सरकार किसानों का हित ही चाहती है तो मंडी में बिचौलिए क्यों हैं ?

सरकार के नियम और शर्तों में पिस रहे किसान, एमएसपी पर नहीं हो पाती पूरी फसल की खरीद, तुरंत पैसों के लिए भी किसान आढ़तियों (बिचौलियों) को उपज बेचना सही समझते हैं

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   16 Oct 2018 5:50 AM GMT

सरकार किसानों का हित ही चाहती है तो मंडी में बिचौलिए क्यों हैं ?

लखनऊ। देश की कई मंडियों में टमाटर की कीमत दो से तीन रुपए प्रति किलो पहुंच गयी है लेकिन हम खरीद रहे हैं 30 रुपए किलो। धान का सरकारी रेट 1750 रुपए है, जबकि बाजार में भाव 1300 से शुरू होता है। इसका जिम्मेदार कौन, बिचौलिए, धान सहित अन्य फसलों की खरीदी एमएसपी पर नहीं हो रही, जिम्मेदार कौन है, आढ़तिए। आखिर ये आढ़तिए हैं कौन, क्यों इन्हें किसानों को हो रहे नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा ? क्या ये सच में इन सबके लिए अकेले दोषी हैं?

लखनऊ की नवीन गल्ला मंडी में आढ़ती राजकरण सिंह मुन्ना की सिंह फ्रूट नाम से ट्रेडिंग कंपनी है। वे पिछले 10 वर्षों से मंडी में आढ़ती का काम कर रहे हैं। बिचौलिया नाम पर चिढ़ते हुए वे कहते हैं "सरकार, किसान और आम लोगों को लगता है कि मंडी का आढ़ती (बिचौलिया) पूरा मुनाफा कमाता है, लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है लोगों को यह भी जानना चाहिए। हम बाहरी तो हैं नहीं, सरकार ने ही हमें यहां बैठाया है, हम इसके लिए लाखों रुपए खर्च करते हैं, टेंडर निकलता है। हर साल लाखों रुपए का टैक्स देते हैं, फिर हम दोषी कैसे हो सकते हैं"?

लखनऊ की ही गल्ला मंडी में इटौंजा से केला बेचने आये मनीष सिंह कहते हैं, "सरकार बिचौलियों को खत्म कर देगी तो किसान भी खत्म हो जाएंगे। अब मुझे केले की खेती करनी थी। पौधों के लिए मैंने बागवानी विभाग से मांग की थी। पांच महीने हो गया, कोई सुनवाई नहीं हुई। फिर मैंने सिंह फ्रूट के मुन्ना सिंह से पैसे लेकर केले की खेती और अब इन्हें ही अपनी उपज बेच रहा हूं।"

जब आढ़तियों या बिचौलियों की बात हो रही तो हमें ये भी जान लेना चाहिए कि ये हैं कौन। इस बारे में मध्यप्रदेश में छिंदवाड़ा के मंडी डायेक्टर शेषराव यादव कहते हैं " राज्य सरकारें अपने निगमों के जरिये मंडियों से अनाज खरीदती हैं। किसान और इन निगमों के बीच एक मध्यस्थ होता है जिसे हम एजेंट और आढ़ती कहते हैं और मंडियों में सरकार द्वारा ही इन्हें दुकानें आवंटित की जाती हैं। ये आढ़ती पीढ़ियों से चले आ रहे हैं।" धान, गेहूं, कपास, गन्ना, सोयाबीन, दहलन, तिहलन समेत 25 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है और उन्हीं की सरकारी खरीद होती है। कुछ फसलों के लिए जैसे मध्य प्रदेश में लहसुन और यूपी में आलू के लिए राज्य सरकारें सरकारी खरीद कराती हैं। बाकी फसलों को खुले बाजार में बेचना होता है।

एजेंसी के अधिकारी बिना राइस मिल खरीदादारी करने आज जाते हैं फिर धान में नमी बताकर लेने मना कर देते हैं। फसल में नमी कट भी अधिक लगाया जा रहा है। जिस भाव में फसल बिकती है उसका जे फार्म (पक्की पर्ची) भी नहीं दिया जा रहा था। ऐसे में जो किसान दूरी से ट्रैक्टर का किराया देकर मंडी तक फसल लेकर आया है तो वो तो बेचकर ही जाएगा।

