एक अफसर का दंभ: सीएम के आदेशों की अवहेलना, बीस लाख लोगों पर असर

एक अफसर का दंभ: सीएम के आदेशों की अवहेलना, बीस लाख लोगों पर असरग्रामीणों का भला करने वाली संस्था के बैंक खाते सचिव बेसिक शिक्षा ने किए फ्रीज़, लाखों महिलाएं भुखमरी के कगार पर। फोटो; महेन्द्र पाण्डेय

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। महिला सामाख्या की दो लाख महिलाओं की समस्या को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने हल करने के आदेश दिए थे, लेकिन एक अफसर के अड़ियल रवैये के कारण ये महिलाएं, जिनका काम बीस लाख लोगों की मदद करना है, भुखमरी के कगार पर हैं।

“घर में सबसे बड़ी हूं, मेरे भाई-बहन छोटे-छोटे हैं, मेरी अम्मी को कैंसर हो गया है, जो पैसा बचाकर रखा था वो इलाज में पूरा खर्च हो गया, बहुत कर्ज हो गया है,” ये बताते हुए बुलंदशहर की 22 वर्षीय रुबीना फफककर रो पड़ी।

इस पिछड़े जिले की जो भी महिलाएं हमारे साथ जुड़ी हैं वो या तो घरेलू हिंसा से पीड़ित थीं या फिर एकल परिवार से थीं, पैसे न मिलने से इन महिलाओं के चूल्हे न जलने की नौबत आ गई है।
रज्बुल निशां, बहराइच

रुबीना की तरह उत्तर प्रदेश के 16 जिलों में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए बनाई गई संस्था महिला सामाख्या के तहत काम कर रही लाखों महिलाएं आठ महीने से तनख्वाह न मिलने से बदहाली का सामना कर रही हैं। ये महिलाएं पिछले तीन दिनों से लखनऊ में डेरा डाल कर विरोध स्वरूप सरकारी दफ्तरों में जाकर अधिकारियों को फूल देकर अपनी बदहाली की कहानी सुना कर ध्यान खींच रही हैं।

इससे पहले गाँव कनेक्शन में प्रमुखता से खबर छपने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने महिला सामाख्या प्रोग्राम को एक जनवरी, 2017 को बेसिक शिक्षा विभाग से हटाकर महिला एवं बाल कल्याण विभाग के अंतर्गत करने का अनुमोदन भी कर दिया था। लेकिन जहां सचिव बेसिक शिक्षा अजय कुमार सिंह ने इसकी फाइल लटकाने के साथ-साथ अधिकार न होने के बावजूद भी 27 जनवरी को सभी संस्थागत खाते तक सीज करवा दिए हैं।

अब तो दुकानदार भी उधार देने से मना कर रहे हैं। इस सर्दी के मौसम में बच्चों को एक चड्ढी तक नहीं खरीद पाए, कई महीनों से वो फटी चड्ढी पहने हैं।”
उर्मिला, बड़ा गाँव, मऊ

“बेसिक शिक्षा सचिव महिला सामाख्या के प्रोग्राम को समाप्त करने की कई महीनों से साजिश कर रहे हैं जिसमे वो कामयाब नहीं हो पाए हैं, 27 जनवरी को बेसिक शिक्षा सचिव ने हमारे संस्थागत सभी खाते सीज करवा दिए हैं,” महिला सामाख्या की राज्य परियोजना निदेशक डॉ. स्मृति ने बताया। वहीं, इस बारे में बात करने के लिए जब सचिव बेसिक शिक्षा अजय कुमार सिंह से बात करने की कोशिश की गई तो उनका फोन नहीं उठा, और न ही मैसेज का जवाब आया।

“कई महीनों से पैसा नहीं मिला, घर का पूरा खर्च हमारी तनख्वाह से चलता था, जो पैसे जोड़कर रखे वो भी खत्म हो गए,” मऊ जिले के रानीपुर ब्लॉक के बड़ा गाँव की रहने वाली उर्मिला (40 वर्ष) बताती हैं, “बहुत मुश्किल से घर के बाहर कदम निकाला था काम करने के लिए, अब तो दुकानदार भी उधार देने से मना कर रहे हैं। इस सर्दी के मौसम में बच्चों को एक चड्ढी तक नहीं खरीद पाए, कई महीनों से वो फटी चड्ढी पहने हैं।”

