मजदूरों की बेटियां भी चाहतीं हैं पढ़-लिखकर आगे बढ़ना

मजदूरों की बेटियां भी चाहतीं हैं पढ़-लिखकर आगे बढ़नामजदूरों की बेटियां भी चाहतीं हैं पढ़-लिखकर आगे बढ़ना। 

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

कानपुर। “मेरे पापा की सड़क हादसे में मौत हो चुकी है, मम्मी और मेरी दीदी दूसरे के खेतों में मजदूरी करके हम सबका पेट भरती हैं। आठवीं के बाद पढ़ाई करने के बारे में तो हम सोच भी नहीं सकते।” ये कहना है मजदूर श्रमिक की बेटी लबली देवी (13 वर्ष) का।

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ये सोचना सिर्फ लबली का नहीं है बल्कि देश में काम कर रहे लाखों मजदूर के बच्चे पढ़ना चाहते हैं, लेकिन पर्याप्त संसाधन न मिलने की वजह से ये शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। कानपुर देहात जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर गजनेर के हिलौडी गाँव में रहने वाली लबली देवी के पिता चार साल पहले मजदूरी करके लौट रहे थे तभी एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गयी। लबली चार बहनें और एक भाई है। दूसरे नम्बर की लबली उदास होकर बताती हैं, “मैं ही छोटे भाई-बहनों को खिलाती हूं। मम्मी दूसरे जिले में जाकर मजदूरी करती हैं।” लबली ने एक साल पहले श्रमिक विभाग के विहान आवासीय बालिका विद्यालय नौबस्ता कानपुर में दाखिला लिया। वो अपनी कक्षा में सबसे होशियार है, लेकिन यहां आकर जब उसे ये पता चला कि ये आवासीय विद्यालय सिर्फ आठवीं तक है तो इस बात से वो चिंतित हो गई।

लबली ये बताते हुए भावुक हो जाती हैं कि मेरी सभी बहनें पढ़ना चाहती हैं पर मां के पास उतने पैसे नहीं हैं, जिससे वो सभी को पढ़ा सकें। मेरी बड़ी दीदी 15 साल की हैं और 11 साल की उम्र से दूसरों के खेत में आलू बीनती हैं जो पैसा मां और दीदी की मजदूरी से मिलता हैं उसी से घर का पूरा खर्चा चलता हैं। लबली प्रदेश में मजदूर की पहली बेटी नहीं है जो आठवीं के बाद भी पढ़ना चाहती हैं, बल्कि लबली की तरह मजदूरों की हजारों बेटियां हैं जो आगे की पढ़ाई करना चाहती हैं पर मजदूरी करने की वजह से वो पढ़ाई से वंचित रह जाती हैं।

कानपुर देहात के ही मुक्तापुर गाँव की रहने वाली रिचा पाल आठवीं में पढ़ती हैं। रिचा बताती हैं, “मेरी मां दूसरों के घरों में बर्तन मांजती है। पापा बीमार रहते हैं बिस्तर से नहीं उठ पाते हैं। घर में रहकर तो पढ़ाई हो नहीं सकती, क्योंकी कुछ न कुछ काम करना पड़ता है।” वो आगे बताती है, “आवासीय विद्यालय अगर 12वीं तक हो जाए तो हमारी पढ़ाई आसानी से पूरी हो जायेगी। हम अच्छे से पढ़ाई करेंगे तो हमारी नौकरी भी लग सकती है। इसके बाद हमारे मम्मी को दूसरों के घर के बर्तन नहीं मांजने पड़ेंगे।”

ईंट-भट्ठों पर काम करते हैं 80 लाख मजदूर

उत्तर प्रदेश के 1800 ईंट भट्ठे हैं, जिसपर 80 लाख मजदूर काम करते हैं। कानपुर में 280 ईंट-भट्टे हैं। ईंट-भट्टों में काम करने की वजह से मजदूरों के बच्चे पूरे साल की पढ़ाई एक जगह रहकर नहीं कर पाते हैं इसलिए इनके लिए आवासीय विद्यालय की जरूरत है। पूरे प्रदेश में 12 बालक और 12 बालिकाओं के विद्यालय हैं। एक विद्यालय में 100 बच्चे ही पढ़ सकते हैं जो कि 80 लाख मजदूर के बच्चों के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

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