नीलगाय से परेशान बिहार के किसानों को कब मिलेगी मुक्ति? बड़े आंदोलन की तैयारी

बिहार के पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में छुट्टा पशु बड़ा मुद्दा हैं। बिहार में भी छुट्टा गोवंश की समस्या है, लेकिन नीलगाय उससे बड़ा मुद्दा है। नीलगाय के चलते कहीं किसानों के दिन रात रखवाली में जा रहे हैं तो कहीं किसानों ने फसल चक्र बदला है। किसानों को इंतजार है कि नीलगाय के नियंत्रण के लिए चलाई जा रहीं योजनाएं जमीन पर उतरें।

Rahul JhaRahul Jha   1 March 2022 1:09 PM GMT

सुपौल (बिहार)। किसान सुखदेव शर्मा पिछले कुछ समय से बहुत परेशान हैं। उनकी परेशानी की वजह नीलगाय हैं, वो जो कुछ भी फसल बोते हैं नीलगाय (वनरोज या घोड़ा परास) के झुंड उसे बर्बाद कर जाते हैं। सुखदेव के मुताबिक उनकी पंचायत के आसपास 100 से ज्यादा नीलगाय आतंक मचाए हैं।

सिर पर बंधे गमछे को ठीक करते हुए 57 साल के सुखदेव कहते हैं, "साग सब्जी से लेकर कोई फसल नीलगाय होने नहीं देते हैं। हमारे गांव के आसपास 100 से ज्यादा नीलगाय हैं। इधर से भगाओ तो उधर चली जाती हैं, फिर वापस आ जाती हैं। कितने देर कोई बैठा (खेत में रखवाली करेगा) रहेगा। सब फसल बर्बाद कर देती हैं। बहुत परेशान हैं।"

वो आगे कहते हैं, "समझ नहीं आ रहा है क्या करें, प्रशासन कुछ करे वर्ना हम लोगों का जीना आफत (मुश्किल) हो जाएगा।"

सुखदेव बिहार की राजधानी पटना से करीब 275 किलोमीटर सुपौल जिले की परसरमा ग्राम पंचायत में रहते हैं। लेकिन ये समस्या अकेले उनकी नहीं है। बिहार के लाखों किसान नीलगाय के आतंक से परेशान हैं। किसी का गेहूं चौपट हुआ है तो किसी की मूंग, किसी की सब्जी की फसल चट कर गई हैं तो कहीं गन्ना। सुपौल से करीब 250 किलोमीटर दूर नवादा जिले में वारिस अली पंचायत के अभिषेक गुप्ता और गौरीकांत (71 वर्ष) उन परेशान किसानों में एक हैं।


अभिषेक गुप्ता (38 साल) गांव कनेक्शन को बताते है, "नीलगाय से बहुत परेशान हैं। एक बीघे (1 एकड़ 5 बीघा) में तंबाकू थी, उसके पौधे तोड़ दिए हैं तो गेहूं खा (चर) गए। सरकार को चाहिए या तो उनसे बचाने के लिए कुछ जहरीला पदार्थ छिड़कवाए या उनको मारा जाए।"

नीलगाय भारत के मैदानी और पठारी इलाकों में पाया जाना वाला घोड़े की तरह दिखने वाला एक जानवर हैं जो घने जंगलों की बजाए झाड़ियों में रहना पसंद करता है। नीलगाय के नाम में गाय जरूर जुड़ा है, लेकिन इसका गोवंश से ताल्लुक नहीं है। ये एशियाई मृगों के कुल का भारी-भरकम पशु है, जिसका वजन कई बार 2 से 4 कुंटल तक हो सकता है। नीलगाय (वनरोज) शाकाहारी होते हैं। जंगल-झाड़ियों की संख्या कम होने से किसानों के लिए बड़ा सिरदर्द हैं। नीलगाय झुंड में रहते हैं, दिन या रात कभी भी फसलें चर जाते हैं। देश के कई राज्यों में नीलगाय की समस्या है, लेकिन बिहार के किसान ज्यादा परेशान हैं।

