आजादी के समय हमारी आबादी 33 करोड़ थी जो बढ़कर 136 करोड़ पहुंंच गई

आज के दिन खासतौर पर पानी की उपलब्धता पर गौर करने का दिन है, आजादी के समय देश में हर व्यक्ति के लिए 5600 घनमीटर पानी उपलब्ध था लेकिन आज इस समय प्रति व्यक्ति 1400 घनमीटर पानी ही उपलब्ध होगा

Suvigya JainSuvigya Jain   11 July 2019 9:50 AM GMT

आजादी के समय हमारी आबादी 33 करोड़ थी जो बढ़कर 136 करोड़ पहुंंच गई

ग्यारह जुलाई को हर साल विश्व जनसंख्या दिवस आता है और हर साल जनसंख्या पर बात करने का मौका आता है। इस साल अपनी आबादी को लेकर विमर्श का कोई बड़ा आयोजन होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। फिर भी देश में कई जगह सामाजिक कार्यकर्ता अपने अपने स्तर पर जनसंख्या के बारे में चिंता या चिंतन कर जरूर रहे होंगे। यह तो बाद में पता चलेगा कि उन्होंने नया क्या सोचा लेकिन रस्म के तौर पर कुछ सोचना हो तो इस बार हमें अपनी जनसंख्या की वास्वतिक स्थिति का अंदाजा जरूर करना चाहिए।

2019 तक पहुंचते पहुंचते यह तो तय है कि इस समय दुनिया में आबादी के लिहाज़ से दो सबसे बड़े देशों में हम भी शामिल हैं। चीन के बाद दूसरे नंबर की सबसे बड़ी आबादी हमारी ही है। जनगणना तो हर दस साल में एक बार होती हैं। पिछली बार जनगणना 2011 में हुई थी और तब तक देश की आबादी 121 करोड़ पहंच चुकी थी। अगली जन गणना सन 2021 में होगी। तभी पता चलेगा हम कहां पहुंच गए है। फिर भी संयुक्त राष्ट्र और दूसरी विश्व संस्थाओं के आकलन को देखें तो आज सन 2019 तक हमारी आबादी 136 करोड़ पहुंच जाने का अनुमान है। देश के नीति निर्माता और देश के बड़े पदों पर आसीन लोग अभी भी अपनी आबादी 130 करोड़ होने का जिक्र करते हैं। ये छह करोड़ का अंतर बड़ा फर्क डालता है। खासतौर पर देश की योजनाएं बनाने के लिए यह फर्क इतना बड़ा है कि सीमित संसाधनों की प्रति व्यक्ति उप्लब्धता को समझने में बड़ा फर्क डाल सकता है। आज विश्व जनसंख्या दिवस के मौके पर हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता का जिक्र भी कर लेना चाहिए।

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नई बात यह है कि चीन के बाद हम आज दूसरे नंबर पर जरूर हैं लेकिन चीन की तुलना में हमारी जनसंख्या वृद्धि दर कोई सवा दो गुनी है। चीन की वृद्धिदर शून्य दशमलव पांच फीसद है तो हमारी एक दशमलव दो फीसद। पिछले नौ साल में बाकी सभी देशों की तुलना करें तो भारत की जनसँख्या सबसे तेज रफ्तार से बढ़ी है। इस रफतार से 2027 तक हम चीन से भी ज्यादा आबादी वाले देश यानी दुनिया में सबसे बड़ी आबादी वाले देश बनने की कगार पर पहुंच गए हैं। दूसरी बात यह कि चीन प्राकृतिक संसाधनों में हमसे बेहतर हैं जिसमें उसके देश के बड़े आकार की बड़ी भूमिका है. इसीलिए यह देख लेना चाहिए कि क्या वाकई हमारे पास इतने प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं कि इस बढती आबादी की जरूरतों को हम पूरा करने में समर्थ कहला सकें।

