तिरपाल में चलने वाले 'अपना स्कूल' ने बदली 20 हजार बच्चों की जिंदगी

कभी ये बच्चे मिट्टी में पानी डालते तो कभी अपने नन्हें पैरों से मिट्टी को रौंदते। ईंट भट्टों पर रहने वाले इन बच्चों के लिए तो स्कूल जाना और पढ़ाई करना किसी सपने जैसा था, लेकिन आज ये बच्चे इस खास स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं।

Neetu SinghNeetu Singh   9 Jan 2020 12:35 PM GMT

तिरपाल में चलने वाले

चौबेपुर (कानपुर)। पेड़ के नीचे खड़ी पीले रंग का शाल ओढ़े तेरह साल की शर्मिला के चेहरे पर खुशी थी क्योंकि वो पहली बार एक हफ्ते से पढ़ने आ रही थी।

"मैं भी पढ़ना चाहती हूँ पर पूरे दिन कैसे पढूं? दो घंटे ठेकेदार से बचके चुपचाप पढ़ने आती हूं।'' थोड़ी सहमी सी शर्मिला जब ये बताती है, तो शब्द भले उसका साथ नहीं दे रहे थे, लेकिन आंखों में खुशी की चमक जरूर थी। शर्मिला उन लड़के लड़कियों में से एक है, जिसके माता-पिता ईंट-भट्टों पर काम करते हैं साथ में वो भी करती है।

"ठेकेदार से मेरे पापा ने उधार पैसे लिए हैं। हम पढ़ने आएंगे तो वो गुस्सा करेगा। 6-7 दिन में एबीसीडी थोड़ी-थोड़ी आने लगी है।'' शर्मिला अपनी मजबूरी बताती है।

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पीले रंग का शाल ओढ़े खड़ी शर्मिला ठेकेदार से चुपचाप रोजाना पढ़ने आती है.

शर्मिला बिहार के नवादा जिले के पड़रिया गांव की रहने वाली है। नवंबर में इनका परिवार बिहार से पलायन करके कानपुर में चौबेपुर के भट्टे पर काम करने के लिए आया है। शर्मिला की तरह बिहार के सैकड़ों बच्चे अपने माता-पिता के साथ पलायन करके अलग-अलग शहरों में ईंट-भट्टों पर काम करने के लिए जाते हैं।

"दो बेटियां हैं एक की शादी कर दी दूसरी शर्मिला है। थोड़ी देर के लिए ही सही लेकिन पढ़ने के लिए भेज देते हैं, कम से कम अपना नाम लिखना तो सीख ही जाएगी, हमें तो वो भी नहीं आता। हमने कर्ज़ लिया है तभी इनके (ठेकेदार) अधिकार में हैं।'' जनवरी की सर्दी में काम से वक्त निकालकर आग ताप रहे शर्मिला के पिता झहरी (45 वर्ष) बताते हैं।

जनवरी की सर्दी में काम से वक्त निकालकर आग ताप रहे शर्मिला के पिता झहरी.

ईंट-भट्टे पर काम करने वाले बच्चे पढ़ाई कर सकें इसके लिए देश के आठवें राष्ट्रपति आर वेंकटरमण की बेटी विजयाराम चन्द्रन ने वर्ष 1986 में 'अपना स्कूल' की शुरुआत की। ये अस्थाई स्कूल ईंट भट्टे के बगल में बांस और तिरपाल से बनाये जाते हैं, जिससे यहाँ के बच्चों को स्कूल आने में मुश्किल न हो। पिछले 33 सालों से 'अपना स्कूल' में 20,000 से ज्यादा बच्चे पढ़ाई कर चुके हैं।

ये बच्चे अलग-अलग राज्यों जैसे बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम, यूपी-एमपी (बुन्देलखण्ड) से हैं। इन बच्चों में 90 फीसदी बच्चे बिहार के मुसहर समुदाय से होते हैं, जिनके लिए पढ़ाई करना अभी भी किसी सपने जैसे ही है।

"अभी ये एक बहुत छोटा प्रयास है। जितने भट्टे चल रहे हैं उन तक हम नहीं पहुंच पा रहे हैं। इन भट्टों पर शुद्ध पीने के पानी का ही इंतजाम नहीं बाकी चीजों की तो बात छोड़िए।'' विजया रामचंद्रन (73 वर्ष) ने गांव कनेक्शन को फोन पर बताया।

"इनके माता-पिता अपने 10-12 साल के बच्चे पर 15,000-20,000 लोन लेते हैं। ऐसे में इनकी मजबूरी हैं ये पढ़ाई कैसे करें? तभी कुछ बड़े बच्चे दो घंटे के लिए ही पढ़ने आ पाते हैं। ये ज्यादा नहीं कम से कम अपना नाम लिखना और थोड़ा बहुत पढ़ना सीख जाएं, इनके लिए यही बहुत बड़ी बात है।''

