यूपी का एक कस्बा जो है ख़िलजी और राजपूतों की दोस्ती की मिसाल  

यूपी का एक कस्बा जो है ख़िलजी और राजपूतों की दोस्ती की मिसाल  ये है यूपी का वो कस्बा

फ़िल्म पद्मावत को लेकर ख़िलजी वंश के दूसरे शासक अलाउद्दीन ख़िलजी इन दिनों सुर्ख़ियो में है, फ़िल्म निर्माण से लेकर फ़िल्म रिलीज होने तक इसका विरोध राजपूत करणी सेना कर रही है, करणी सेना के विरोध के चलते आज राजपूतों और अलाउद्दीन ख़िलजी के बीच दुश्मनी को लेकर इतिहास खंगाला जा रहा है, इनके बीच की दुश्मनी की तमाम दलील दी जा रही हैं, इस बीच सुलतान अलाउद्दीन ख़िलजी व राजपूतों के द्वारा मिलकर किए गए विकास को भुलाया जा रहा है

आज पूरे देश में फिल्म पद्मावत रिलीज हुई है, जिसका विरोध करणी सेना शुरू से करती आ रही है, इसी बीच सुलतान अलाउद्दीन ख़िलजी व राजपूतों के द्वारा मिलकर किए गए विकास को भुलाया जा रहा है, इसकी एक मिसाल एटा में भी है जहां एक कस्बा ऐसा भी है जिसकी नींव अलाउद्दीन ख़िलजी के आदेश पर राजपूत राजा मुनीराम ने रखी थी।

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यह कस्बा कभी स्वरूपगंज नाम का गाँव हुआ करता था, हालांकि इस कस्बे को अलाउद्दीन ख़िलजी की सेना ने ही उजाड़ा था लेकिन इसकी वजह ख़िलजी की सेना की एक टुकड़ी पर यहा के वाशिंदों द्वारा हमला कर लूटपाट करना रहा था, आज इस कस्बे को मारहरा के नाम से जाना जाता है, यहा मशहूर सूफी बुजुर्ग सैयद शाह बरकतुल्लाह साहब की दरगाह शरीफ है जो दुनियाभर में बरकाती सिलसिले के रूप में जानी जाती है, अलाउद्दीन ख़िलजी के आदेश पर राजपूत हाकिम द्वारा बसाया गया यह कस्बा आज भी हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल है।

पृथ्वीराज चौहान के दौर में बसा था गाँव स्वरूपगंज

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उर्दू के प्रोफेसर व मारहरा स्थित दरगाह खानकाहे बरकातिया के सज्जादानशीन सैयद अमीन कादरी बताते हैं, "सन् 1174ई0 के दौर में दिल्ली पर हुकूमत राजा पृथ्वीराज चौहान की हुआ करती थी, इस दौर में एटा से करीब 25 किलोमीटर दूरी पर पश्चिमी इलाके में कोई आबादी न थी, यहा घने जंगल और बंजर जमीन हुआ करती थी, इस इलाके के आसपास कुछ गाँव हुआ करते थे, इन चन्द गाँवों का एक जमींदार स्वरूप किशन राजपूत था, उन्होंने अपने नाम से इलाके के पूरब और उत्तर के रकबे को अपनी जमींदारी में दाखिल कर लिया था यहा की जमीन बंजर होने की वजह से यहा बंजारों के पड़ाव डलना शुरू हो गये, जब यह जगह इन बंजारों से आबाद हो गयी तो इसने एक गाँव की शक्ल ले ली और जमींदार ने इस गाँव का नाम स्वरूपगंज रख दिया था, इसका जिक्र 400 वर्ष पूर्व मशहूर बुजुर्ग हजरत मीर सैयद अब्दुल वाहिद बिलग्रामी द्वारा लिखी गयी किताब 'सबा सनाबिल' में है।"

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स्वरूपगंज के ग्रामीणों ने अलाउद्दीन ख़िलजी की सेना पर किया था हमला

प्रोफेसर सैयद अमीन कादरी बताते हैं, "जमींदार स्वरूप किशन राजपूत की मृत्यु के बाद इस गाँव व आसपास के इलाके का कोई हाकिम नही रहा, इस बीच यहा आमदनी का जरिया भी नही बन सका, धीरे-धीरे यहा के लोगों ने डकैती का पेशा अख्तियार कर लिया, सन् 1296 ई0 में दिल्ली की सल्तनत पर अलाउद्दीन ख़िलजी का कब्जा हो चुका था, इसी साल अलाउद्दीन ख़िलजी की सेना की एक टुकड़ी इस इलाके से रसद का जरूरी सामान लेकर जा रही थी, तभी यहा मौजूद डकैतों ने सेना की इस टुकड़ी पर हमला कर दिया और सेना की टुकड़ी से लूटपाट व कत्लेआम कर फरार हो गए।"

