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आम की लाल किस्मों के बारे में जानते हैं?

Dr Shailendra Rajan | Jul 07, 2022, 08:02 IST
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अभी तक आप आम की दशहरी, चौसा, लंगड़ा, सफेदा जैसी किस्मों के बारे में जानते होंगे, लेकिन आप आम की लाल किस्मों जैसे हुस्नारा, वनराज, सुरखा, पूसा अरुणिमा, पूसा प्रतिभा जैसी किस्मों के बारे में जानते हैं?
mango farmer
आम की बात की जाए दशहरी, चौसा, हापुस, लँगड़ा जैसे नाम तुरंत ज़ुबान पर आ जाते हैं, लेकिन अगर आपसे आम लाल किस्मों की बात की जाए तो आप उनका नाम नहीं जानते होंगे। लोग लाल रंग की किस्मों की तरफ खिंचे चले जाते हैं और इस लाल किस्मों के बारे में जानना चाहते हैं।

लाल रंग की किस्में तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं, केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान 30 दशक से भी अधिक समय से आम की नई किस्में विकसित करने और प्रदर्शनी में विशेष योगदान दे रहा है।

लाल आम के फलों की तरफ हर कोई आकर्षित होता है और कुछ दशक पहले आम के मेलों में केवल भारतीय लाल रंग की किस्मों जैसे हुस्नारा, वनराज, सुरखा, सुरखा वर्मा, सिंदुरिया, गुलाब खास इत्यादि का बोलबाला था। लेकिन 80 के दशक में टॉमी एटकिंस, एल्डन और सेंसेशन जैसी रंगीन किस्मों को लखनऊ में सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर सबट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर और नई दिल्ली में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका से मंगाया गया।

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लाल रंग की इन किस्मों के आकर्षण के कारण इनके पौधे विभिन्न सरकारी एजेंसियों और निजी नर्सरी द्वारा व्यापक रूप से बनाए जाने लगे। इस बीच, इन किस्मों को नई किस्मों के विकास के लिए संकरण में माता या पिता के रूप में भी इस्तेमाल किया जा रहा है। आम्रपाली, दशहरी और अल्फांसो जैसी भारतीय किस्मों के साथ इन विदेशी आमों को नर या मादा के रूप में संकरित करके रंगीन किस्म में विकसित की गई है।

टॉमी एटकिंस और सेंसेशन जैसी विदेशी रंगीन आम की किस्मों का स्वाद सपाट होता है और यह भारतीय स्वाद के अनुरूप नहीं होते हैं। सुगंधित और मीठे आम भारतीय उपभोक्ताओं के बीच अधिक लोकप्रिय हैं। हालांकि, लाल किस्मों का रंग उपभोक्ता को आकर्षित करता है और ग्राहक अधिक कीमत देने में भी संकोच नहीं करते हैं। विदेशी किस्में आम तौर पर कम मीठी होती हैं, लेकिन इन्हें लंबे समय तक संग्रहित किया जा सकता है।

अनुसंधान संस्थानों ने एक दर्जन से भी अधिक लाल रंग की किस्मों का विकास किया है। सीआईएसएच, लखनऊ में 36 वर्षों के आम प्रजनन कार्य में अंबिका और अरुणिका के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। इसके अतिरिक्त कई किस्में आने वाले वर्षों में संस्थान द्वारा लोक अर्पित करने की संभावना है। आम के मेले में संस्थान के स्टॉल पर आकर्षक लाल रंग के संकरों की अच्छी खासी संख्या है।

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दिल्ली के पूसा संस्थान ने लाल रंग की कई किस्में जैसे पूसा अरुणिमा, पूसा प्रतिभा, पूसा श्रेष्ठ, पूसा ललिता और पूसा अरुणिमा जीत करके जारी किया है और उनकी मांग धीरे-धीरे बढ़ रही है।

सीआईएसएच द्वारा विकसित अंबिका और अरुणिका को आम मेले में कई प्रतियोगियों ने रखा है। अन्य लाल किस्में जैसे पूसा अरुणिमा, पूसा प्रतिभा, पूसा श्रेष्ठ, पूसा लालिमा भी देखी जा सकती हैं। बेंगलुरू स्थित बागवानी संस्थान द्वारा विकसित अर्का अरुणा, अर्का अनमोल व अर्का पुनीत को भी प्रदर्शित किया गया है। विदेशी लाल रंग की किस्मों में टॉमी एटकिंस, सेंसेशन, ओस्टीन, लिली आदि प्रमुख है। पारंपरिक रंगीन किस्मों में हुस्ने आरा, वनराज सुरखा मटियारा, नाज़ुक बदन, याकुती और गुलाब खास शामिल हैं।

अम्बिका और अरुणिका की मांग पौधे के बौने आकर और किचन गार्डन के लिए उपयुक्त होने के कारण बढ़ गई है। अरुणिका किस्म के पौधे आम्रपाली से भी छोटे आकार के होते हैं। इसी कारण से किचन गार्डन के लिए अरूणिका को अच्छी बौनी किस्मों में से एक माना जाता है। शुरूआत में, नई रंगीन किस्मों के पौधे केवल शोध संस्थानों में उपलब्ध थे जहां इन किस्मों को विकसित किया गया था। लेकिन उच्च मांग के कारण, पौधों को प्राइवेट नर्सरी काफी संख्या में बना रही हैं। हालांकि, रंगीन किस्मों की आड़ में नकली किस्मों की आपूर्ति करने की प्रथा भी प्रचलित है।

बाजार में लाल फलों की अधिक मांग के कारण रंगीन किस्मों का उत्पादन करना किसानों के लिए भी लाभदायक है। इन किस्मों को उच्च घनत्व में लगाया जा सकता है और पौधे केवल दो वर्षों में फल देना शुरू कर देंगे। अंबिका और अरुणिका के पेड़ों पर प्रूनिंग का अच्छा प्रभाव पड़ता है, इसलिए शाखाओं को ट्रिम कर के पौधे का आकार छोटा करके फल की उपज भी प्राप्त की जा सकती है।

(डॉ शैलेंद्र राजन, आईसीएआर-केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ के पूर्व निदेशक हैं)

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