देश के अलग – अलग हिस्सों में प्रसिद्ध हैं ये 12 साग, क्या आपने भी चखा है इनका स्वाद ?

देश के अलग – अलग हिस्सों में प्रसिद्ध हैं ये 12 साग, क्या आपने भी चखा है इनका स्वाद ?साग

हम बचपन से ही सुनते आ रहे हैं कि हरे पत्तों में सबसे ज़्यादा पोषक तत्व पाए जाते हैं। हरे पत्तों वाले साग में आयरन, कैल्शियम, विटामिन्स, एंटीऑक्सीडेंट्स और फाइबर प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं और इन्हें खाने के कई फायदे भी हैं। पालक, मेथी, चौलाई, सरसों ऐसे साग हैं जिन्हें हम सर्दियों में अक्सर अपने घरों में इस्तेमाल करते हैं लेकिन इसके अलावा भी कई साग या हरे पत्ते ऐसे होते हैं जिनका इस्तेमाल किसी बीमारी से निपटने या स्वास्थ्य अच्छा बनाए रखने में मदद करते हैं। देश के अलग - अलग हिस्सों में ये साग काफी प्रचलित हैं। हालांकि अब लोग इनका इस्तेमाल काफी कम करने लगे हैँ।
अगर आप अपने रोज़ के खाने में कुछ ताज़ा स्वादों को शामिल करना चाह रहे हैं तो यहां हम आपको बता रहे हैं 12 स्वादिष्ट (और अत्यंत पौष्टिक) पत्तेदार सब्जियों या कुछ ऐसे पत्तों के बारे में जिनका लोग किसी तरीके से खाने में इस्तेमाल करते हैं... हो सकता है कि इनमें से कुछ के बारे में पढ़कर आपकी पुरानी यादें ताज़ा हो जाएं...

1. सहजन का साग

अगर पौधों में भी सुपरहीरो होते तो मोरिंगा (वानस्पतिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा से लिया गया) ज़रूर इनमें से एक होता। इसके पौधे के हर भाग को इस्तेमाल किया जा सकता है। पत्ते और नए फल खाने के तौर पर व बीज, फूल और जड़ औषधि के रूप में। सहजन के पत्ते पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। एक बार काटने और सूखाने के बावजूद भी इनमें प्रोटीन, सभी आवश्यक अमीनो एसिड, एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन और खनिज प्रचुर मात्रा में विद्यमान रहते हैं। पुराने समय से भारत में मधुमेह, हृदय रोग, एनीमिया, गठिया, यकृत की बीमारी और श्वसन, त्वचा और पाचन विकार जैसे कई बीमारियों के लिए एक पारंपरिक उपाय के रूप में इस्तेमाल जाता था।

2. कुल्फा का साग

पर्सलेन जिसे कुल्फा, घोल या लुनी साग भी कहते हैं, गर्मियों में इस्तेमाल किया जाता है। इसमें विटामिन ए, बी, सी, प्रोटीन, ओमेगा - 3 फैटी एसिड पाया जाता है। बुखार उतारने, यूरिनरी इनफेक्शन को ख़त्म करने संबंधी बीमारियों में भी पहले से इसका इस्तेमाल किया जाता था। दुनिया भर के कई वनस्पति अध्ययन कुल्फा के साग पर किए गए हैं। जंगली भोजन के अमेरिकी विशेषज्ञ ईयूएल गिबन्स ने इसे 'दुनिया का भारत के लिए उपहार' कहा है।

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3. अरबी का पत्ता

अरबी या घुइंया तो लगभग हर भारतीय घर में खाई जाती है लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके पत्ते भी काफी स्वादिष्ट होते हैं। साथ ही इसमें कई पोषक तत्व भी होते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश सहित कई प्रदेशों में अरबी के पत्ते को बेसन में लपेटकर इसकी पकौड़ी बनती हैं।

4. इमली की पत्ती

हममे में से ज़्यादातर लोगों को ये लगता है कि इमली के पत्ते तो बेकार होते हैं लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि स्वाद में खट्टे इमली के पत्तों में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसके अलावा इनमें फाइबर, पोटेशियम, आयरन और कैल्शियम भी पाया जाता है। दक्षिणी भारत के कई गाँवों में करी, चटनी और रसम बनाने में इमली के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है। आंध्र प्रदेश में एक ख़ास तरह की चटनी जिसका नाम चिंटाचिगुरु पच्चड़ी होता है, इमली के पत्तों से ही बनती है। इसे इमली के पत्तों के साथ मूंगफली के दाने, लहसुन की कली, सूखी लाल मिर्च और जीरा को साथ पीसकर बनाया जाता है।

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5. सुशनी साग


इसके सुसुनिया या सुशनी साग के नाम से जाना जाता है। दिखने में ये कुछ - कुछ तिपतिया घास की तरह लगता है लेकिन ये एक छोटा फर्न होता है। इसके पत्तों से पश्चिमी बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार व झारखंड में सूखी सब्ज़ी या चटनी बनाई जाती है। ये साग बिहार, झारखंड में इतना प्रसिद्ध है कि इस पर एक गाना 'खड़ो खेत में सुसुनिया गुंइया' भी बना है। कई विटामिन्स, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं।