देश के आठवें राष्ट्रपति आर वेंकटरमण की बेटी विजयाराम चन्द्रन ने वर्ष 1986 में 'अपना स्कूल' की शुरुआत की।

शर्मिला जिस 'अपना स्कूल' में पढ़ती है वो कानपुर के चौबेपुर ब्लॉक से तीन किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में सम्राट भट्टा के पास में चलता है। इस अपना स्कूल में तीन भट्टों के 72 बच्चे पढ़ने आते हैं। कानपुर में ऐसे 10 अपना स्कूल चलते हैं, जिसमें 20-25 भट्टों के लगभग 700 बच्चे रोजाना पढ़ते हैं। इस स्कूल में ये बच्चे नवंबर से जून तक ही पढ़ पाते हैं इसके बाद ये वापस अपने घर लौट जाते हैं।

"इन बच्चों को कभी हम डांटते-पीटते नहीं हैं। हमारे लिए इन बच्चों का स्कूल आना ही एक बड़ी उपलब्धि है। शुरुआती दिनों में महीने भर तक इन्हें भट्टों से बुलाकर लाना पड़ता है। खेल-खेल में इन्हें यहाँ पढ़ाते हैं, जिससे इनका मन लगा रहे।'' अपना स्कूल में पढ़ा रही शिक्षिका रक्षा वाजपेयी ने बताया। रक्षा भट्टे पर चलने वाले इस स्कूल में वर्ष 2005 से पढ़ा रही हैं। वो बच्चों के हाथ साबुन से धुलने में मदद कर रहीं थीं क्योंकि ये बच्चे खाना खाने की तैयारी कर रहे थे।

पिछले 33 वर्षों से इन बच्चों को मुफ्त शिक्षा के साथ-साथ स्कूल बैग, कॉपी किताब, बैग, जूते-मोजे, ड्रेस और दोपहर बाद पौष्टिक खाना भी निशुल्क दिया जाता है। नीला स्वेटर, नीला पैंट, चेकदार नीली शर्ट पहने ये बच्चे तिरपाल के नीचे बैठकर सुबह 9 बजे से शाम तीन बजे तक पढ़ाई करते हैं।

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बच्चों को हाथ धुलने में मदद कराती वहां की शिक्षिका रक्षा वाजपेयी.

कानपुर में मौजूदा वक्त में 240 भट्टे हैं। एक भट्टे पर 50-100 परिवार काम करते हैं। इस हिसाब से एक भट्टे पर लगभग 200-250 लोग रहते हैं।

अपना स्कूल (कानपुर) के समन्यवक लक्ष्मीकांत शुक्ला ने बताया, "इन बच्चों के साथ सबसे बड़ी चुनौती ये रहती है कि इनमें से ज्यादातर बच्चे अगले साल वापस आएंगे या नहीं? क्योंकि इनके ठेकेदार इन्हें जहां भेजते हैं ये वहीं जाते हैं। ऐसे में कई बार हमारे शिक्षक इन बच्चों के गाँव जाकर वहां के सरकारी स्कूल में पढ़ाते हैं, जिससे इनकी पढ़ाई बीच में बंद न हो।''

उन्होंने आगे कहा, "पहले की अपेक्षा अब ज्यादातर बच्चे वापस आने भी लगे हैं। इनमें से कुछ बच्चों को हम लोग 'अपना घर' नाम के हास्टल में भेज देते हैं जहाँ ये रहकर आगे की पढ़ाई पूरी कर सकें।''

कानपुर में अपना स्कूल के साथ 'अपना घर' नाम का हास्टल तातियागंज में चलता है जहाँ अभी 45 बच्चे रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। 'अपना घर' की देखरेख कर रहे महेश कुमार ने बताया, "ये बच्चे यहाँ रहकर इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद अपनी रूचि के अनुसार आगे की पढ़ाई करने चले जाते हैं। यहां रहने वाले बच्चों में से कोई एलएलबी कर रहा है तो कोई पालीटेक्निक। ये बच्चे बहुत अच्छे ब्लॉगर भी हैं।'' इन बच्चों के द्वारा लिखे 'बाल सजग' नाम के ब्लॉग को लगभग डेढ़ लाख लोग पढ़ते हैं।

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'बाल सजग' नाम का ब्लॉग चलाते अपना स्कूल के बच्चे.

