आजमाएं आधुनिक औषधि विज्ञान और आदिवासियों के हर्बल फॉर्मूले

आजमाएं आधुनिक औषधि विज्ञान और आदिवासियों के हर्बल फॉर्मूलेआदिवासियों के पारंपरिक हर्बल ज्ञान विज्ञान की मुहर।

पिछले एक दशक से ज्यादा समय से आधुनिक विज्ञान का एक बड़ा तबका पारंपरिक हर्बल ज्ञान का लोहा मानने लगा है फिर भी इस जमात में ना जाने ऐसे कितने ही लोग हैं जो आज भी पारंपरिक हर्बल ज्ञान को दकियानूसी और बकवास मानते हैं।

उनके हिसाब से यह ज्ञान गैर-वैज्ञानिक, पुराना, अप्रमाणित, बेअसर और खतरनाक है। ये बात मेरी समझ से परे है कि यदि परंपरागत हर्बल ज्ञान इतना बेअसर, गैर-वैज्ञानिक और खतरनाक है तो फिर आधुनिक विज्ञान को अपनी दुकान बंद कर देनी चाहिए क्योंकि आधे से ज्यादा आधुनिक औषधियों को पौधों से प्राप्त किया जा रहा है और इन सब औषधियों के पीछे पारंपरिक ज्ञान ही वजहें रही हैं।

यदि हल्दी का उपयोग कर शरीर के 10 से ज्यादा विकारों पर विजय पाई जा सकती है और कोई मुझसे ये पूछे कि इस बात की गारंटी क्या है कि हल्दी शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाएगी, तो मुझे हंसी के अलावा क्या आएगी?

सदियों से हल्दी हमारे खान-पान के हर दिन का हिस्सा है, सदियों से सर्दी-खांसी के लिए दादी और माताओं ने बच्चों को हल्दी का दूध ही पिलाया है, अब भला कौन सा खतरा? रही बात क्लीनिकल प्रमाण की, तो क्या वाकई इसकी जरूरत है? क्या हल्दी को एक बार फिर चूहों, बंदरों और फिर मनुष्यों को खिलाकर विज्ञान का स्टाम्प लिया जाए और बताया जाए कि इसके सेवन से कोई शारीरिक खतरे नहीं हैं? सोच बदलने की जरूरत है, सच्चाई को समझने की जरूरत है।

बजाय इसके कि हम पारंपरिक हर्बल ज्ञान को एक झटके में नकार दें, या इसे भला बुरा कहें, बेहतर है हाथ मिलाकर काम किया जाए, प्रमाणन की जरूरत है तो प्रमाणित करके भी देखा जाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए। चलिए जिक्र करते हैं कुछ पेड़ों से संबंधित आदिवासियों के पारंपरिक हर्बल ज्ञान का जिन पर आधुनिक विज्ञान भी ठप्पा लगाने पर मजबूर है, आखिर इस ज्ञान में दम जो है।

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पातालकोट के आदिवासी मानते है कि बांस के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीने से स्त्रियों में रुका हुआ मासिक-धर्म पुन: शुरू हो जाता है।

बांस

भारतवासी प्राचीन काल से दवा की तरह बांस का उपयोग करते रहे हैं। बांस का वानस्पतिक नाम बैंबूसा अरंडिनेसीया होता है। पातालकोट के आदिवासी मानते है कि बांस के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीने से स्त्रियों में रुका हुआ मासिक-धर्म पुन: शुरू हो जाता है। शहद के साथ बांस के पत्तों का रस मिलाकर लेने से खांसी खत्म हो जाती है।

डांग- गुजरात में बांस की छोटी-छोटी टहनियों तथा पत्तियों को डालकर उबाला गया पानी, जानवरों को बच्चा होने के बाद पेट की सफाई के लिए दिया जाता है। इन सभी फार्मुलों पर आधुनिक विज्ञान के प्रमाणित दावे उपलब्ध हैं।

आदिवासियों के अनुसार महुआ की छाल का काढ़ा तैयार कर प्रतिदिन 50 मिली लिया जाए तो चेहरे से झाईयां और दाग-धब्बे दूर हो जाते है।

महुआ

महुआ एक विशाल पेड़ होता है जो अक्सर खेत, खलिहानों, सड़कों के किनारों पर और बगीचों में छाया के लिए लगाया जाता है और इसे जंगलों में भी प्रचुरता से देखा जा सकता है। महुआ का वानस्पतिक नाम मधुका इंडिका है। आदिवासियों के अनुसार महुआ की छाल का काढ़ा तैयार कर प्रतिदिन 50 मिली लिया जाए तो चेहरे से झाईयां और दाग-धब्बे दूर हो जाते है। इसी काढ़े को यदि त्वचा पर लगाया जाए तो फोड़े फुन्सियां आदि से छुटकारा मिल जाता है।

