़रत रवैया जग-जाहिर था। वे बहुत हद तक अपने बेटे संजय गांधी के भरोसे रहती थीं। इंदिरा गांधी नहीं चाहती थीं कि जेपी और मोरारजी देसाई जैसे नेताओं को गिरफ़्तार करना पड़े। लेकिन एक समय बाद उनको भी महसूस होने लगा कि इन्हें स्वतंत्र छोड़ना अपने लिए समस्या खड़ी करना होगा।

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कुलदीप नैयर के अलावा कोमी कपूर ने भी अपनी किताब The Emergency: A Personal History में इस तथ्य को अधिक जोर देते हुए उठाया है।

उन्होंने लिखा; अपने आप को प्रगतिशील और उदार दिखाने वाले सिद्धार्थ रे, क़ानून मंत्री एच. आर. गोखले, कांग्रेस अध्यक्ष डी. के. बरुआ (जिन्होंने नारा दिया था 'इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा) रजनी पटेल ने देश में आंतरिक आपातकाल और बड़ी संख्या में विरोधियों की गिरफ़्तारी करने का आईडिया इंदिरा गांधी को दिया था।

कोमी कपूर ने अपनी इस किताब में 8 जनवरी वाले हाथ से लिखे उस पत्र को भी छापा है, जिसकी चर्चा ऊपर की गई है।

रे इस पत्र में 'डियर' इंदिरा से सभी कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों से गिरफ़्तार करने वाले व्यक्तियों की सूची तैयार करने और इस आईडिया को लागू करने के लिए अध्यादेश लाने की सलाह दे रहे हैं। इसे 24 घण्टे में तैयार होने की उम्मीद रखते हुए रे कहते हैं कि राष्ट्रपति इसे अपनी सहमति दे देंगे।

पत्र के अंत में रे ने लिखा कि आप कल होने वाली मीटिंग में शाम तक अध्यादेश तैयार करने पर जोर दीजिए।

सबसे आख़िरी लाइन है, अगर आप मुझसे बात करना चाहें तो मैं कल घर पर रहूंगा।

इन तथ्यों से देखकर कहा जा सकता है कि 1975 की सर्दियों में ही राजनीतिक गर्मी का एहसास हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर जून में जो कुछ हुआ, वह इतिहास है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं। )

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