गाँवों से कई किलोमीटर दूर जाकर लाना पड़ता है सैनिटरी नैपकिन 

गाँवों से कई किलोमीटर दूर जाकर लाना पड़ता है सैनिटरी नैपकिन रायबरेली में गाँव कनेक्शन की माहवारी स्वच्छता दिवस पर चलाई जा रही मुहिम 

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

कुंदनगंज (रायबरेली)। सुविधाओं के अभाव के कारण गावों में महिलाओं और किशोरियों को माहवारी के दौरान कई किलोमीटर दूर चलकर सेनेटरी पैड लाना पड़ता है। मेडिकल स्टोरों की गाँवों से दूरी होने के कारण आज भी पैड खरीद कर लाना किशोरियों के लिए बड़ी चुनौती है।

रायबरेली जिले में विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस के मौके पर बछरावां ब्लॉक में माहवारी जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस आयोजन में 140 महिला एवं किशोरियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में महिलाओं एवं किशोरियों ने माहवारी के दौरान होने वाली समस्याओं और ग्रामीण क्षेत्रों में सेनेटरी पैड की उपलब्धता पर प्रमुखता से आवाज उठाई।

गाँव कनेक्शन की मुहिम में महिलाओं को सैनिटरी नैपकिन बांटे गए।

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रायबरेली जिला मुख्यालय से 28 किलोमीटर उत्तर दिशा में कुंदनगंज ब्लॉक में कुंदनगंज कस्बे में रहने वाली 19 वर्षीय दीपांशी बीए की छात्रा हैं। उनके गाँव में गाँव कनेक्शन फाउंडेशन द्वारा मनाए गए माहवारी स्वच्छता दिवस पर दीपांशी ने बताया, "पीरियड के समय हम लड़कियों को हरचंदपुर बाजार जाकर पैड खरीदना पड़ता है। बाजार हमारे गाँव से पांच किलोमीटर दूर है। गाँव के ज़्यादातर लोग उन दिनों में कपड़े का प्रयोग करते हैं।"

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रायबरेली जिले में वर्ष 2013 से ग्रामीण क्षेत्र में मान्यता प्राप्त स्कूलों एवं कॉलेजों में किशोरी स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत सेनेटरी पैड बांटे जा रहे हैं।इस अभियान के तहत अभी तक जिले में हजार से ज्यादा किशोरियों को सेनेटरी पैड बांटे जा चुके हैं।

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गाँवों में सेनेटरी पैड्स को लेकर महिलाओं में जारूकता के अभाव के बारे में रायबरेली जिला स्वास्थ्य विभाग में हरचंदपुर ब्लॉक की प्रोग्राम मैनेजर आरती सिंह बताती हैं, "गाँव में महिलाएं अभी भी माहवारी के दौरान कपड़े के इस्तेमाल को बेहतर मानती है। हालत यह है कि अभी भी अगर उन्हें पैड दे दिया जाए, तब भी वह कपड़ा ही इस्तेमाल करेंगी। क्योंकि यह अब उनकी आदत बन गई है।"

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जिले के बछरावां ब्लॉक के अघोरी गाँव में रहने वाली प्रिया चौरसिया (17 वर्ष) 12वीं की छात्रा हैं । प्रिया बताती हैं, "गाँव में महिलाएं अभी भी उन दिनों में कपड़ा इस्तेमाल करती हैं, लेकिन अगर बात करें लड़कियों की तो उन्हें अभी स्कूलों में पैड उपलब्ध होते हैं, लेकिन अध्यापकों से पैड मांगने में शर्म आती है।"

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