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प्राकृतिक संसाधनों में हम जल जंगल जमीन की बात करते हैं। जंगल तो खैर जल और जमीन पर ही निर्भर है सो जल और जमीन ही बचती है जिसका आकलन आज के दिन होना चहिए। आंकलन में कोई ज्यादा मुश्किल भी नहीं है क्योंकि ये दोनों ही संसाधन लगभग स्थिर हैं। भारत के पास विश्व की 2.5 फीसद ज़मीन है और 4 फीसद जल लेकिन वैश्विक आबादी का 18 फीसद हिस्सा भारत में रहता है। और ऐसा नहीं है कि यह स्थिति कोई आज अचानक बन गई है। आजादी के दिन जितनी जमीन हमारे हिस्से थी उतनी ही जमीन आज भी हमारे पास है। और आजादी के समय जितना पानी हर साल हमें प्रकति से मिलता था उतना ही पानी आज भी मिल रहा है। लेकिन आजादी के समय हमारी आबादी 33 करोड़ थी जो बढ़कर 136 करोड़ पहंच गई। यानी आबादी में कोई चार गुना बढ़ोतरी हो चुकी है।


आज के दिन खासतौर पर पानी की उपलब्धता पर गौर करने का दिन है। आजादी के समय देश में हर व्यक्ति के लिए 5600 घनमीटर पानी उपलब्ध था लेकिन आज इस समय प्रति व्यक्ति 1400 घनमीटर पानी ही उपलब्ध होगा। आज के दिन अगर एक विशेष तथ्य पर ध्यान देने की जरूरत है तो वह ये है कि आजादी के समय हमें अपने जल संसाधन का पूरा इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं थी। तब हमें हमारी जरूरत से ढाई गुना पानी उपलब्ध था। लेकिन आज यह हमारी न्यूनतम जरूरत से लगभग आधा ही उपलब्ध है। बात यही पर खत्म नहीं होती। जरूरत से जो आधा पानी उपलब्ध है उसका भी आधा ही हम इस्तेमाल कर पा रहे हैं। यानी मोटा अनुमान यह लगता है कि इस समय देश में प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष एक चौथाई पानी ही इस्तेमाल किया जा पा रहा है। बाकी बचा पानी बाढ़ की तबाही मचाता हुआ समुद्र मे वापस चला जा रहा है।

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थोड़ी देर के लिए मान लें कि एक चौथाई पानी में ही 136 करोड़ जनता का काम किसी तरह चल रहा है। लेकिन क्या हम यह भी नहीं देख रहे हैं कि बढ़ी हुई आबादी के लिए इस समय पानी की भारी किल्लत महसूस होने लगी है। यानी आज विश्व जनसंख्या दिवस पर यह हिसाब लगाने का भी मौका है कि आने वाल पांच साल या अगले दशक में अनुमानित आबादी के लिए हमारे पास कितना पानी उपलब्ध होगा। अगर आज ही उतना पानी उपलब्ध नहीं है तो आगे की उपलब्धता पर हिसाब लगाने की गुंजाइश ही नहीं है। कई वैश्विक एजेंसियों के पैमानों के अनुसार अगर किसी देश में जल उपलब्धता 1700 घनमीटर प्रतिव्यक्ति से नीचे चली जाती है तो उसे वाटर स्ट्रेस्ड नेशन कहते हैं और अगर प्रतिव्यक्ति जल उपलब्धता 1000 घनमीटर से नीचे चली जाये तो वह देश वाटर स्कार्स की श्रेणी में चला जाता है।


प्रकृति से मिलने वाले पानी की उपलब्धता बढ़ाने का कोई भी तरीका अभी तक किसी भी देश में ईजाद नहीं हो पाया है। हद से हद यह हो पाया है कि पानी को एक बार इस्तेमाल करने के बाद उसे साफ करके दुबारा तिबारा इस्तेमाल लायक बना लिया जाए। या फिर शोध के रूप में समुद्र के पानी को पीने लायक बनाने की मशीन ज़रूर विकसित करने की कोशिशें चल रही हैं। लेकिन यह काम खासे खर्चीले हैं। माली हालत के मददेरजर ऐसी कोई सूरत बनती नहीं दिखती कि हम आने वाले एक या दो दशकों में यह क्षमता हासिल कर पाएं। लेकिन यह जरूर सोच सकते हैं कि आने वाले दो चार दशकों में अपनी जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए क्या किया जाए। कम से कम उतना नियंत्रण जैसा चीन ने अपने यहां किया था। चीन इस मामले में आज और आनेवाले कुछ समय के लिए निश्चिंत है। क्या चीन जैसे देशों के अनुभवों पर गौर करने का यह बिल्कुल सही समय नहीं है?

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