नई कक्षा, नई ड्रेस: तेज़ बारिश में भी, स्कूल के पहले दिन उपस्थित हुए बच्चे

नई कक्षा, नई ड्रेस: तेज़ बारिश में भी, स्कूल के पहले दिन उपस्थित हुए बच्चे

हम कई दिनों से स्कूल नहीं आये थे। आज तो छुट्टियों के बाद स्कूल खुलने का पहला दिन था तो हमको आना ही था

Jigyasa Mishra

Contributor

Jigyasa Mishra   

3 July 2018 11:05 AM GMT

Multimedia reporter cum feature writer/photographer.

रस्यौरा(सीतापुर)। सर पर बस्ता रखे, बारिश में खुद को भीगने से बचाते हुए, तनु और विजय महीने भर की छुट्टी के बाद आज स्कूल पहुँच रहे हैं। विजय बीच में रुक कर पानी से भरे गढ्ढों में कूदना चाहता है, पर तनु ने उसे आँखें दिखाईं और फिर दोनों स्कूल की ओर चल दिए।

तनु और विजय खैराबाद ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय रस्यौरा के विद्यार्थी हैं। खैराबाद, सीतापुर जिले से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।



लगभग 45 दिनों तक गर्मी की छुटियाँ मनाने के बाद जब बच्चे 2 जुलाई को अपने-अपने घरों से स्कूल जाने के लिए निकले, तभी मानसून उन पर मेहरबान हो गया। पर बच्चे कहाँ किसी से कम ज़िद्दी होते हैं। "हम कई दिनों से स्कूल नहीं आये थे। आज तो छुट्टियों के बाद स्कूल खुलने का पहला दिन था तो हमको आना ही था," अरुण (9 वर्ष) ने कहा।

आम तौर पर स्कूलों के खुलने के बाद ड्रेस-वितरण होते-होते एक महीना लग जाता है पर जब बेसिक शिक्षा अधिकारी ने आकर बच्चों को नए सत्र के पहले ही दिन यूनिफार्म बाँटें तो बच्चों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।

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9 साल की रेशमा पैकेट में कैद अपनी नई स्कूल-ड्रेस को बस्ते में संभाल के रखते हुए बताती है, "पुरानी स्कर्ट छोटी हो गई थी अब कल से मैं नयी पहन के आऊंगी।"

कुछ बच्चों को स्कूल-ड्रेस पाने की जल्दी थी तो कुछ अगली कक्षा में प्रवेश पाने के लिए काफ़ी उत्साहित दिखे। "मैंने अपनी पुरानी किताबें अपने छोटे भाई को दे दी हैं। मुझे तो अब पाचवीं की किताबें मिलेंगी," दुर्गेश यादव (12 वर्ष) ने बताया।

रस्यौरा के इस प्राथमिक विद्यालय में गाँव भर के 161 छात्र नामांकित हैं जिसमें से प्रतिदिन आने वालों की संख्या औसतन 120-140 रहती है। इस सकारात्मक बदलाव का श्रेय विद्यालय प्रबंधन समिति को देते हुए, प्रधान अध्यापक पवन कुमार यादव बताते हैं, "सपना और धर्मेंद्र हर मीटिंग में वक़्त से उपस्थित होते हैं और कोशिश करते हैं की बाकी बच्चों के अभिभावक, जो की प्रबंधन समिति के सदस्य नहीं हैं, वो भी उपस्थित हों।"



"पहले उपस्थित छात्रों की संख्या 40 प्रतिशत हुआ करती थी जो अब 60 से 80 प्रतिशत हो गई है," वह बताते हैं।

तीन हज़ार की आबादी वाले इस गाँव में ज़्यादातर लोग मज़दूरी का काम करते हैं। यही वजह है कि विद्यालय प्रबंधन द्वारा आयोजित बैठकों में बच्चों की माताएं ही आ पाती हैं। "हम सभी अभिभावकों को बुलाते तो हैं पर लगभग सभी पुरुष मजदूरी के लिए जाते हैं और काम छोड़ कर आना नहीं चाहते। लेकिन 60-70% बच्चों की माताएं ज़रूर बैठक में सम्मिलित होती हैं और कुछ तो अपने बच्चों की शिकायत भी लगाती हैं कि उनका बच्चा शरारत करता है या स्कूल नहीं आना चाहता। हमें तो लगता है कि यह जागरूकता भी एक सकारात्मक बदलाव ही है," सपना देवी, जो विद्यालय प्रबंधन समिति की उपाध्यक्ष हैं, बताती हैं।

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