राजेंद्र बलवान, किसान, हरियाणा

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किसान खेत से गेहूं या धान लेकर आता है और मंडी में रख देता है। उसके बाद एक कर्मचारी आता है तो गेहूं की नमी की मात्रा तय करता है और परचेज इंस्पेक्टर को खरीदने की अनुमति दे देता है। किसान के उस गेहूं को तौलने से लेकर बोरे में भरने और ट्रक में लादकर निगमों के गोदामों तक पहुंचाने का काम आढ़ती का है। इसके लिए आढ़ती को वजन के हिसाब पचास किलो गेहूं की बोरी पर छह रुपए की मजदूरी देनी पड़ती है। बदले में खरीदने वाली एजेंसी आढ़ती को ढाई प्रतिशत का कमीशन भी देती है। इसी साल 20 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के किसानों को संबोधित करते हुए कहा था कि बिचौलिए अब किसानों का पैसा नहीं मार सकेंगे।

लखनऊ की मंडी में फलों के लिए बोली लगवाते आढ़ती मुन्ना सिंह

सिंह फ्रूट के मुन्ना सिंह आगे कहते हैं, "मंडी परिषद टैक्स देती है, किसान नहीं। गेट पर ही गाड़ी रोक ली जाती है, वजन के हिसाब से पर्ची बन जाती है। मनमानी भी होती है, अब गाड़ी में किसान बैठा है तो उसको भी तौल दिया जाता है। माल खरीदने के बाद 15 दिन में टैक्स देना होता है, 16 वे दिन से ढाई फीसदी ब्याज लग जाता है। यही नहीं सर्वे के बाद उपज का 365 दिन का दाम फिक्स होता है, रेशियो के हिसाब से। कई बार तय कीमत से कम में भी खरीदी होती है। हमें नुकसान भी झेलना पड़ता है, ऐसे में अगर सरकार की तय की गयी एमएसपी पर आढ़तिए खरीदी करेंगे तो और पैसे कौन भरेगा।"

मध्य प्रदेश, शहडोल गल्ला मंडी के सुवेंद्र चौरसिया (खुशी ट्रेडिंग कंपनी) कहते हैं, "आढ़ती को हमेशा दोषी कहा जाता है लेकिन वही किसानों की मदद भी करता है। किसान कहते हैं कि बैंक वाले कर्ज देने के लिए जमीन गिरवी रखवा लेते हैं। जब तक कागजी कार्रवाई पूरी होती है तब तक तो फसल का समय ही निकल जाता है, ऐसे में आढ़ती मात्र विश्वास के आधार पर कर्ज दे देता है। किसान अपनी फसल बेचकर पैसा लौटा देता है। ऐसे में कौन दोषी है, आप ही बताइये?"

देश की मंडियों में इस समय धान की आवक शुरू हो गयी है। पंजाब और हरियाणा की मंडियां धान से पट गयी हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही हरियाणा के कैथल मंडी से खबर आयी कि वहां किसानों ने धान सड़कों पर बिछा दिया। ऐसा वे इसलिए कर रहे थे क्योंकि सरकारी अधिकारी फसल लेने में आनाकानी कर रहे थे। इस बारे में वहीं के किसान राजेंद्र बलवान बताया, "एजेंसी के अधिकारी बिना राइस मिल खरीदादारी करने आज जाते हैं फिर धान में नमी बताकर लेने मना कर देते हैं। फसल में नमी कट भी अधिक लगाया जा रहा है। जिस भाव में फसल बिकती है उसका जे फार्म (पक्की पर्ची) भी नहीं दिया जा रहा था। ऐसे में जो किसान दूरी से ट्रैक्टर का किराया देकर मंडी तक फसल लेकर आया है तो वो तो बेचकर ही जाएगा।"

