ईसामसीह ने पुरातन भारतीय सहिष्णुता का सन्देश दिया

ईसामसीह ने पुरातन भारतीय सहिष्णुता का सन्देश दियाफोटो साभार: इंटरनेट

हर साल 25 दिसम्बर को संसार भर में ईसामसीह का जन्मदिन मनाया जाता है और संयोगवश इसी दिन पड़ता है भारतीय राजनीति के पुरोधा अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म दिन। यह दिन वास्तव में बड़ा दिन होता है और सभी धर्मों के लोग ‘‘मेरी क्रिसमस” के अभिवादन के साथ खुशियां मनाते हैं । कुछ लोग मानते हैं भारत के साथ ईसामसीह का घनिष्ट सम्बन्ध था और 12 साल की उम्र से 30 साल की उम्र में वह कश्मीर में रहे, शायद पढ़े और भारतीय जीवन मूल्यों को आत्मसात किया। इस अवधि को ईसा मसीह के जीवन के खोए वर्ष अथवा अज्ञात वर्ष कहा जाता है। पश्चिमी देशों के विद्वान इतने वर्षों में यह पता नहीं लगा सके कि इस अवधि में ईशु कहां थे।

यह तर्क का विषय हो सकता है कि ईशु ने ज्ञान कहां से पाया। कोई पूछ सकता है महायोगी कृष्ण ने गीता का ज्ञान कहां से पाया था। एक बार स्वामी विवेकानन्द से किसी ने पूछा था क्या सबूत है कृष्ण के अस्तित्व का, तो उन्होंने कहा था भगवतगीता प्रमाण है, जिसने भगवत गीता का ज्ञान हमें दिया वही कृष्ण थे। तो क्या सबूत है ईशु ने भारत में अध्ययन किया था, उनका भारतीय सनातन मूल्यों का उपदेश ही इसका सबूत है। सहिष्णुता, परोपकार, अहिंसा, दधीचि जैसा त्याग और दूसरों के लिए जीना हमारी बहुत पुरानी परम्परा रही है। यही सब प्रभु ईशु ने सिखाया जबकि ये मान्यताएं उस समय मध्यपूर्व में नहीं थीं, तब उन्हें कहां से मिलीं। कुछ लोग उन्हें परमात्मा का बेटा मानते हैं लेकिन जो उन्हें केवल महापुरुष मानते हैं उनके लिए यह आस्था का नहीं जिज्ञासा का विषय होगा।

हमारे देश के कुछ लोगा ईसाई धर्म के प्रचारकों का विरोध करते हैं कि वे प्रलोभन और गरीबों को भ्रमित करके धर्म प्रचार करते हैं। चाहे यह सच भी हो लेकिन ईसामसीह का सेवा का सन्देश चाहे जिस कारण आगे बढ़ाया जाए वास्तव में कृष्ण का कर्मयोग ही है। स्वामी विवेकानन्द ने ज्ञान, भक्ति और कर्म में से कर्म को सबसे सरल माना है और उसका पालन किया था। ईसामसीह वास्तव में जीते जागते कर्मयोगी थे, कृष्ण की तरह। हमें उन मूल्यों को स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए, भले ही वे कहीं से आए हों वे हमारी विरासत हैं।

भारत की हजारों साल पुरानी सहिष्णुता को पहली बार मुहम्मद अली जिन्ना ने झकझोर दिया था यह कह कर कि हिन्दू और मुसलमान इस देश में एक साथ नहीं रह सकते और जिन भारतवासियों ने भारत से अलग देश बना लिए उनके पास भी हजारों साल पुरानी सहिष्णुता की साझी विरासत थी। उन्होंने क्या किया उस विरासत का ? भारत ने यह विरासत संजोकर रखी है। भारत के लिए ईसामसीह का सन्देश कोई नया नहीं था और न है। उनके सन्देश को दुनिया में प्रचारित करने का पादरियों का तरीका नया है और भारतीय परम्परा से भिन्न है।

सही कहें तो गाँव के खेतों में बैठा हुआ किसान भी इन पादरियों को बता देगा घट घट में राम बसे हैं। वह जानता है ‘‘सब एक ही हैं”। यह कष्ट का विषय है कि पादरी स्वयं सहिष्णुता का परिचय नहीं देते और सारी दुनिया को बाप्टाइज़ करना चाहते हैं। हम जैसे हैं वैसे ही रहते हुए कृष्ण, ईसा, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द और गांधी को अपने जीवन में उतार सकते हैं जैसे अटल जी ने राजनीति में रहते हुए भी इन मूल्यों को समझा और जिया। पादरी लोगों की आवश्यकता भारत की अपेक्षा लीबिया, ईराक, सीरिया, टर्की, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान में है। ईसामसीह का सन्देश इन स्थानों तक पहुंचाना आज की सबसे बड़ी चुनौती है।

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