दुनिया में टेटनेस से हर साल लाखों बच्चों की होती है मौत, यूपी के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में टीकाकरण की सुविधा नहीं

Devanshu Mani TiwariDevanshu Mani Tiwari   5 Jan 2017 7:49 PM GMT

दुनिया में टेटनेस से हर साल लाखों बच्चों की होती है मौत, यूपी के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में टीकाकरण की सुविधा नहींविश्व में हर साल 0 से 5 साल की उम्र 63 लाख बच्चों की मौत हो जाती है, जिसका एक बड़ा कारण टिटनेस होता है।

देवांशु मणि तिवारी/ स्वयं डेस्क

रायबरेली। मधुकरपुर गाँव के रहने वाले रामदीन गुप्ता ( 40 वर्ष) पेशे से मजदूर हैं। पिछले महीने गाँव के पास ही एक घर के निर्माण के दौरान उनके हाथ में सरिया लग जाने से बड़ा घाव हो गया था। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर जब वो अपना हाथ दिखाने पहुंचे तो वहां पर तैनात फार्मासिस्ट ने बताया कि लोहा लगने से टिटनेस होने की संभावना हो सकती है। इसका इंजेक्शन जल्द से जल्द लगाना जरूरी है।

रायबरेली जिले से 36 किमी. दक्षिण दिशा में लालगंज ब्लॉक के मधुकरपुर गाँव के निवासी रामदीन गुप्ता बताते हैं, ‘जब हाथ में चोट लगी थी, तो गाँव के अस्पताल में दिखाया था। वहां पर पट्टी हो गई थी पर इंजेक्शन नहीं लगा इसलिए बाहर से लगवाना पड़ा।’

यूपी में सबसे अधिक टिटनेस पीड़ित

भारत में बीमारियों व उनके उपचार की जानकारी देने वाली प्रमुख वेबसाइटों में से एक आरोग्य डॉट कॉम के मुताबिक देश में टिटनेस की बीमारी से पीड़ित लोगों की संख्या सबसे अधिक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, बिहार और असम जैसे राज्यों में है। इससे अधिकतर खतरा गर्भवती महिलाओं व नवजात बच्चों को होता है। ऐसे में ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं की पहली सीढ़ी माने जाने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर टिटनेस का टीका ना मिलना खतरनाक साबित हो सकता है।

टिटबैक की दवा को रेफ्रीजरेटर में रखना ज़रूरी होता है। पीएचसी पर हमें रेफ्रीजरेटर नहीं मिलता इसलिए टिटनेस के मरीज़ों को सीएचसी या प्राइवेट में भेजना पड़ता है।
दिलीप पटेल, अधीक्षक, प्राथमिक स्वास्थय केंद्र, मधुकरपुर, रायबरेली, यूपी

पीएचसी पर रेफ्रीजरेटर की व्यवस्था नहीं

गाँव में टिटनेस का टीका ना मिलने का कारण बताते हुए रायबरेली में मधुकरपुर गाँव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के अधीक्षक दिलीप पटेल बताते हैं, ‘टिटनेस के टीके को स्टोर करना कठिन काम है। टिटबैक की दवा को रेफ्रीजरेटर में रखना ज़रूरी होता है। ऐसा ना हो पाने से दवा खराब हो जाती है और दवा का असर नहीं हो पाता है। पीएचसी पर हमें रेफ्रीजरेटर नहीं मिलता इसलिए टिटनेस के मरीज़ों को सीएचसी या प्राइवेट में भेजना पड़ता है।’

विश्व में टिटनेस के कारण बढ़ रहे मातृ-शिशु मृत्युदर को रोकने के लिए वर्ष 2015 में हुई ग्लोबल कॉल टू एक्शन समिट के मुताबिक विश्व में प्रतिवर्ष 289 हजार माताओं और पांच वर्ष से कम उम्र के 63 लाख बच्चों की मौत हो जाती है। इनमें से अधिकतर मौतों का कारण टिटनेस का टीका ना लगना होता है।

विश्व में टिटनेस के कारण बढ़ रहे मातृ-शिशु मृत्युदर को रोकने के लिए वर्ष 2015 में हुई ग्लोबल कॉल टू एक्शन समिट के मुताबिक विश्व में प्रतिवर्ष 289 हजार माताओं और पांच वर्ष से कम उम्र के 63 लाख बच्चों की मौत हो जाती है। इनमें से अधिकतर मौतों का कारण टिटनेस का टीका ना लगना होता है।

आशा बहुएं आइस बॉक्स में टीके गाँव तक ले जाती हैं

ग्रामीण क्षेत्रों में लगाए जाने वाले टिटनेस के टीके के बारे में लखनऊ स्थित क्वीन मैरी अस्पताल की वरिष्ठ चिकित्सक रेखा सचान बताती हैं, ‘टिटनेस की दवा को छः से आठ डिग्री तक स्टोर करके रखना ज़रूरी होता है। गाँवों में यह कोल्ड चेन मेंटेन रखना कठिन है।’ वो आगे बताती हैं कि गर्भवती महिलाओं को यह टीका लगाने के लिए आशा व आंगनबाड़ी कार्यकत्री आइस बॉक्स में ये टीके गाँवों तक ले जाती हैं, लेकिन पीएचसी पर रोज़ आने वाले मरीज़ों के लिए ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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