महेश बताते हैं, "इसमें लिखी कविताओं में इन बच्चों की पीड़ा होती है। देश के अलग-अलग राज्यों के लाखों लोग इसे पढ़ते हैं और कमेंट करके इन बच्चों का उत्साह बढ़ाते हैं। ये बच्चे फोटोग्राफी और वीडियो भी खुद ही बनाना सीख चुके हैं, इनमें लगन बहुत है बस इन्हें मौका मिलने की जरूरत है।"

अपना स्कूल में लाइन में बैठकर खाना खा रहे दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले रवि ने खुश होकर उत्साह के साथ कहा, "यहाँ बहुत अच्छा लगता है, खाते भी हैं खेलते भी हैं।'' आपके घर वाले आपको स्कूल आने देते हैं इस पर रवि उदास होकर बोले, "सुबह स्कूल पढ़ने आते हैं तो बहुत काम करके आते हैं, शाम को जब यहाँ से पढ़कर जाते हैं तब भी काम करते हैं, तभी वो कुछ नहीं कहते।''

ईंट भट्टों पर काम करने वाले मजदूरों के ये बच्चे पढ़ाई क्यों नहीं कर पाते विजयाराम चन्द्रन के मन को ये बात हमेशा खटकती थी। एक बच्चे से उन्होंने पढ़ाना शुरू किया था अब ये संख्या हजारों में पहुंच गयी है। उन्होंने बताया, "पिछले 33 सालों में कुछ बच्चे ऐसे निकले हैं जो आज अच्छी नौकरी कर रहे हैं। एक बच्चे का पुलिस में हो गया है, चार-पांच बच्चे प्राईवेट नौकरी कर रहे हैं। नौकरी कर रहे और उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे ये बच्चे अपने समुदाय के दूसरे बच्चों के लिए उदाहारण बन गये हैं।''

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इन बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाया जाता है जिससे उनकी स्कूल आने में रूचि बने रहे .

विजया रामचंद्रन मूलरूप से तमिलनाडु की रहने वाली हैं, इनके पति वर्ष 1968 में कानपुर आईआईटी में प्रोफ़ेसर पद पर तैनात हुए। तबसे ये कानपुर रेलवे स्टेशन से 16 किलोमीटर दूर पश्चिम दिशा में आईआईटी हाउसिंग सोसाइटी के गोपालपुर मोहल्ले में रहने लगीं।

शुरुआती दौर में विजयाराम चन्द्रन कई किलोमीटर पैदल चलकर कोहरे वाली सर्दियों और लू वाली गर्मियों में ईंट-भट्टों पर काम कर रहे मजदूरों के पास जाकर उनके बच्चों को स्कूल भेजने की गुजारिश करती थी। इनकी मेहनत रंग लाई और अब इन स्कूलों में पढ़कर कई बच्चे जिंदगी में नई ऊंचाइयां छू रहे हैं।

मूलरूप से झारखंड रांची के रहने वाले मुकेश कुमार (22 वर्ष) बचपन से ही कानपुर के भट्टों पर काम करते थे, जब अपना स्कूल खुला तो वहां इन्होंने पढ़ाई शुरू की। मुकेश ने बताया, "पैदा होते ही इन भट्टों पर मां-बाप को ईंट पाथते देखा है, जब बड़ा हुआ तो मैंने भी यही काम शुरू कर दिया। जब विजया दीदी मेरी मां के पास गईं और मुझे पढ़ाने के लिए बोला तो उन्होंने मना कर दिया, उनके बहुत समझाने पर मेरी मां तैयार हुई थी।''

दोपहर में खाना खाते बच्चे.

"मैं स्नातक कर रहा हूं और अपना स्कूल में बच्चों को पढ़ा भी रहा हूं, जिसके बदले मुझे पैसा भी मिलता है, अब भट्टों पर मेरा काम करना बंद हुआ। आज मेरी तरह आस-पास के कई भट्टों के युवा पढ़ाई करके कुछ न कुछ काम कर रहे हैं।'' मुकेश की इन बातों में खुशी छलकती है।

भट्टों पर रहने वाले इन बच्चों को उचित खानपान नहीं मिलता है जिससे इनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। यहाँ पढ़ने वाले बच्चों का तीन-तीन महीने में स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाता है। इन बच्चों के स्वास्थ्य पर काम कर रहीं सुनीता श्रीवास्तव कहती हैं, "जब ये बच्चे यहाँ दाखिला लेते हैं तब हम इनका वजन तौलते हैं और जब ये वापस अपने गाँव जाते तब भी। इन बच्चों में 6-7 किलो का अंतर होता है।''

"हरी सब्जियां, दाल, अंडा जैसी कई चीजें खाने में दी जाती हैं जिससे इन्हें पर्याप्त पोषक तत्व मिले। जैसे अभी सर्दी चल रही है तो इन्हें विटामिन सी की पूर्ती के लिए आंवले का मुरब्बा दे रहे हैं।'' सुनीता ने बताया।

पिछले 15 सालों से अपना स्कूल में पढ़ा रहे शिक्षक प्रदीप श्रीवास्तव इन बच्चों के शिक्षक से ज्यादा दोस्त और भाई हैं। बच्चे इन्हें एक स्वर में अपना भईया कहते हैं। प्रदीप ने अपना अनुभव साझा किया, "जब इन बच्चों को ड्रेस पहनकर, बस्ता पीठ पर लाकर स्कूल आते देखता हूँ तो दिल को बड़ी तसल्ली मिलती है। हम अपने बच्चों से ज्यादा इन बच्चों के करीब हैं क्योंकि इनका जीवन बहुत मुश्किलों भरा है।''

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