नीलगाय का मुद्दा बिहार में पंचायत से लेकर विधानसभा और देश की संसद तक उठ चुका है। केंद्र सरकार नीलगाय के सशर्त शिकार अनुमति दे चुकी है। कुछ साल पहले सैकड़ों नीलगाय का शिकार भी हुआ था। लेकिन फिर कानूनी दांव पेंच फंस गए।

बिहार के कृषि मंत्री अमरेंद्र प्रताप सिंह के मुताबिक नील गाय से अपनी फसल को बचाने के लिए किसानों ने फसल चक्र बदला है। उनके मुताबिक नीलगाय से बिहार के किसानों की कितनी फसल की क्षति हुई है इसका वास्तविक आंकलन भी सरकार के पास नहीं है। इसका दायरा भी लगातार बढ़ रहा है। इस सब को देखते हुए पंचायती राज विभाग ने इस बात की अनुमति दी हैं कि मुखिया की अनुमति के बाद वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा उन पंचायतों के जंगली जानवरों के पकड़ने की कार्रवाई की जायेगी।


जनवरी 2022 में बिहार के पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन विभाग और पंचायती राज की सहमति से नवनिर्वाचित अधिकार को ये अधिकार दिया कि वो अपने क्षेत्र के नीलगाय को वन विभाग की मदद से पकड़वा सकते हैं। प्रदेश में नीलगाय की नसबंदी का कार्यक्रम शुरु हुआ है, लेकिन किसानों की समस्या का समाधान नहीं हो सका है। किसानों के मुताबिक इनकी संख्या इतनी ज्यादा हो चुकी है कि सरकार को बड़े स्तर पर अभियान चलाना होगा।

नीलगाय के आतंक पर राजनीति और विवाद भारी

बिहार में लगभग 30 वर्ष कृषि विभाग में अपनी सेवा दे चुके अरुण कुमार झा बताते हैं, "नीलगाय के बढ़ते आतंक के चलते पहली बार किसानों ने साल 2007 में किसान संघर्ष समिति के बैनर तले धरना-प्रदर्शन किया था। फिर 2010 में समिति के अध्यक्ष हरदयाल कुशवाहा ने पटना हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। हाईकोर्ट के आदेश के मद्देनजर राज्य सरकार ने अप्रैल 2012 में नीलगाय के सीमित शिकार का आदेश दिया, लेकिन इसके लिए पहले जिलाधिकारी या एसडीएम से लिखित अनुमति लेनी होती थी और नीलगाय के शव का अंतिम संस्कार अनिवार्य था। ऐसे में किसानों ने आंदोलन जारी रखा।"

वो आगे कहते हैं, "साल 2013 में नीतीश सरकार ने नीलगाय को संरक्षित जीवों की सूची से बाहर कर दिया और केंद्र सरकार से नीलगायों को मारने की इजाजत मांगी। साल 2015 के अंत केंद्र सरकार ने नीलगाय को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची 3 से हटाकर अनुसूची 5 यानी फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले जीवों की श्रेणी में डाल कर 1 दिसंबर, 2015 को केन्द्र सरकार ने एक साल के लिए मारने की अनुमति दी।"

नीलगाय शिकार के मुद्दे पर भिड़ गए थे 2 केंद्रीय मंत्री

बिहार में जब नीलगाय का शिकार हुआ तो किसानों ने राहत की सांस ली। लेकिन 2016 में लोकसभा में 2 केंद्रीय मंत्री नीलगाय के मुद्दे पर आमने सामने आ गए। बिहार के मोकामा टाल इलाके में जून 2016 में तीन दिनों में करीब 250 नील गायों को मारा गया था। इस घटना के बाद तत्कालीन केंद्रीय मंत्री मंत्री मेनका गांधी ने पशु क्रूरता को लेकर वन और पर्यावरण मंत्रालय पर सवाल उठाए थे। जिसके जवाब में तत्कालीन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जावड़ेकर ने कहा था कि जानवरों के हाथों फसल खराब होने से परेशान किसानों ने इसकी मांग की थी, जिसके बाद जानवरों को मारने की अनुमति दी गई है।