वैसे डांग- गुजरात के आदिवासी इसी फार्मूले का उपयोग गाठिया रोग से परेशान रोगियों के लिए करते हैं। किसी व्यक्ति की नाक से अक्सर खून आने की शिकायत हो तो महुआ के ताजे फूलों का 2-3 चम्मच रस लेने से यह समस्या खत्म हो जाती है। पातालकोट के आदिवासी महुआ की टहनियों का इस्तमाल दातून की तरह करते है, उनके अनुसार ऐसा करने से दांत मजबूत और मसूड़ों से खून आना बंद हो जाता है। महुए के इन गुणों पर अनेक आधुनिक शोधों के सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं।

आदिवासी शीशम के पत्तों से बने तेल को भी घाव पर लगाते है, जिससे घाव जल्दी ठीक होता है।

शीशम

मध्य भारत में प्रचुरता से पाए जाने वाला शीशम फर्नीचर और मकानों में इस्तेमाल की जाने वाली लकड़ियों के लिए प्रसिद्ध है। शीशम का वानस्पतिक नाम डलबर्जिया सिस्सु हैं। इसकी फल्लियों में टैनिन नामक रसायन खूब पाया जाता है, फल्लियों को सुखाकर चूर्ण बना लिया जाए और इस चूर्ण को घावों पर लगाया जाए तो घाव जल्द ही सूख जाते है। आदिवासी शीशम के पत्तों से बने तेल को भी घाव पर लगाते है, जिससे घाव जल्दी ठीक होता है।

पातालकोट के आदिवासियों के अनुसार शीशम के हरे और कोमल पत्तों को पानी में डालकर रात भर के लिए ढककर रख दें, सुबह इन्हें निचोड़कर छान लिया जाए और मिश्री मिलाकर खाने से वीर्य संबंधी रोगों में फायदा होता है। शीशम संबंधित आदिवासियों के अनेक दावों को विज्ञान ने भी प्रमाणित किया है।

बुखार की अवस्था में जब सिर दर्द हो तो सिवान की पत्तियों को पीसकर सिर पर लेप करने से दर्द और जलन समाप्त हो जाती है।

सिवान

सिवान एक इमारती लकड़ी देने वाला पेड़ है जो मध्य भारत में प्रचुरता से देखा जा सकता है। इसका वानस्पतिक नाम मेलिना अरबोरिया है। बुखार की अवस्था में जब सिर दर्द हो तो सिवान की पत्तियों को पीसकर सिर पर लेप करने से दर्द और जलन समाप्त हो जाती है। पातालकोट के आदिवासियों के अनुसार सिवान की जड़ का 3 ग्राम चूर्ण का सेवन करने से पेट का दर्द ठीक हो जाता है तथा यह मल को ढीला भी करता है।

गर्मी के दिनों में लू, शरीर की गर्मी व जलन दूर करने के लिये सिवान के फल का गूदा एकत्र कर ठण्डा शर्बत बनाकर पिया जाए तो लाभ मिलता है। सिवान की जड़ का काढ़ा (50 से 73 मिली) सुबह खाली पेट पिलाने से आंतों के कीड़े़ मर जाते है।

पथरी होने पर सेमल की छाल का सेवन चीनी के साथ करना लाभकारी होता है।

सेमल

सेमल को कॉटन ट्री के नाम से भी जाना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम बॉम्बैक्स सेइबा है। दस्त लगने पर सेमल की छाल का पाउडर (5-10 ग्राम) चीनी के साथ खाया जाए तो तुंरत आराम मिलता है। मुहांसों के उपचार के लिए सेमल के कांटों को गुलाब जल में घिसकर चेहरे पर लगाना चाहिए।

आंखों के आस-पास होने वाले काले धब्बे (डार्क सर्कल्स) ठीक करने के लिए सेमल के कांटों को दूध में घिसकर दागनुमा हिस्सों पर लगाना चाहिए। पथरी होने पर सेमल की छाल का सेवन चीनी के साथ करना लाभकारी होता है।

महारुख

महारुख एक विशाल 60- 80 फीट ऊंचा पेड़ होता है जो अक्सर सड़क के किनारे, बगीचों आदि में उगता पाया जाता है। इसका वानस्पतिक नाम ऐलेन्थस एक्सेल्सा है। इसकी छाल में ग्लोकारूबिन, ग्लोकारूबिनोन, एक्सेल्सिन, एलेन्टिक अम्ल, बीटा- सिटोस्टेराल जैसे महत्वपूर्ण रसायन पाए जाते है।

इसकी छाल और पत्तियों का काढ़ा महिलाओं में प्रसव के बाद होने वाली दुर्बलता के लिए बेहतर माना जाता है। इसकी पत्तियों का रस 20 मिली, ताजे गीले नारियल को पीसकर तैयार किया गया दूध (40मिली), मिश्री और शहद का मिश्रण पिलाने से प्रसूता महिला को ताकत मिलती है। पातालकोट के आदिवासियों के अनुसार इसकी जड़ों का चूर्ण प्रतिदिन 3 बार लेने से संधिवात में आराम मिलता है। इसकी पत्तियों को अदरख और कपूर की समान मात्रा के साथ कुचलकर लेपित करने से कमर दर्द और जोड़ों के दर्द में काफी आराम मिलता है।

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