अलाउद्दीन ख़िलजी ने बर्बाद करा दिया स्वरूपगंज

प्रोफेसर सैयद अमीन कादरी बताते हैं, "स्वरूपगंज में सेना की टुकड़ी पर हमला कर लूटपाट और मारकाट की खबर जब सुलतान अलाउद्दीन ख़िलजी को हुयी तो वह आगबबूला हो उठे, उन्होंने सेना के साथ किए गए दुर्व्यवहार का सबक सिखाने के लिए इस इलाके में सेना भेज दी, सेना ने यहा हमला कर दिया, देखते ही देखते सेना ने इस गाँव को तबाह और बर्बाद कर दिया, हमले के बाद यह इलाका वीरानों और खण्डहर में तब्दील हो गया।"

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अलाउद्दीन ख़िलजी के आदेश पर बसाया गया मारहरा

कासगंज स्थित कोठीवाल आढ़तिया महाविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर राधा कृष्ण दीक्षित से जब इस इतिहास के बारे में जाना तो उन्होंने बताया, "एटा मुख्यालय से करीब 21 किमी पश्चिम में स्थित कस्बा मारहरा की नींव अलाउद्दीन ख़िलजी के दौर में रखी गयी थी, इतिहास के पन्नों में इस कस्बे का शानदार माज़ी छिपा हुआ है, जोकि एटा के गौरव को चार चाँद लगा रहा है, 'मारहरा' नाम व इस कस्बे की बुनियाद के पीछे एक ऐतिहासिक दास्तान यह है कि जब इस इलाके को सुलतान अलाउद्दीन ख़िलजी की सेना ने खण्डहर में तब्दील किया तो ठीक उसके चार वर्ष बाद 1300ई0 के समीप सुलतान के जिलेदार राजपूत राजा मुनीराम ने सुलतान की आज्ञा पाकर इस इलाके में 'मारहरा' कस्बा की नींव डाली, चूँकि गाँव स्वरूपगंज नेस्तनाबूद होने के बाद दोबारा आबाद हुआ अर्थात आबादी 'मारने' के बाद 'हरी' हुयी इसलिए इसलिए इसका नाम मार-हरा रखा गया जो धीरे-धीरे मारहरा के नाम से पहचाने जाने लगा।"

शेरशाह सूरी ने घोषित किया मारहरा परगना व नियुक्त किया था कानूनगोई

अलाउद्दीन ख़िलजी के दौर में बसा कस्बा मारहरा शेरशाह सूरी के दौर में परगना(तहसील) घोषित किया गया था, इतिहासकार प्रो. राधा-कृष्ण दीक्षित बताते हैं, "सन् 1531 ई0 में ख्वाजा इमादउद्दीन उर्फ़ शेख इमाद कम्बोह अपने परिवार के साथ मुल्तान छोड़कर मारहरा में आए थे, इस वक़्त यहा मुस्लिम समाज के मशहूर बुजुर्ग हजरत मखदूम शेख जहीरउद्दीन (रह0) रहते थे, शेख इमाद कम्बोह उनके मुरीद होकर यही रहने लगे, धीरे-धीरे शेख इमाद के कबीले के शेष लोग भी मारहरा में आकर आबाद हो गए, सन् 1542ई0 में शेरशाह सूरी ने इसी खानदान के ख्वाजा हसन ज़ुबैरी कम्बोह को परगना मारहरा की कानूनगोई और चौधराहट के ओहदे देने के फरमान जारी किए थे, यह पद उस दौर में बड़े सम्मान की दृष्टि से देखे जाते थे, ये फरमान आज भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मौलाना आजाद पुस्तकालय में सुरक्षित हैं।

मारहरा को मिली मशहूर सूफी बुजुर्ग सैयद शाह बरकतुल्ला से पहचान

मुगल बादशाह अकबर का मारहरा में किया था स्वागत, खुश होकर दी थी पांच हजार बीघा जमीन तोहफे में