मोकामा टाल के ओटा गांव के किसान विजय सिंह (57 वर्ष) पूरे मामले पर कहते हैं, "मोकामा टाल में किसानों का खेती करना मुश्किल हो गया था। 10,000 से अधिक नीलगाय थीं। नीलगायों को मारने के लिए हैदराबाद से शूटरों की टीम बुलाई गई थी। जिसकी मदद से 250 नील गायों को मारा गया था और हजारों से अधिक नीलगाय को जंगली क्षेत्रों में भगाया गया था। इलाके के सभी किसान खुश थे, हालांकि खुशी अधिक दिन नहीं रही। आज भी हालात कुछ वैसे ही हैं।"

नीलगाय से फसल नुकसान पर कोई मुआवज़ा नहीं मिलता-किसान

मोकामा के किसान अजय पाठक (46 वर्ष) बताते हैं, "मोकामा टाल वो इलाका है जिसमें इतनी क्षमता है कि वो अकेले ही पूरे बिहार को दाल खिला सकता है। दलहन की खेती में धान और गेहूं से ज्यादा पूंजी लगती है, लेकिन कभी-कभी नीलगाय का झुंड पूर-पूरा खेत बर्बाद कर देता है। पकने के वक्त फसल बचाने के लिए किसान सर्द रातों में रखवाली करते हैं। इन्हें काबू करने लिए वन विभाग और कृषि विभाग आगे नहीं आ रहे हैं और ना ही किसी भी किसान को अभी तक मुआवजा मिला है।"

बिहार के कई जिलों में किसानों के लिए नीलगाय हैं बड़ा सिरदर्द

हो चुके हैं प्रदर्शन, अब आंदोलन की तैयारी

वैशाली जिले के सीपीआई (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) के जिलाध्यक्ष प्रकाश कुमार की अगुवाई में दिसंबर 2021 महुआ बाजार में किसानों ने प्रदर्शन किया था, जिसमें नीलगाय से फसल नुकसान पर मुआवजे की मांग की गई थी। वैशाली के बाद दूसरे जिलों में भी सीपीआई कार्यकर्ताओं ने इस मुद्दे पर प्रदर्शन किया था।

प्रकाश कुमार गांव कनेक्शन को बताते हैं, "नीलगाय के चलते सारण, सीवान, गोपालगंज, चंपारण, बक्सर, पटना, भागलपुर, सुपौल, सहरसा, भोजपुर, मुजफ्फरपुर और मधेपुरा जिले दलहन और सब्जी की खेती चौपट हो गई है। अगर सरकार और किसान अभी भी नहीं चेते तो प्रत्येक जिले में ऐसी तस्वीर देखने को मिलेगी।"


कोसी इलाका में किसानों के लिए काम कर रहे जन संघर्ष समिति के अध्यक्ष लक्ष्मण कुमार झा बताते हैं, "सरकार के द्वारा नीलगाय को रोकने के लिए जो नियम और कानून लाया जा रहा है। सब बेअसर है। आखिर कब तक हल्कू पूस की रात में जगा रहेगा। जन संघर्ष समिति बाकी किसान समितियों से बात कर रही है। जल्द ही सरकार ना चेती तो हम बड़े आंदोलन के लिए तैयार है।"

2020-2021 के दौरान मुजफ्फरपुर जिला के कांटी प्रखंड में सैकड़ों एकड़ रबी फसल को नीलगाय ने बर्बाद किया था। जिसके बाद कांटी प्रखंड के किसान लगातार आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हिमांशु गांव कनेक्शन को बताते हैं, "नीलगाय दिनों दिन काफी खतरनाक हो रही है। जैसे-जैसे उनकी संख्या बढ़ रही है। नीलगाय से फसलों को बचाने के लिए वे रतजगा कर रहे हैं। कभी ड्रम बजाकर नीलगाय को भगाने का प्रयास करते हैं तो कभी आग का गोला दिखाकर उनसे खेतों को बचा रहे हैं। किसानों के लगातार आंदोलन के बावजूद जिला प्रशासन इस दिशा में सख्त कदम नहीं उठा रहा है। अब आंदोलन जिला से बाहर करना पड़ेगा।"

