गणतंत्र दिवस पर विशेष: क्या भारत का बंटवारा रोकना सम्भव हो सकता था ?

गणतंत्र दिवस पर विशेष: क्या भारत का बंटवारा रोकना सम्भव हो सकता था ?जिन्ना को बहुत समय तक भारत विभाजन अथवा पाकिस्तान बनाने में कोई रुचि नहीं थी।

महात्मा गांधी ने वायसराय माउन्टबेटन से आग्रह पूर्वक कहा कि भारत का बंटवारा मत कीजिए। वायसराय का जवाब था ‘‘विकल्प क्या है”। गांधी जी ने पूरे विश्वास से कहा था, विकल्प है।अन्तरिम सरकार को बर्खास्त करके जिन्ना के नेतृत्व में वैकल्पिक सरकार बना दीजिए। जिन्ना शायद यही चाहते थे लेकिन इस प्रस्ताव को नेहरू ने नहीं माना। इतिहासकार दुर्गादास का मानना है कि यदि गांधी जी का सुझाव मान लिया गया होता तो शायद भारत का विभाजन नहीं होता।

महात्मा गांधी को यह उम्मीद न रही होगी कि उनकी बात जवाहर लाल नेहरू नहीं मानेंगे जिन्हें कुर्सी तक स्वयं महात्मा गांधी ने पहुंचाया था या पटेल इनकार कर देंगे जिन्होंने गांधी के एक इशारे पर प्रधानमंत्री की कुर्सी नेहरू के लिए छोड़ दी थी। यह वही अन्तरिम सरकार थी जिसके नेहरू प्रधानमंत्री थे, पटेल गृहमंत्री और लियाकत अली खां जो बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने, वित्त मंत्री थे। नेहरू सरकार को बर्खास्त करने की बात कहते हुए गांधी जी के मन में कितनी पीड़ा हुई होगी इसकी हम कल्पना मात्र कर सकते हैं। यह वही जवाहर लाल नेहरू थे जिन्हें नेतृत्व सौंपने के लिए गांधी जी ने बड़ी जतन से सुभाष चन्द्र बोस को अलग किया था और वल्लभ भाई पटेल को समझाकर किनारे किया था।

ऐसी घड़ी में गांधी जी को सुभाष चन्द्र बोस की याद आई थी और उन्होंने कहा था ‘‘बोस एक सच्चे देशभक्त थे’’। तब बहुत देर हो चुकी थी, बोस इस दुनिया में शायद नहीं थे। दुर्गादास का मानना है कि यदि बोस के हाथ में देश की कमान होती तो बटवारा नहीं होता। लेकिन जिन्ना पर गांधी जी की उम्मीद का कोई ठोस आधार नहीं था। जिन्ना ने कांग्रेस छोड़ी थी गांधी जी के कारण और कड़वाहट पैदा हई थी, नेहरू-जिन्ना टकराव के कारण। फिर भी जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाकर देश का विभाजन टल जाता और इतना खूनखराबा न होता, इस पर विश्वास नहीं होता।

मुहम्मद अली जिन्ना एक ऐसे इंसान थे जो कभी हज करने नहीं गए, पांच बार नमाज़ नहीं पढ़ते थे, जिन्हें कुराऩ़ की आयतें भी ठीक से नहीं आती थीं, पोर्क से परहेज़ नहीं था, अविभाज्य भारत में विश्वास रखते थे, कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे और कट्टरपंथी मुसलमानों से दूर रहते थे। जिन्ना को बहुत समय तक भारत विभाजन अथवा पाकिस्तान बनाने में कोई रुचि नहीं थी।

जिन्ना को अपमान का घूंट कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में पीना पड़ा जब उन्होंने खिलाफत आन्दोलन के लिए गांधी जी के सत्याग्रह के तरीके का विरोध करते हुए कहा था ‘‘मिस्टर गांधी’’ आप तुरन्त सत्याग्रह के ज़़रिए अनपढ़ हिन्दुस्तानियों को भड़काने का काम बन्द कर दीजिए। गांधी जी के अनुयायी जिन्ना पर भड़क गए थे और चीख कर बोले ‘‘महात्मा गांधी’’ बोलो। गांधी जी स्टेज पर मौजूद थे परन्तु बोले कुछ नहीं। धीरे-धीरे जिन्ना का कांग्रेस से मोहभंग होता गया। उन्हें कांग्रेस में अपना भविष्य नहीं दिखा और अलगाव का नारा बुलन्द कर दिया।

सच यह है कि जिन्ना को मुस्लिम लीग की जरूरत पड़ गई और मुस्लिम लीग को ‘‘कायदे आज़म’’ की। दोनों ने एक-दूसरे का इस्तेमाल किया। पता नहीं कहां तक सही है लेकिन कहते है आखिरी दिनों में एक बार जिन्ना के कमरे से निकलते हुए लियाकत अली को यह कहते हुए सुना गया ‘‘बुड्ढे को अपने किए पर पछतावा हो रहा है’’।

सच्चाई यह है कि जब कांग्रेस ने जीती बाजी हार में बदल दी और प्रान्तीय सरकारों से इस्तीफा दे दिया तो अंग्रेजों का रहा सहा विश्वास भी खो दिया। जिन्ना का उत्साह बढ़ गया और 1939 में डेलिवरेन्स डे का एलान कर दिया, जिसमें बेहद खून खराबा हुआ। अंग्रेजों को जिन्ना का समर्थन चाहिए था और जिन्ना को अंग्रेजों का। मुस्लिम लीग और अंग्रेजों की दूरियां घटती गईं और भारत विभाजन की राह साफ हाती गई।

मुहम्मद अली जिन्ना और जवाहर लाल नेहरू दोनों ही तेज दिमाग के नेता थे, उन्हें किसी दूसरे का नेतृत्व स्वीकार नहीं था। जिन्ना के साथ एक और कठिनाई थी, उनके पास समय बहुत कम था। उनके फेफड़ों में टीबी या कैंसर था, जिसे बम्बई के चेस्ट स्पेशलिस्ट डाक्टर पटेल और स्वयं जिन्ना के अलावा कोई नहीं जानता था। वह बहुत जल्दी में थे, बेताब थे। उस बेताबी में जिन्ना ने अपनी तकरीरों से मुसलमानों में वही उन्माद पैदा किया।

हम जिन्ना को सेकुलर नहीं कह सकते क्योंकि उनके जीवन का अन्तिम फैसला सेकुलर नहीं था। पटेल और नेहरू ने गांधी जी की बात नहीं मानी और जिन्ना को सम्पूर्ण भारत का प्रधानमंत्री नहीं बनाया अन्यथा पूरे भारत की वही दशा होती जो आज पाकिस्तान की है।

sbmisra@gaonconnection.com

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