बजट की कमी के कारण खंडहर हो रहा 30 साल पुराना रायबरेली का राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय

Devanshu Mani TiwariDevanshu Mani Tiwari   5 Feb 2017 12:01 PM GMT

बजट की कमी के कारण खंडहर हो रहा 30 साल पुराना रायबरेली का राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालयबजट की कमी के चलते नहीं सुधर रही अस्पतालों की हालत

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। रायबरेली जिले में 80 के दशक में बनवाए गए राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय में आज भी लीवर और किडनी की खतरनाक बीमारियों का इलाज होता है। 25 बेड वाला आयुर्वेदिक अस्पताल आज बजट की कमी के चलते बदहाली का शिकार हो गया है। हालत यह है कि अस्पताल परिसर किसी खंडहर से कम नहीं लगता है।

राज्यों में स्थापित आयुर्वेदिक चिकित्सालयों की हालत सुधारने के लिए केंद्र के साथ-साथ प्रदेश सरकारों को भी अन्य अस्पतालों की तरह ही आयुर्वेदिक चिकित्सालयों की करीब से निगरानी करनी चाहिए और समय पर बजट आवंटन करना चाहिए, नहीं तो स्थिति बद से बत्तर हो सकती है।
- डॉ. एन श्रीकांत, उपमहानिदेशक, आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद।

आयुर्वेदिक चिकित्सालय के बारे में अस्पताल के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. शशांक द्विवेदी बताते हैं, “अस्पताल की मरम्मत व इसके नवीनीकरण के लिए आयुष मंत्रालय से पैसा जारी हो चुका है, पर अभी जिला योजना समिति की बैठक में अस्पताल के लिए बजट प्रस्तावित नहीं हुआ है। इसलिए अस्पताल का निर्माण अभी रुका हुआ है।’’ आयुष मंत्रालय द्वारा जारी राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालयों का बजट पहले जिला स्वास्थ्य विभाग में आता है। इसके बाद यह बजट जिला योजना समिति, निर्धारित राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय में भेजती है।

रायबरेली जिले के इस आयुर्वेदिक चिकित्सालय की तरह ही प्रदेश के हज़ारों आयुर्वेदिक अस्पताल आज बजट की कमी के चलते अच्छी हालत में नहीं हैं। आयुर्वेदिक चिकित्सा विभाग (आयुष -1), उत्तर प्रदेश के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में वर्तमान समय में कुल 2,105 आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी और होम्योपैथी चिकित्सालय हैं।

इन चिकित्सालयों में कुल 10,597 बेड हैं, पर सरकार द्वारा आर्थिक सहायता समय से ना मिल पाने के कारण ये अस्पताल खस्ता हालत में हैं। भारत में आयुर्वेदिक चिकित्सालयों की खराब दशा के बारे में आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आयुष मंत्रालय), भारत सरकार के उपमहानिदेशक डॉ. एन श्रीकांत बताते हैं,’’ भारत में लाखों आयुर्वेदिक चिकित्सालय हैं, जिनमें हर रोज़ सवा लाख से ज़्यादा मरीज़ों का इलाज होता है।

मंत्रालय से आए बजट से सभी जनपदों में स्थापित किए गए अस्पतालों में दवाइयों का प्रबंध किया जाता है। अस्पताल के सुधार व निर्माण के लिए अलग से कोई पैसा नहीं आता है।
- डॉ. अरुणेश चंद्र त्रिपाठी, पूर्व क्षेत्रीय अधिकारी, यूनानी निदेशालय उत्तर प्रदेश।

यह बात सच है कि इन अस्पतालों की बेहतरी के लिए पैसा देर से पहुंचता है और शायद यही एक बड़ा कारण है कि आयुर्वेदिक अस्पतालों की आज भी अच्छी हालत नहीं है।’’ प्रदेश में राजकीय आर्युवेदिक चिकित्सालयों के बुरे हाल पर प्रांतीय अध्यक्ष आर्युवेद एवं यूनानी चिकित्सा, उत्तरप्रदेश बताते हैं,’’ हर वर्ष आयुष विभाग प्रदेश में आर्युवेदिक चिकित्सालयों के लिए एक से डेढ़ करोड़ का बजट प्रदान करती है। इससे सिर्फ अस्पतालों की दवाएं ही आ पाती है। अस्पतालों की हालत में सुधार के लिए आयुष मंत्रालय से कोई भी बजट नहीं आता है। इसलिए ज़्यादातर अस्पताल खराब हालत में हैं।’’

आंकड़ों ने बदली तस्वीर

आयुर्वेदिक अस्पतालों की बदहाली के कारण लोग अब अपने इलाज के लिए एलोपैथी को आयुर्वेदिक पद्धति से ज़्यादा कारगर मान रहे हैं। वर्ष 2014-15 में राष्ट्रीय पतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में ग्रामीण एवं शहरी आबादी में रहने वाले 90 फीसदी लोग आज भी एलोपैथी पद्धति से इलाज करवाना पसंद करते हैं। इसमें से सात सात फीसदी लोग आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज करवाते हैं, जबकि शेष तीन प्रतिशत लोग यूनानी व अन्य चिकित्सा पद्धतियों से इलाज कराना पसंद करते हैं।

बजट भी बढ़ाया मगर...

हालांकि केंद्र सरकार नें पिछले वर्ष जारी किए गए बजट में आयुष मंत्रालय के अस्पतालों के सुधार के लिए पिछले बजट (1,125 करोड़) में 201.2 करोड़ बढ़ाकर 1,326 करोड़ कर दिया है पर अभी भी आयुर्वेदिक अस्पतालों के सुधार में तेज़ी नहीं आ पा रही है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top