आगराः दो स्कूलों के 159 छात्रों को पढ़ाने की ज़िम्मेदीरी सिर्फ एक अध्यापक पर

आगराः दो स्कूलों के 159 छात्रों को पढ़ाने की ज़िम्मेदीरी सिर्फ एक अध्यापक परप्राथमिक स्कूल।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

आगरा। एक प्रांगण में स्थित एक प्राइमरी और एक माध्यमिक स्कूल, दोनों स्कूलों में आठ कक्षाएं, कुल 159 बच्चे और इन बच्चों को पढ़ाने के लिए सिर्फ एक अध्यापक। ये हालात हैं उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की।

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आगरा शहर के अछनेरा ब्लॉक के पाली गाँव में प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक स्तर के दो सरकारी विद्यालय हैं। दोनों स्कूलों के एक से आठ तक कक्षाओं में 159 बच्चे पढ़ते हैं। इन बच्चों को पढ़ाने के लिए सिर्फ एक अध्यापक नियुक्त है, जो प्राथमिक विद्यालय के प्रधान शिक्षक हैं।

आगरा के रहने वाले आरटीआई कार्यकर्ता नरेश पारस बताते हैं, ‘‘जब मैं कल स्कूल में गया तो स्कूल के अध्यापक आठवीं के बच्चों को गुणा-भाग सीखा रहे थे। जब मैंने पूछा तो अध्यापक बोले मैं प्राथमिक का शिक्षक हूं जो मुझे पता होगा मैं वहीं तो पढ़ा पाऊंगा।’’ नरेश पारस ने इस सम्बन्ध में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और जिले के डीएम को पत्र लिखा है। नरेश पारस बताते हैं, “इस स्कूल में बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। एक प्राथमिक स्कूल के अध्यापक जूनियर स्कूल के बच्चों को पढ़ा रहे है। यह गरीब जनता के प्रति अन्याय है।

शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार देश भर में 60 लाख शिक्षकों के पद स्वीकृत हैं, जिनमें 9 लाख प्राथमिक स्कूलों में और एक लाख माध्यमिक स्कूलों में खाली पड़े हैं। अगर दोनों तरह के स्कूलों में शिक्षकों के रिक्त पदों को जोड़ दिया जाए तो 10 लाख पद खाली हैं।

बड़े हिंदी भाषी राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में 33.3 करोड़ लोग रहते हैं, जहां प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में शिक्षकों की औसतन एक तिहाई सीटें खाली पड़ी हैं।

स्कूल के अध्यापक नारायण सिंह कहते हैं, “बीते 31 मार्च से मैं यहां अकेले हूं। कोई अध्यापक आएंगे ऐसा संभव नहीं है। कई बार सरकारी अधिकारियों को बोला लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। अब मैं सभी बच्चों को पढ़ा रहा हूं। परेशानी आती है इतने सारे बच्चों को पढ़ाने में लेकिन मज़बूरी है तो पढ़ाना पड़ता है।

यह स्थिति सिर्फ आगरा के इस स्कूल की ही नहीं है, बल्कि रायबरेली के अमवा ब्लॉक के बरखापुर प्राथमिक विद्यालय की भी यही स्थिति है। यहां पर 150 से ज्यादा बच्चे है और शिक्षक सिर्फ दो हैं। लोकसभा में पिछले साल पांच दिसंबर को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री द्वारा पेश किए आंकड़ों के अनुसार सरकारी प्राथमिक स्कूलों में 18 प्रतिशत और सरकारी माध्यमिक स्कूलों में 15 प्रतिशत शिक्षकों के पद रिक्त पड़े हैं। दूसरे शब्दों में, सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के लिए स्वीकृत पदों का छठा भाग रिक्त है, यानी सामूहिक रूप से दस लाख शिक्षकों की कमी है।

इस सम्बन्ध में बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री संदीप सिंह बताते हैं, “सरकारी स्कूल में शिक्षक समय पर पहुंचे और स्कूल की व्यवस्था सुधरे इसके लिए मैं खुद प्रदेश भर के अलग-अलग स्कूलों का दौरा करने वाला हूं। बच्चों को बेहतर शिक्षा मिले इसके लिए हमारी सरकार पूरी तरह से तैयारी में है। हम प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए जल्द ही कड़े कदम उठाने वाले हैं।

सरकारी स्कूलों में कम हो रहे बच्चे: हाल ही इण्डिया स्पेंड की एक रिपोर्ट सरकारी स्कूलों में शिक्षा की की बदहाली की कहानी बयां करती है, रिपोर्ट के मुताबिक देश के 20 राज्यों में पिछले पांच वर्षो के दौरान सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में 1.3 करोड़ की कमी आई है, जबकि दूसरी ओर निजी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में 1.7 करोड़ का इजाफा हुआ है। सर्व शिक्षा अभियान पर 1.16 लाख करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद 2009 से 2014 के बीच बच्चों में समझ के स्तर में गिरावट दर्ज की गई है।

लखनऊ की रहने वाली शोभा सिंह बताती हैं कि मैं सरकारी स्कूल में अपने बच्चे को पढ़ाना चाहती थी, लेकिन सरकारी स्कूल का महौल अजीब रहता है। बच्चों का ग्रोथ रुक जाता है। सरकारी स्कूल में एक्स्ट्रा एक्टिविटी भी नहीं होती है जिसके कारण बच्चा कुछ अलग नहीं कर पाता है। मैं अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही हूँ।

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