सत्ताइस साल से केंद्र द्वारा वित्त पोषित राज्यों में बेसिक शिक्षा विभागों द्वारा चलाए जा रहे महिला सामाख्या के कार्यक्रम को जब वर्तमान की नरेंद्र मोदी सरकार ने बंद कर दिया तो उत्तर प्रदेश उन कुछ राज्यों में से था जहां की राज्य सरकार ने इस योजना का खर्च स्वयं वहन कर महिला सामख्या प्रोग्राम को जारी रखने का फैसला किया।

घर में सबसे बड़ी हूँ, मेरे भाई-बहन छोटे-छोटे हैं, मेरी अम्मी को कैंसर हो गया है, जो पैसा बचाकर रखा था वो इलाज में पूरा खर्च हो गया, बहुत कर्ज हो गया है।
रुबीना, बुलंदशहर

“महिला सामाख्या का प्रोग्राम एक अप्रैल, 2016 के पहले भारत सरकार के अंतर्गत चलता था, अभी यह प्रोग्राम राज्य सरकार ने बेसिक शिक्षा से हटाकर महिला एवं बाल कल्याण विभाग के अंतर्गत कर दिया है, इसके बावजूद बेसिक शिक्षा सचिव संस्था के नीतिगत मसलों में गैर विधि मान्य तरीकों से हस्तक्षेप कर रहे हैं,” महिला सामाख्या की राज्य परियोजना निदेशक डॉ. स्मृति सिंह ने बताया।

जबसे महिलाओं को पैसा नहीं मिला है तबसे इनके घर के चूल्हे सुबह-शाम कितनी मुश्किल से जल रहे हैं ये इनके आंसू ही बता रहे हैं। इनके बच्चों की पढ़ाई, इलाज, जरूरत के सामान पिछले आठ महीने से बाधित हो रहे हैं।
कहकशां परवीन, राज्य सन्दर्भ व्यक्ति लखनऊ

नहीं मिला वेतन, घर चलाना हो गया मुश्किल

लखनऊ। महिला सामाख्या से जुड़ी महिलाओं का आरोप है कि बेसिक शिक्षा सचिव मार्च 2016 से दिसंबर 2016 तक का वेतन नहीं दे रहे हैं, जिससे परिवार चलाना मुश्किल हो गया है।

पति विकलांग हैं, हमारी ही कमाई से घर का पूरा खर्चा चलता है, बच्चे पढ़ाई करने जाते हैं। कई लोगों से कर्जा लेकर घर का खर्चा चला रहे हैं। गाँव से महिलाओं के जब मेरे पास फोन आते हैं कि हमारे पति हमे मारपीट रहे हैं, हमारे घर में लड़ाई हुई है, समझौता कराओ आकर। किराए के अभाव में हम चाहकर भी इनकी मदद नहीं कर पाते।
ब्रह्मा, शिवकरपुर गाँव, औरैया

महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए वर्ष 1989 में भारत सरकार ने महिला समाख्या कार्यक्रम की शुरुआत की थी। भारत सरकार ने अप्रैल 2016 में जब इस कार्यक्रम को बंद करने का फैसला किया तो उत्तर प्रदेश सरकार ने महिला सामाख्या कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की योजना बनाई।

हमारे जिले में महिलाओं का घर से बाहर निकलकर काम करना बहुत मुश्किल है, दबंगों का क्षेत्र है। बहुत मुश्किल से घर से बाहर कदम बढ़ाया, किशोरियों और महिलाओं को जागरूक करने का बीड़ा उठाया। तमाम ताने सुनने के बाद जब ये सब शुरू कर पाए तो अब वेतन मिलना ही बंद हो गया।
नंदनी, गोरखपुर, खजनी ब्लॉक

राज्य सरकार ने जनवरी 2017 में महिला एवं बाल विकास कल्याण विभाग को कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दी। इससे पहले कार्यक्रम की जिम्मेदारी बेसिक शिक्षा विभाग के पास थी।

जिस संस्था ने हमें दहलीज के बाहर कदम रखने की हिम्मत दी, आज वही संस्था परेशानी में है। हम सब महिलाएं पैसे न मिलने से बहुत परेशान हैं पर हम हार नहीं मानेंगे। पैदल 16 से 20 किलोमीटर तक गाँवों में जाते हैं।
वीनम विश्वकर्मा, मंधाता ब्लॉक, प्रतापगढ़

हम गाँव की बहू हैं जब घर के बाहर कदम रखा था तो बहुत ताने सुने थे, जबसे पैसा नहीं मिला तबसे घर वाले और आसपास के लोग मजाक बना रहे हैं कि नौकरी करने गयी थी बस हो गयी नौकरी।
संयोगिता सिंह, इलाहाबाद, बाबागंज ब्लॉक, नरियांवा गाँव

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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