ललितपुर में आदिवासी किसानों ने बनाया चेकडैम, अब पूरे साल कर पायेंगे खेती 

Neetu SinghNeetu Singh   18 July 2017 10:58 AM GMT

ललितपुर में आदिवासी किसानों ने  बनाया चेकडैम, अब  पूरे साल कर पायेंगे खेती आदिवासियों के प्रयास से चेकडैम में संरक्षित हुआ बरसात का पानी 

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

ललितपुर। साल में एक बार बारिश के समय ही यहां के आदिवासी किसान खेती कर पाते थे यहां के खेत पूरे साल खाली पड़े रहते थे। यहां के किसानो ने श्रमदान कर बीस दिन में चेकडैम तैयार कर दिया, इसमे बरसात का पानी संरक्षित हो रहा है। इस पानी से सौ एकड़ जमीन सिंचित हो जायेगी किसान अपनी खेती में दो फसल ले सकेंगे। इनकी थोड़ी सी मेहनत से यहाँ का जलस्तर बेहतर हुआ है और पानी को लेकर इनकी कई तरह की समस्याओं का समाधान हो गया।

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ललितपुर जिला मुख्यालय से लगभग 49 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में विरधा ब्लॉक के पिपरई टपरियन गांव में रहने वाली सावित्री सहरिया (48 वर्ष) पानी से भरे चेकडैम को देखकर खुश होकर बताती हैं, “वर्षों बाद उम्मीद की किरण जगी है, कमसेकम अपने खेत में अब बोआई तो कर पायेंगे, अगर अपने खेत में इस पानी से दो फसलें ले ली तो साल भर खाने का इंतजाम हो जाएगा, कुछ साल पहले वन विभाग ने खानापूर्ति के लिए चेकडैम तो बनाया था पर उसमे कभी पानी नहीं टिका, वो चेकडैम हमारे किसी काम का नहीं था, इस साल हम सबने मिलकर 20 दिन काम किया।” वो आगे बताती हैं, “इस साल बरसात में अभी इतना पानी इकट्ठा हो गया है कि पूरे साल खेती कर सकते हैं, जंगल से लकड़ी बीनने से पूरे साल का खर्चा चलाना बहुत मुश्किल होता है, अब खाली पड़े खेतों में खेती करेंगे जिससे घर में अनाज आएगा और साल भर चूल्हा जल पायेगा।” सावित्री सहरिया इस गांव की पहली महिला नहीं है जो इस चेकडैम बनने से इतना खुश हैं बल्कि यहां के आदिवासियों में खेती करने की एक उम्मीद जगी है।

चेकडैम के पानी से साल में दो फसलें ले सकेंगे ग्रामीण।

आदिवासियों की जिन्दगी हमेशा से गरीबी और समस्याओं से जूझती नजर आयी है। हमने उनके पिछड़ेपन का जिक्र सुना है, असुविधाओं के बीच उनका जीवनयापन गुजरता है। वन विभाग और आदिवासियों में हमेशा से संघर्ष की लड़ाई रही है, सरकार से इनकी शिकायते रहती हैं। पर ये आदिवासी अब जागरूक हो रहे हैं और अपनी समस्याओं का समाधान खुद कर रहे हैं। ललितपुर में इन सहरिया आदिवासियों के लिए काम कर रही एक गैर सरकारी संस्था साईं ज्योति संस्थान के मुताबिक़ यहां 71,610 शहरिया आदिवासी परिवार रहते हैं।

दिल्ली में स्थित गूंज संस्था कई स्टेट में ‘क्लॉथ फॉर वर्क’ योजना के तहत काम करती है। ये संस्था ऐसे जिलों में ऐसी बस्तियों में काम करती है जो विकास से कोसों दूर रहते हैं। ऐसे गांव जो आज भी विकास की इस रफ़्तार में मुख्य धारा से बहुत दूर हैं।जिन गांव में सरकार की नजर नहीं पड़ती और जहां विकास के नाम पर कोई काम नहीं होता। इस संस्था का प्रयास है कि लोग श्रमदान करके खुद अपने लिए विकास के काम करें उसके बदले गूँज संस्था उनके पूरे परिवार के लिए कपड़े देती है।

काम के बदले गूँज संस्था ने पूरे परिवार के लिए दिए कपड़े और तिरपाल ।

इस संस्था के प्रोत्साहन से अब लोग जागरूक हो रहे हैं और अपने लिए खुद विकास के कार्य कर रहे हैं क्योंकि प्रोत्साहन के तौर पर इनके पूरे परिवार को श्रमदान के बदले कपड़े और बच्चों के खिलौने मिलते हैं। ये संस्था विभिन्न जनपदों में गैर सरकारी संस्थाओं और प्रशासन के सहयोग से मिलकर काम करती है। गूँज संस्था के सदस्य चिरंजीत गाएन ललितपुर में दो वर्षों से संस्था साईं ज्योति संस्थान के साथ मिलकर आदिवासियों के लिए काम कर रहे हैं इनका कहना है, “आदिवासियों को जागरूक और प्रोत्साहन करने की जरूरत है, इस चेकडैम को इन्होने खुद ही मिलकर बनाया है हमने सिर्फ इन्हें प्रोत्साहित किया है, पानी को लेकर मैंने यहां के लोगों के चेहरे की उदासी देखी है, आज इस चेकडैम को भरा देखकर ये खुद ही बहुत खुश हैं।” सड़क नहीं है, बिजली नहीं है, पानी नहीं है जैसी तमाम समस्याएं ये आदिवासी मिलकर खुद सुलझाएं और श्रमदान करें, हम इनका मनोबल बढ़ाने के लिए ‘क्लॉथ फॉर वर्क’ योजना के तहत सिर्फ इनके पूरे परिवार के लिए कपड़ा देते हैं साथ ही इनकी झोपड़ियों से बरसात में पानी न गिरे उसके लिए इन्हें तिरपाल भी खरीदकर देते हैं ऐसा चिरंजीत ने कहा।

अपनी झोपड़ियों में तिरपाल लगाते आदिवासी।

इस गांव के रामकिशोर सहरिया (50 वर्ष) ने कहा, “हम लोग पढ़े लिखे नहीं है, हर काम अधिकारी करेंगे यही हमारी सोच रहती है, पर जब इस संस्था ने हमारी समस्या पूंछी और हमने पानी के परेशानी अपनी समस्या बतायी तो इन्होने चेकडैम खोदने को बोला और कहा हम बदले में कपड़े देंगे तो हम सब तैयार हो गये, आज चेकडैम में पानी भरा देखकर विश्वास नहीं हो रहा है कि ये हमारी ही मेहनत है।” वो आगे बताते हैं, “जिस समस्या से हम वर्षों से जूझ रहे थे वो कुछ दिन मेहनत करने से हल हो गयी, इन भैया ने हमारी आँखे खोल दी, अब ये हमे कपड़े न भी दें तो भी हम अपने लिए काम करेंगे और सरकार का इन्तजार नहीं करेंगे।”

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