कालेधन पर अंकुश के लिए राजनैतिक दलों की संख्या घटे

कालेधन पर अंकुश के लिए राजनैतिक दलों की संख्या घटेकालेधन पर अंकुश के लिए राजनैतिक दलों की संख्या घटे।

देश में 2009 के चुनाव मैदान में 367 राजनैतिक पार्टियां थी और अब तो 1400 राजनैतिक दल चुनाव आयोग के पास पंजीकृत हैं। राजनैतिक दलों की संख्या न केवल चुनावी वातावरण को प्रदूषित करती है बल्कि कालेधन का अथाह स्रोत बन चुकी है। इनमें से अनेक का जन्म ही कालाधन जुटाने और खपाने के लिए हुआ होगा। अब इस मुद्दे पर चुनाव आयोग और वर्तमान सरकार गभ्भीरता से विचार कर रही है। विचित्र बात यह है कि यह सभी राजनैतिक दल सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 से बाहर रहना चाहते हैं। सरकार ने संकेत दिया है करीब 250 दलों की मान्यता रद्द हो सकती है। यह सुखद सन्देश है क्योंकि इन जैसी सैकड़ों पार्टियों के मैदान से हटने से चुनावी वातावरण प्रदूषण मुक्त हो सकता है।

अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस और जर्मनी जैसे तमाम प्रजातांत्रिक देशों में राजनैतिक पार्टियां नियोजित हैं- बस दो या तीन, और उनका प्रजातंत्र आराम से चलता है। उन देशों में पार्टियां विचारधारा पर आधारित होती हैं और विचारधाराएं सैकड़ों की संख्या में नहीं हो सकतीं। इसके विपरीत हमारे देश की पार्टियां अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग अलापती रहती हैं। अधिकतर पार्टियां या तो व्यक्तियों अथवा परिवारों द्वारा संचालित होती हैं अतः उनकी कोई सीमा नहीं हो सकती। इतना तो लगता है कि जिस अनुपात में देश में कालाधन बढ़ा है उसी अनुपात में राजनैतिक दलों की संख्या बढ़ी है।

जब देश आजाद हुआ तो सबसे पुराना दल कांग्रेस पार्टी अनेक विचारधाराओं वाले लोगों का संगम थी जो आजादी की लड़ाई के लिए एक़त्रित हुए थे। इस दल में समाजवादी, साम्यवादी, उदारवादी, हिन्दूवादी, पूंजीवादी और ना जाने कितनी विचारधाराओं को मानने वाले लोग थे। उस रूप में कांग्रेस की भूमिका एक राजनैतिक दल के रूप में नहीं बनती थी, शायद इसीलिए महात्मा गांधी ने कहा था कि कांग्रेस पार्टी को भंग कर देना चाहिए क्योंकि उसका काम पूरा हो चुका था। कांग्रेस के नेताओं ने गांधी जी की बात नहीं मानी। कांग्रेस पार्टी उसी रूप में चलती रही और आजादी प्राप्ति को भुनाती रहीं राज करती रहीं।

कांग्रेस के विषय में गांधी जी की आशंका पचास के दशक में ही सामने आने लगी थी जब कांग्रेस पार्टी का विघटन आरम्भ हो गया था। आचार्य जेबी कृपलानी की अगुवाई में पहले किसान मजदूर प्रजा पार्टी फिर बाद में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनी। डॉ. राम मनोहर लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी फिर लोहिया, कृपलानी और अशोक मेहता की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी बनी। बाद में ना जाने कितने समाजवादी दल बने। आज तो समाजवाद के नाम पर बनी पार्टियां परिवारवाद के दायरे से बाहर नहीं निकल पा रही हैं।

1988 में वीपी सिंह के नेतृत्व में जनता दल का गठन हुआ था जिसमें शामिल हुए थे जन मोर्चा, लोकदल, कांग्रेस (एस) आदि। ऐसा लगा था कि राजनैतिक दलों का सार्थक विलय हुआ है। कालान्तर में जनता दल के ना जाने कितने टुकड़े हुए - जनता दल (सेकुलर), जनता दल (यूनाइटेड), राष्ट्रीय जनता दल, बीजू जनता दल, राष्ट्रीय लोक दल और भी अनेक दल। क्या इनमें वैचारिक मतभेद हैं जो 1989 में नहीं थे जब सभी सरकार में शामिल थे। इनमें से अनेक तो क्षेत्रीय दल हो गए हैं और ऐसे ही क्षेत्रीय दलों की बढ़ती संख्या के कारण राजनैतिक दलों की आबादी बहुत अधिक हो गई है।

यदि सरकार संविधान संशोधन करके सूचना के अधिकार अधिनियम को कुन्द करने के बजाय राजनैतिक दलों का परिवार नियोजन करने और उनमें पारदर्शिता लाने का संशोधन पास करे जिससे राजनैतिक दलों का पंजीयन इतना आसान ना रहे। चुनाव आयोग को सुविधा होगी, श्रम और धन की बर्बादी घटेगी, आम आदमी को प्रचार के ध्वनि प्रदूषण से राहत मिलेगी और कालेधन के उपयोग का एक स्रोत घटेगा।

sbmisra@gaonconnection.com

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