समय के साथ गाँव से कस्बा में तब्दील हुआ मारहरा मुगलकाल में भी सुर्खिया में रहा, यहा मुगलकाल के बादशाह अकबर का स्वागत यहा के नौजवान जमींदार उमर खान कम्बोह शहीद ने किया था, प्रसिद्ध किताब आलम शाही के मुताबिक़ जब शहंशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर ने मारहरा में अपने लश्कर के साथ प्रवेश किया तो यहां के एक बहादुर नौजवान उमर खान कम्बोह शहीद ने शहंशाह से इजाजत लेकर बहुत शानदार दावत दी व उनका स्वागत किया था, उमर खान कम्बोह के वंशज व वर्तमान में मारहरा नगर पालिका परिषद के चैयरमैन परवेज ज़ुबैरी बताते हैं, "उमर खान कम्बोह शहीद बेहद ईमानदार थे, जब बादशाह अकबर ने अपने शानदार मेहमान नवाजी से खुश होकर जरूरत का सामान मांगने को कहा, लेकिन उन्होंने कोई ख्वाहिश जाहिर नही की, फिर भी बादशाह अकबर ने खुश होकर 5 हजार बीघा जमीन दिए जाने के एहकाम जारी कर दिए, बादशाह द्वारा दी गयी इस जमीन पर आज भी मारहरा का मौहल्ला कम्बोह आबाद है।"

बंटवारे से पहले देश का सबसे ज्यादा शिक्षित मुस्लिम इलाका था मोहल्ला कम्बोह

सन् 2011 की जनगणना के अनुसार मारहरा की आबादी 19615 है, यहा पुरुष की संख्या 10289 है तो वही महिलाएं 9326 हैं, साक्षरता दर की अगर बात करें तो यहा 63 फीसदी लोग पढ़े हुए हैं, देश की आजादी से पहले यह सबसे अधिक मुस्लिम बाहुल्य शिक्षित कस्बा था, परवेज ज़ुबैरी बताते हैं कि "मारहरा कस्बा ऐतिहासिक है, यहा सबसे अधिक शाक्षरता दर रही है, देश की आजादी से पहले कस्बा का मौहल्ला कम्बोह मुस्लिम बाहुल्य था साथ ही यह देश में सबसे ज्यादा मुस्लिम साक्षरता दर वाला इलाका था, देश के बंटवारे के बाद अधिकतर लोग यहा से चले गए, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पहले वाइस चांसलर रहे डॉ जियाउद्दीन ने मारहरा में मॉरिसन इस्लामिया स्कूल की स्थापना की थी आज यह एमजीएचएम इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है, इसके अलावा मौलवी ओवैस अहमद की पत्नी शमीम फातिमा ने लड़कियों के लिए मौहल्ला कम्बोह में ही शमीम फातिमा निस्वां गर्ल्स स्कूल की नीवं डाली थी।"

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मारहरा को मिली मशहूर सूफी बुजुर्ग सैयद शाह बरकतुल्ला से पहचान

मारहरा आज दुनियाभर में अपनी पहचान यहा के मशहूर सूफी बुजुर्ग सैयद शाह बरकतुल्ला से बनाए हुए है, 1605-1627 ई0 में मुगल बादशाह जहांगीर के दौर में बुजुर्ग हजरत मीर सैयद शाह अब्दुल जलील(रह0) खुदा की इबादत के लिए कस्बा में आए थे, इन्हें कस्बा के जमींदार चौधरी वजीर खां ज़ुबैरी लेकर आए थे, इन बुजुर्ग ने पूरे 41 वर्ष तक यहा की ब्रज भाषा को अपनाकर अपना जीवन व्यतीत किया, इनके स्वर्गवास होने के नाती हजरत सैयद शाह बरकतुल्ला मारहरा आए और यही के होकर रह गए, आपके स्वर्गवास होने के बाद यहा फर्रुखाबाद के नबाव मुहम्मद बंगश खां ने भव्य खानकाह का निर्माण कराया था, इस खानकाह के कई मशहूर बुजुर्गों ने अपना नाम दुनियाभर में रोशन किया, यही से बरेली शरीफ के आला हजरत मुरीद हुए, इस खानकाह में पैगम्बर मोहम्मद साहब के अवशेष रखे हैं जिनके दर्शन के लिए दुनियाभर से जायरीन हर वर्ष उर्स में आते हैं।

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आज भी पिछड़ा है मारहरा

कस्बा की ऐतिहासिकता को देखते हुए यहा किसी भी जनप्रतिनिधि ने इसके विकास का कोई खाका नही खिंचा, कस्बा में आने जाने के लिए कोई पर्याप्त साधन नही है, मथुरा-कासगंज रेलवे लाइन से जुड़ा होने से जरूर रेलवे की सुविधा का लाभ यहा के वाशिंदों को मिल जाता है, रोजगार के मामले में यह काफी पिछड़ा हुआ है कभी यहा की लाख की चूड़िया देशभर की स्त्रियों के हाथो की शोभा बढ़ाती थी लेकिन कोई सरकारी मदद न मिलने के कारण यह रोजगार पूरी तरह उजड़ गया, मूंगा-मोती का कारोबार भी काफी प्रसिद्ध था लेकिन वह भी नहीं रहा, आज यह कस्बा अपनी बदहाली पर आंसू बहाता है।

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