मनरेगा ने ग्रामीणों को क्या दिया इसकी समीक्षा होनी चाहिए

मनरेगा ने ग्रामीणों को क्या दिया इसकी समीक्षा होनी चाहिएफोटो: विनय गुप्ता

कुछ समय पहले सरकार ने न्यूनतम मजदूरी 350 रुपया प्रतिदिन की घोषणा कर दी लेकिन मजदूरों को काम नहीं मिल रहा है तो घोषणा से क्या लाभ। अभी तक मनरेगा में 160 रुपया प्रतिदिन का प्रावधान था तो किसान भी यही मजदूरी दे देता था। दफ्तर में बैठकर घोषणा करना एक बात है और उसका व्यावहारिक पक्ष दूसरी बात। अधिकांश जगहों पर मनरेगा बन्द पड़ा है और सरकारी काम अधिकतर मशीनों से होते हैं। आम किसान भी अब ट्रैक्टर, थ्रेशर, जेबीसी जैसी मशीनों का सहारा लेने लगा है और मजदूर बढ़ी मजदूरी की अपेक्षा करेगा जो मिलेगी नहीं इसलिए बेकार बैठना पड़ेगा। यदि अधिकाधिक स्किल्ड लेबर तैयार किए जाएं तो उन्हें रखना जरूरी होगा।

वैसे भी महात्मा गांधी के नाम पर बना रोज़गार गारंटी अधिनियम अपने में भ्रामक और अपूर्ण है क्योंकि इस योजना के अन्तर्गत आधी अधूरी गारंटी है। इसका उद्देश्य था ग्रामीण आबादी की क्रय शक्ति बढ़ाना, मजदूरों का गाँवों से पलायन रोकना और उपयोगी संसाधनों का निर्माण करना। केवल 100 दिन का काम मिलना है जो कागज पर बढ़ता रहता है व्यवहार में आधे दिन का काम भी नहीं मिलता और मजदूरी भी विलम्ब से मिलती है। इस तरह मजदूरों का शहर को पलायन नहीं रुक सकता क्योंकि वहां अधिक मजदूरी मिलती है और पैसा रोज मिलता है तो शहर भागना मजदूर के लिए एकमात्र विकल्प है।

सरकार यह समझती है कि मनरेगा के माध्यम से उन्होंने गाँवों का उद्धार कर दिया है। उनका सोचना है कि गाँव के लोग मजदूरी करके घर में जो रुपया ला रहे हैं उससे उनका और उनके परिवारों का कल्याण हो जाएगा। घोषणा के अनुसार यदि मजदूर को मनरेगा में 100 दिनों तक 350 रुपया प्रतिदिन मिल भी गया तो उसकी अपेक्षा बढ़ चुकी होगी और वह बाकी के 265 दिनों में भी 350 रुपए प्रतिदिन की उम्मीद करेगा। गाँव के किसान इतनी मजदूरी नहीं दे सकते तो मजदूर काम पर जाता ही नहीं इसलिए ऐसी घोषणाएं व्यावहारिक नहीं हैं केवल मजदूरों को बिगाड़ रही हैं। ऐसा लगता है मानो हमारी सरकार गाँववालों को फावड़ा चलाने लायक ही समझती है और उनकी सन्तानों को भी इसी लायक बना रही है। अब तो फावड़ा भी बन्द है।

सरकार ने जब मनरेगा के जरिए देहातों में कुछ दिनों के लिए पैसा बड़ी मात्रा में भेजा तो गाँव-गाँव में शराब की दुकानें खोल दी। इन दुकानों पर दिनभर मजदूरी करके शाम को ग्रामीण मजदूर देखे जाते थे। लगभग प्रत्येक बाजार में, बड़े कस्बों में कभी तो स्कूलों के पड़ोस में भी शराब की दुकाने खुली हैं। सरकार नें गाँवों को खुशहाल बनाने की भले सोची हो लेकिन उसका परिणाम उल्टा दिख रहा है। मजदूरों में परिश्रम करने की आदत और उद्यमशीलता घट रही है, आलस और आराम पर ध्यान है।

साथ ही फावड़ा चलाने की क्षमता न रखने वाले लोग काम के अभाव में और प्रशिक्षण की कमी के कारण बेकार हो रहे हैं। गाँव के परम्परागत कारीगर जैसे बढ़ई, लोहार, राजमिस्त्री, सोनार, कुम्हार, मनिहार और माली जैसे लोगों के लिए काम नहीं है। क्या उनसे फावड़ा चलाने की अपेक्षा करती हैं हमारी सरकारें।

sbmisra@gaonconnection.com

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