अब आयुष डॉक्टर लिख सकेंगे एलोपैथिक दवाएं, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल लोकसभा में पेश

केंद्र सरकार ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को हटाकर नेशनल मेडिकल कमीशन लाने के लिए बिल पेश किया है, वहीं मेडिकल के क्षेत्र में पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में प्रवेश के लिए नीट को खत्म करने की भी बात कही गई है

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   24 July 2019 12:00 PM GMT

अब आयुष डॉक्टर लिख सकेंगे एलोपैथिक दवाएं, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल लोकसभा में पेशप्रतीकात्मक तस्वीर फोटो: गाँव कनेक्शन

लखनऊ। ग्रामीण क्षेत्रों में एलोपैथिक डॉक्टरों की कमी को देखते हुए सरकार ने आयुर्वेद और होम्योपैथिक के चिकित्सकों को प्राथमिक स्तर पर एलोपैथी की प्रैक्टिस करने की बात कही है। इसके लिए कमीशन उन्हें बतौर सामुदायिक स्वास्थ्य प्रदाता लाइसेंस जारी करेगा। हालांकि, इन लाइसेंस की संख्या पंजीकृत एमबीबीएस चिकित्सकों की कुल संख्या के एक-तिहाई से कम होगी।

केंद्र सरकार ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को हटाकर नेशनल मेडिकल कमीशन लाने के लिए बिल पेश किया है। जिसे मंजूरी भी मिल गई। नेशनल मेडिकल कमीशन का गठन हो जाने के बाद यह प्रक्रिया आसान हो जाएगी। सोमवार को लोकसभा में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन की ओर से नेशनल मेडिकल कमीशन बिल पेश किया गया। बिल में देश की मेडिकल शिक्षा को एक समान बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके साथ-साथ मेडिकल के क्षेत्र में पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में प्रवेश के लिए नीट को खत्म करने की भी बात कही गई है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर फोटो: गाँव कनेक्शन

वहीं, नेशनल मेडिकल कमीशन बिल के विरोध में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन है। आईएमए ने इस विधेयक को जनविरोधी और अलोकतांत्रिक बताया है। आईएमए लखनऊ के प्रेसिडेंट डा. जीपी सिंह ने गाँव कनेक्शन को बताया, " सरकार का यह कदम बहुत गलत है। इस बिल से मेडिकल छात्रों के सामने कई दिक्कतें खड़ी हो जाएंगी। स्नातक के बाद डॉक्टरों को एक परीक्षा देनी होगी और उसके बाद ही मेडिकल प्रेक्टिस का लाइसेंस मिल सकेगा। इस बिल से ऐलोपैथिक डॉक्टरों के अधिकारों का हनन होगा। "

सरकार ने प्रस्ताव रखते हुए कहा कि पीजी कोर्स में दाखिले किए लिए एमबीबीएस अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए कॉमन टेस्ट को आधार बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। इस स्क्रीनिंग टेस्ट का नाम नेशनल एग्जिट टेस्ट रखा जाएगा। इस परीक्षा को पास करने के बाद ही डॉक्टरों को मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए लाइसेंस मिलेगा।

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पीएचसी और सीएचसी में इलाज के लिए आयुष चिकित्सकों को कुछ माह का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसमें वे एलोपैथी पद्धति में इलाज के गुर सीखेंगे। उन्हें जीवन रक्षक दवाइयों का प्रिस्क्रिप्शन, सामान्य डिलेवरी कराना, दुर्घटना ग्रस्त मरीजों को प्राथमिक उपचार देना आदि के आधार पर प्रशिक्षण दिया जाएगा।

लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्विद्यालय के एक सीनियर रेसिडेंट डॉक्टर ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, " यह बिल मेडिकल के क्षेत्र में नौकरशाही को बढ़ावा देगा। यह सरकार की नाकामी का बिल है। जिन लोगों ने होम्योपैथी और आयुर्वेद की चार साल पढ़ाई की है उन्हें एलोपैथी का डॉक्टर क्यों बना रहे हैं। कुछ महीने का कोर्स करके क्या वे एलौपैथी का इलाज कर सकेंगे। यह बात हम लोगों की समझ से परे है। "