बदल रहा फसल चक्र

बिहार के किसानों के मुताबिक बाढ़ और सूखे से वो हर साल परेशान होते हैं, लेकिन उनके यहां फसल चक्र मौसम और जलवायु नहीं नीलगाय के चलते बदल रहा है। कुछ किसान दूसरी कम जोखिम वाली फसलें बोने लगे हैं तो कुछ पैसे लगाकर घेराबंदी (कटीले तार, जाली, बांस) आदि लगवा रहे हैं। लेकिन ये सबके वश की बात नहीं।

सुपौल में बगही पंचायत के राजू मिश्रा ने पिछले साल (2021) में 40 कट्टा (22 कट्टा एक एकड़) खेत में सब्जी, मक्का और आलू की खेती की थी लेकिन 18-19 कट्टा खेत नीलगाय के चलते बर्बाद हो गया। जिसके बाद उन्हें बाड़ लगावानी पड़ी। राजू के मुताबिक नीलगाय के चलते उन्हें कम से कम 30-35 हजार का नुकसान हुआ था।


डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा, पटना के छात्र अनुराग शुभम बताते हैं, "एक नीलगाय को मारने पर दो हजार रुपये लागत आएगी। राज्य में कितनी नीलगाय है? इसका भी कोई आंकड़ा सरकार के पास नहीं है। साथ ही वन विभाग के नियम के अनुसार, एक फेज में एक जिले में अधिकतम पांच सौ नीलगाय को ही मारा जा सकता है। इस सबके बावजूद मानवाधिकार के लोग और गाय के नाम पर राजनीति करने वाले लोग भी सक्रिय हो जाएंगे।"

'गाय' नाम बचा लेता है?

सीपीआईएम के विधायक दल के नेता व विभूतिपुर के विधायक अजय कुमार ने मार्च 2021 में नीलगाय के मुद्दे को विधानसभा में उठाया था। अजय पूरे मामले पर कहते हैं, "किसानों के नीलगायों के उत्पात को सहन करते रहने की वजह इसके नाम के साथ 'गाय' जुड़ा होना भी है क्योंकि हमारे यहां लोग धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत है। इसलिए धार्मिक दृष्टि से इस पर अड़ंगा लग जाता है। किसानों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। ऐसा लगता है कि किसानों को अब खुद ही सड़क पर आना होगा।"

वन विभाग ने कहा- जल्द होगी कार्रवाई

मुजफ्फरपुर के डीएफओ एसके कर्ण गांव कनेक्शन को बताते हैं, "सरकार के द्वारा जब नीलगाय को मारने का आदेश मिला था तब हैदराबाद के चर्चित शूटर से राज्य स्तर पर संपर्क किए थे, उसके बाद वैशाली जिले के भगवानपुर थाना क्षेत्र में एक जिंदा नीलगाय प्रशासन की निगरानी में दफना दिया गया था। जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। फिर मानवाधिकार के लोग सक्रिय हुए और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। अब मुखिया के आदेश के बाद नीलगाय को मारने का नया आदेश मिला है। कुछ मुखिया शिकायत लेकर आए हैं। जल्द ही कार्रवाई की जाएगी।"

मौत की वजह भी बनती हैं नीलगाय

नीलगाय की सिर्फ फसल बर्बाद नहीं करते, कई बार वो हादसे की वजह और यहां तक की मौत की वजह भी बनते हैं। बिहार के ग्रामीण इलाकों में अक्सर दुर्घटनाएं होती रहती हैं।

समस्तीपुर जिले के रोसड़ा प्रखंड के मुरादपुर के राम विलास साह (68 वर्ष) बताते हैं, "5 अक्टूबर 2021 को उनकी 60 वर्षीय पत्नी कबूतरी देवी पोते और बहू के साथ मोटरसाइकिल से समस्तीपुर इलाज कराने जा रही थी। तभी उजियारपुर प्रखंड के अंगारघाट थाना क्षेत्र में रेबाड़ी ढाला के पास पहुंचने पर अचानक नीलगाय सड़क पार करने लगा। उनकी ठोकर से बाइक गिर गई। झुंड की चपेट में आकर पत्नी की मौत हो गई और बहू की स्थिति गंभीर हो गई थी।"

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