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नवीन गल्ला मंडी, सीतापुर रोड लखनऊ, के एजेंट (आढ़ती) आलोक ट्रेडिंग कंपनी के मालिक 70 वर्षीय रमाशंकर यादव कहते हैं, "अभी मंडी में जो धान की आवक हो रही है उसमें नमी ज्यादा है। ऐसे में सरकारी अधिकारी उसे लेने से मना कर देते हैं। जबकि किसान को फसल बेचनी है क्योंकि उन्हीं रुपयों से अगली फसल भी लगानी है। ऐसे में हम जब उनकी फसल खरीदते हैं तो उसे खुद सुखाते हैं, उसके बाद दूसरों को बेचते हैं। इन सबमें खर्च तो आता ही है, अब अगर सरकार तय की गयी कीमत पर हम खरीदी करेंगे तो और खर्च कौन देगा, फिर जब हम उसी कीमत पर बेचेंगे तो हमसे माल खरीदकर दुकानों पर बेचने वाला कीमत और बढ़ा देगा, फिर आम लोगों को भी तो नुकसान होगा। कम रकबे वाला किसान ज्यादा इंतजार नहीं कर सकता है इसलिए वो सरकारी रेट का इंतजार नहीं करता।"

लखनऊ की नवीन गल्ला मंडी में आलोक ट्रेडिंग कंपनी के मालिक 70 वर्षीय रमाशंकर यादव

एक शोध के अनुसार यह पाया गया है कि केवल 9.14% किसान अपनी फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य से अवगत हैं और भारत में केवल 6% किसान अपनी फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त करने में सक्षम हैं, बाकी किसान अपनी फसल को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य की तुलना से कम कीमत पर बेचते हैं।

इसी बिंदु पर गाै र करते हुए 2016 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 'डॉ गणेश उपाध्याय बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' मामले में केंद्र सरकार और राज्य सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी दर्जा प्रदान करने के लिए एक उपयुक्त कानून लाने का सुझाव दिया था। कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने भी अपने शोध के उपरांत केंद्र सरकार से सिफ़ारिश की है कि एक क़ानून द्वारा किसानों को अपने उत्पाद को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचने का कानूनी अधिकार प्रदान करना चाहिए। किसान संगठनों की तरफ से संसद में दो निजी विधेयक पेश किए गए हैं, जिसमें एमएसपी पर कानून बनाने की मांग रहे हैं।

कई प्रदेशों की सरकार ने किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए मंडियों में ये नियम लागू करने का प्रयास भी किया कुछ फसलों की खरीदी सरकार की तय एमएसपी पर ही की जायेगी, लेकिन सरकार अपने फैसलों पर घिरती दिख रही है। भारतीय कपास निगम (सीसीआई) पंजाब में किसानों से कपास की नयी फसल की सीधी खरीद के लिए मंडियों में पूरा प्रबंध किया है, लेकिन आढ़तियों के विरोध की वजह से खरीद नहीं हो पा रही है। भंटिडा स्थित सीसीआई की शाखा के अधिकारी बृजेश कताना बताते हैं, "आढ़ती खरीद पर 2.5 फीसदी की दर से कमीशन मांगते हैं, लेकिन हमें किसानों से सीधी खरीद करने और फसल का दाम उनके बैंक खाते में ट्रांसफर करने का आदेश मिला है। ऐसे में हम आढ़तियों को कमीशन नहीं दे सकते हैं।"

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उन्होंने कहा कि पंजाब की मंडियों में आढ़तियों का वर्चस्व है। किसान से लेकर मिल वाले तक सबपर आढ़तियों की पकड़ है। इसलिए वे उनकी बात मानते हैं। उन्होंने कहा, "आढ़तियों ने कहा है कि कपास की खरीद पर उन्हें कमीशन नहीं दिया जाएगा तो वे सीसीआई की खरीद नहीं होने देंगे। अभी 14-15 फीसदी नमी फसल में है, जबकि सीसीआई 8-12 फीसदी नमी वाला कपास ही खरीदता है।"

एक शोध के अनुसार यह पाया गया है कि केवल 9.14% किसान अपनी फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य से अवगत हैं और भारत में केवल 6% किसान अपनी फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त करने में सक्षम हैं, बाकी किसान अपनी फसल को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य की तुलना से कम कीमत पर बेचते हैं।