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इस बीच मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दिल्ली एम्स के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) के अध्यक्ष डॉ. अमरिंदर ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को एक पत्र भी लिखा है। इस पत्र में उन्होंने कहा है कि विधेयक के जरिए जिस तरह की समिति का गठन सरकार चाहती है, वह एक तानाशाही रवैये जैसा है। उन्होंने कई तरह के संशोधन की मांग की है।, एम्स के डॉक्टरों ने भी सदन में मौजूद सभी सांसदों से विधेयक पर चर्चा करने से पहले डॉक्टरों की मांग पर गौर करने की अपील भी की है।

मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया के पास वर्ष 2017 तक कुल 10.41 लाख डॉक्टर पंजीकृत थे। इनमें से सरकारी अस्पतालों में 1.2 लाख डॉक्टर हैं। बीते साल सरकार ने संसद में बताया था कि निजी और सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले लगभग 8.18 लाख डाक्टरों को ध्यान में रखें तो देश में डॉक्टर और मरीजों का अनुपात 1:1,612 हो सकता है। लेकिन यह तादाद भी विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के मुकाबले कम ही है। इसका मतलब है कि तय मानक पर खरा उतरने के लिए देश को फिलहाल और पांच लाख डॉक्टरों की जरूरत है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर फोट: गाँव कनेक्शन

जानें इस राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग में आखिर क्या है?

इस विधेयक में राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग ( राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग) के गठन का प्रस्ताव किया गया है। यह आयोग मेडिकल (आयुर्विज्ञान) शिक्षा की उच्च गुणवत्ता और उच्च स्तर को बनाए रखने के लिए नीतियां बनाएगा। इसके अलावा मेडिकल संस्थाओं, अनुसंधानों और चिकित्सा पेशेवरों के नियमन के लिए नीतियां निर्धारित करेगा।

इसके अलावा यह स्वास्थ्य और स्वास्थ्य संबंधी देखभाल से संबंधित बुनियादी ढांचे समेत स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की अपेक्षाओं और जरुरतों तक पहुंच बनाना सुनिश्चित करेगा तथा ऐसी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए एक रुपरेखा तैयार करना।

इसमें कहा गया है कि सभी मेडिकल संस्थाओं में स्नातक आयुर्विज्ञान शिक्षा के लिए प्रवेश के लिहाज से एक सामान्य राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा होगी। आयोग अंग्रेजी और ऐसी अन्य भाषाओं में परीक्षा का संचालन करेगा।

आयोग सामान्य काउंसलिंग की नीतियां भी निर्धारित करेगा। इसके तहत स्नातक आयुर्विज्ञान शिक्षा बोर्ड, स्नातकोत्र आयुर्विज्ञान शिक्षा बोर्ड और चिकित्सा निर्धारण और रेटिंग बोर्ड तथा शिष्टाचार और चिकित्सक पंजीकरण बोर्ड का गठन करेगी।

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स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा बोर्ड का काम पीजी स्तर पर और अति विशिष्ट (सुपर-स्पेशलिटी) स्तर पर मेडिकल शिक्षा के स्तर बनाए रखना और उससे संबंधित पहलुओं की निगरानी करना है।

इसमें कहा गया है कि राज्य सरकार, उस राज्य में यदि वहां कोई चिकित्सा परिषद नहीं है तो इस कानून के प्रभाव में आने के तीन वर्ष के भीतर उस राज्य में चिकित्सा परिषद स्थापित करने के लिए आवश्यक उपाय करेगी।

विधेयक के उद्देश्यों और कारणों में कहा गया है कि किसी भी देश में अच्छी स्वास्थ्य देखरेख के लिए मेडिकल शिक्षा का भलीभांति क्रियाशील विधायी ढांचा जरूरी है।

इसमें कहा गया कि 1956 में लागू भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (एमसीआई) अधिनियम समय के साथ तालमेल नहीं रख सका। इस पद्धति में विभिन्न अड़चनें पैदा हो गई हैं जिनका मेडिकल शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

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