6. हाक

हाक का इस्तेमाल जम्मू कश्मीर में किया जाता है। हाक, नीले वर्ण के साथ हरे रंग के अंडाकार पत्ते होते हैं जो काफी हद तक पालक की तरह दिखते हैं। हालांकि यह बंद गोभी से भी मिलती है और स्वाद में कुछ तीखे होती है। कश्मीर में हाक का इस्तेमाल उबाल कर, फ्राई कर के या पीस कर किया जाता है। सरसों के तेल में, हींग व मिर्च के तड़के साथ हल्की तले गए पत्ते भी काफी स्वादिष्ट होते हैं।

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7. गोंगुरा

इसे तेलुगू में गोंगुरा, मराठी में अम्बाड़ी, तमिल में पुलिचा किराइ, कन्नड़ में पुंडी, हिंदी में पितवा, उड़िया में खाता पलंगा, असमिया में टेंगा मोरा और बंगाली में मेस्तापत नाम से जाना जाता है। इससे ये पता चलता है कि देश के ज़्यादातर हिस्सों में ये साग खाया जाता है। इसकी पत्तियां प्राकृतिक रूप से खट्टी होती हैं। पत्तियों का खट्टापन अलग - अलग क्षेत्र के साग में अलग - अलग होता है। इसकी ताज़ी पत्तियों का साग बनाया जाता है। इसके अलावा मटन करी, तुअर दाल और अचार बनाने में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।

8. बिछु बूटी

सिसुनक साग या बिछु बूटी, एक बारहमासी पौधा है जो भारत के हिमालय क्षेत्र के जंगलो में होता है। बिछु बूटी के पत्तों से बना शोरबा हिमालय के क्षेत्रों में काफी पिया जाता है। इसका पत्ता अगर खाली हाथों से छुओ तो खुजली हो सकती है लेकिन पकाने के बाद ये ठीक हो जाता है।

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9. पुई साग


पुई साग के पत्ते काफी हद तक दिखने में पालक जैसे होते हैं। यह एक बारहमासी साग होता है। इसे कन्नड़ में बेसल सोप्पू और बंगाली में पुई साग, उत्तर प्रदेश में पोई कहते हैं। अंग्रेजी में इसे मालाबार स्पिनेच कहते हैं। यह कोई फसली पौधा नहीं, बल्कि प्रकृतिक रूप से पैदा होने वाली जंगली बेल है। इसका साग बनाया जाता है, इसके अलावा बंगाल में कद्दू के साथ मिलाकर इसकी सब्ज़ी बनाई जाती है जिसे कुमरो दिए पुई साग कहते हैं। यूपी में इसकी पकौड़ियां भी बनाते हैं।

10. पुनर्नवा का साग

पुनर्नवा एक आयुर्वेदिक औषधीय पौधा होता है। बारिश के मौसम में इसके पत्ते निकलते हैं और गर्मी में सूख जाते हैं, फिर जब बारिश होती है तो ये अपनेआप हरा हो जाता है इसीलिए इसे पुनर्नवा कहते हैं। ये एक बहुवर्षीय पौधा होता है। लगभग पूरे भारत में ये पौधा पाया जाता है। पुनर्नवा का साग बनाया जाता है, इसकी सब्ज़ी और काढ़ा भी बनाया जाता है।

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11. चौलाई का साग

यह एक छोटा एकवर्षीय पौधा है जिसकी पत्तियों को मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के ग्रामीण आँचलों में भाजी की तरह उपयोग में लाया जाता है। वास्तव में एक शाक आहार होने के साथ उत्तम औषधि भी है। इसके पाँचांग में कार्बोहाईड्रेड्स, प्रोटीन, खनिज और लौह तत्व प्रचुरता से पाए जाते हैं। आदिवासियों का मानना है कि गर्भ की स्थिरता के लिए मासिक धर्म के समय चौलाई की जड़ को चावल के माँड में पीसकर पिलाने से लाभ होता है। इसकी जड़ो और पत्तियों को सर पर बाँधने से बुखार उतर जाता है। चौलाई की भाजी माताओं में दूध के स्रावण को नियमित करने के लिए काफी कारगर मानी जाती है। जर्नल "फाइटोथेरापिया" में प्रकाशित एक क्लिनिकल स्ट्डी के अध्धयन से जानकारी मिलती है कि चौलाई में पाए जाने वाले पोषक तत्व बच्चों के मस्तिष्क के तीव्र विकास के बेहद गुणकारी हैं।

12. चिरोटा का साग

गुजरात और मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों में चिरोटा (वानस्पतिक नाम केसिया टोरा) की पत्तियों का उपयोग भाजी के तौर पर भी होता है और ऐसा माना जाता है कि यह भाजी अत्यधिक पौष्टिक होती है और इसे बरसात के मौसम में अवश्य रूप से आदिवासी रसोई में भाजी के तौर पर पकाया और बड़े चाव से खाया जाता है। चिरोटा की पत्तियों और बीजों का उपयोग अनेक रोगों जैसे दाद-खाज, खुजली, कोढ, पेट में मरोड़ और दर्द आदि के निवारण के लिये किया जाता है। आदिवासियों के अनुसार पत्तियों को बारीक पीसकर दाद-खाज, खुजली, घाव आदि पर लगाया जाए तो अतिशीघ्र आराम मिल जाता है। यदि किसी व्यक्ति को दाद-खाज और खुजली की समस्या हो तो चिरोटा के बीजों को पानी में कुचलकर रोग-ग्रस्त अंग पर लगाने से फ़ायदा होता है। आधुनिक विज्ञान भी इसके एंटी-बैक्टिरियल गुणों को साबित कर चुका है।

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Tags:    green vegetables 
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