वहीं महाराष्ट्र में कुछ कृषि मंडियों में ट्रेडर्स और कमीशन एजेंट्स ने किसानों की फसल को खरीदना बंद कर दिया है। ये महाराष्ट्र कैबिनेट के उस फैसले का विरोध कर रहे हैं जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम पर खरीदारी करने वाले ट्रेडर्स के लिए एक साल कैद की सजा और 50,000 रुपए जुर्माने का प्रस्ताव दिया गया है। दिलचस्प बात यह है कि किसानों के प्रतिनिधि भी प्रस्तावित बदलाव का विरोध करने वाले ट्रेडर्स का समर्थन कर रहे हैं।

मंडी में अनाज गाड़ी में अनाज चढ़ाई का पैसा आढ़तिएं ही देते हैं

मंडमशेतकरी संगठन के प्रेसिडेंट अनिल घनवट कहते हैं "सरकार किसानों की पूरी फसल खरीदने की स्थिति में नहीं है। अगर ट्रेडर्स को एमएसपी अदा करने के लिए मजबूर किया जाएगा तो वे खरीदारी नहीं करेंगे। इससे नुकसान किसानों को ही होगा।"

मतलब साफ है कि सरकार भले ही बिचौलियों को खत्म करने की बात कर रही हो लेकिन ये किसान की मजबूरी और सरकार की नाकामी बन गये हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्दालय में कृषि आर्थिक विभाग के प्रोफसर चंद्र सेन कहते हैं, "किसानों के लिए अपनी उपज बेचने के लिए सरकार व्यवस्था कितनी है, ऐसे में यही आढ़ती उपज खरीदते हैं। सरकार को इनके विकल्प पर जोर देना चाहिए। आढ़ती भी तो इनसान हैं, इससे रोजगार भी मिलता है। जब कीमत बाजार में कम होती है और एमएसपी की कीमत ज्यादा होती है तो सरकारी अधिकारी मिलकर खेल करते हैं, इसलिए बस आढ़तियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सरकार अधिकारी किसानों को परेशान करते हैं, बोलते हैं नमी ज्यादा है, माल अच्छा नहीं है, ऐसे में दूर से आये किसानों को पैसे की आवश्यकता होती है। आढ़तिए इसका लाभ तो उठाते हैं लेकिन इसके लिए सरकार भी दोषी है।"

उत्तर प्रदेश राज्य कृषि उत्पादन मण्डी परिषद्, गाजियाबाद मंडल के उपनिदेशक दिनेश चंद्रा कहते हैं " अगर बाजार में कंपटीशन की भावना बढ़ायी जाये तो कम कीमतों पर लगाम लगायी जा सकती है। बाहरी राज्यों से आये व्यापारी भी कीमत घटाते हैं।"


ये पूछने पर कि किसान आढ़तियों के पास जाते ही क्यों के जवाब में दिनेश चंद्रा कहते हैं, "क्योंकि वे किसानों की मदद कर रहे होते हैं। किसी भी जिंस में कोई गड़बड़ी होती है, तो सरकारी खरीद केंद्र पर उसे नहीं लिया जाएगा, जबकि आढ़ती कुछ ऊपर नीचे होने पर कम या ज्यादा रेट में फसल खरीद लेते हैं।बिचौलिया किसानों को जरूर पड़ने पर पैसे भी देता है, ऐसे में किसानों उनके पास जाना किसानों की मजबूरी बन जाती है। "

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इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद में पढ़ाई कर रहे विवेक पांडेय, अभिषेक कर और पंकज गौण ने मैनेजमेंट और तकनीकी के जरिए कृषि सेक्टर से जुड़े छोटे और बड़े किसानों की आय सुनिश्चित करने की जटिलता को समझने के लिए एक ड्राफ्ट तैयार किया है। इसके बारे में विवेक कहते हैं "भारत में एक हेक्टेयर खेत वाले किसानों की संख्या 67 फीसदी है। इसमें भी ज्यादातर किसान मांग के अनुसार खेती नहीं करते जिस कारण उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है। जबकि अगर समय और मांग के अनुसार खेती की जाये तो फसल का उचित मूल्य कहीं भी मिल सकता है। इसके लिए उन्हें तकनीकी की माध्यम से जागरूक करने की जरूरत है। "


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