मराठवाड़ा: नांदेड़ में मर रही मछलियां, औरंगाबाद में खेती के लिए खरीद रहे पानी

Arvind Shukla

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Arvind Shukla   

16 May 2019 6:33 AM GMT

<p> पिछले 13 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत अरविंद शुक्ला गांव कनेक्शन में डिप्टी न्यूज एडिटर हैं (डिजिटल हेड)। खेती-किसानी और ग्रामीण विकास के क्षेत्र पर रिपोर्टिंग करते हैं। गांव कनेक्शन से पहले कई अख़बारों और समाचार चैनलों में काम कर चुके हैं।</p>

नांदेड़/लखनऊ। महाराष्ट्र के कई इलाकों में लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं। मराठवाड़ा के नांदेड़ में तालाब और डैम सूख गए हैं। मछलियों समेत जलीय जंतु तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहे हैं तो लोग प्यास बुझाने से लेकर खेती और पशुओं तक के लिए लीटर में पानी खरीदने को मजबूर हैं। जिस पर कई इलाकों में 2 रुपए से लेकर 5 से 6 रुपए लीटर का खर्च आता है।

मुंबई से करीब 600 किलोमीटर दूर नांदेड़ में शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर सुनेगांव तालाब है। सौ एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैला ये तालाब पूरी तरह सूख गया है। तालाब की मछलियां मर गई हैं। सुनेगांव निवासी और महाराष्ट्र में ग्राम रोजगार सेवक संघ के प्रदेश महासचिव शेख मलंग उस्मान बताते हैं, "मेरी उम्र 39 साल की है, मेरी जानकारी में ये तालाब पहली बार सूखा है। जो पानी कहीं कहीं दिख रहा है वो एक दो दिन में सूख जाएगा। इस तालाब से करीब 20 हजार लोगों को पानी जाता था।"

water crisis in maharashtra kill millions of fish : सूखे के चलते नांदेड़ के मरी पड़ी मछलियां। फोटो- शेख मलंगwater crisis in maharashtra kill millions of fish : सूखे के चलते नांदेड़ के मरी पड़ी मछलियां। फोटो- शेख मलंग



मलंग उस्मान ये भी बताते हैं, "तालाब में जो पानी बचा है वो पशुओं के पीने योग्य भी नही है क्योंकि इतनी ज्यादा मछलियां और दूसरे जीव-जंतु मरने से ये जहरीला (दूषित) हो गया है।"

आधा भारत इन दिनों सूखे की चपेट में है। महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड समेत देश के कई राज्यों में लाखों लोग पानी को तरस रहे हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक इस साल मराठवाड़ा में 1972 से भीषण सूखा पड़ा है।

मराठवाड़ा के ही औरंगाबाद जिले में भी हालात बद्तर है। यहां के पैठन डैम नाथ सागर से नांदेड़ को पानी जाता है। ये इलाका मौसम्बी फल की खेती के लिए जाना जाता है। लेकिन इस बार यहां बाग के बाग सूख गए हैं। किसानों को पानी खरीद कर लाना पड़ रहा है। पारंडु गांव के जाकिर जमीरुद्दीन शेख के पास 3 एकड़ एक गुंट्टा जमीन है, जिसमें उन्होंने मौसम्बी के बाग लगा रखे हैं। जाकिर बताते हैं, "तीन एकड़ के मौसम्बी के बाग को बचाने के लिए इन दिनों रोज एक टैंकर (20 हजार लीटर) पानी चाहिए होता है। जिसे हमारे गांव से 35 किलोमीटर दूर पैठन डैम से लाना होता है। इस एक टैंकर पर करीब 3000 से साढ़े ती हजार का खर्च आता है। "

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फोटो : शेख मलंग उस्मानफोटो : शेख मलंग उस्मान

जाकिर के मुताबिक उनके यहां 2014-15 में अच्छी बारिश हुई थी महाराष्ट्र के औरंगादाह में 2014 में 163.44 मिलीमीटर, 2015 में 77.81 मिमी. 2016 में 122.41, 2017 में 94.34 मिमी और 2018 में 106.77 मिलीमीटर बारिश हुई थी।

हिंदुस्तान टाइम्स वेबसाइट पर प्रकाशित ख़बर के मुताबिक सूखे से महाराष्ट्र के 21,000 गांव प्रभावित हैं। इनमें से ज्यादातर लोग टैंकर के पानी पर निर्भर हैं। प्रदेश जल संसाधन विभाग के मुताबिक मराठवाड़ा के डैम में सिर्फ 4.92 फीसदी बानी शेष बचा है। जबकि पूरे राज्य की बात करें तो 17.04 फीसदी पानी बचा है। जबकि पिछले साल इन्हीं दिनों में 29.55 फीसदी पानी था, जबकि मराठवाड़ा के बांधों में 25.54 फीसदी पानी बचा था।

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प्रदेश में हालात और बद्तर हो सकते हैं क्योंकि महाराष्ट्र के 9 में 8 बड़े जलाशयों में पानी नहीं बचा है। इन जलाशयों में सिर्फ मृत जल यानि वो पानी बचा है यो इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीश बुधवार को औरंगाबाद और जलाना बाद जिलों में हालात की समीक्षा की। जिसमें जिला स्तर के अधिकारियों से लेकर सरपंच और ग्राम सेवक तक शामिल हुए। अपने ट्वीट में मुख्यमंत्री ने लिखा कि प्रभावित जिलों में राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है। उन्होंने सरपंच से कहा अगर आवश्यकता के अनुसार पानी के टैंकर नहीं मिलते हैं तो तहसीलदार या फिर सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय को फोन करें। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई हो और रिपोर्ट मुझे सौंपी जाए।

नांदेड़ में लोहा तालुके के मलंग उस्मान बताते हैं, "हमारे यहां ज्यादातर लोग अब पानी खरीदने लगे हैं। 1000 लीटर पानी के कम से कम 200 से 250 रुपए देने पड़ते हैं। सुनेगांव तालाब से नांदेड़ कस्बे को भी पानी जाता था। तालाब सूखने से मछिलयां मर गईं, बाकी पशुओं क भी बुरा हाल है, न चारा है न पानी।" नांदेड भारत के 100 बड़े शहरों की लिस्ट में शामिल है।

पशुओं को सूखे से बचाने के लिए राज्य सरकार ने बचाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने मराठवाड़ा क्षेत्र में 1066 फोडर कैंप स्थापित किए हैं। 9 मई को यूएनआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसमें करीब 707 कैंप बीड, उस्मानाबाद, जलाना और औरंगाबाद में जिलों में खोले गए हैं। जबकि 501844 पशुओं को सरकारी कैंपों में लाया गया है।

जाकिर की जुबानी पानी की समस्या

हमारा घर मुंबई से 600 किलोमीटर दूर है। पिता जी के नाम 3 एकड़ एक गुंटा खेती है। हम लोग अपने अनार और मौसम्बी की खेती को बचाने के लिए पानी खरीद कर लाते हैं। यहां ज्वार, टमाटर, कांदे की भी खेती होती है। करीब 30-35 किलोमीटर दूर से टैंकर से पानी आती है। एक टैंकर में 20 हजार लीटर पानी होता है। जिसके लिए 3000-3500 रुपए खर्च करने पड़ते हैं। एक टैंकर में मेरी मौसम्बी के खेत के लिए दो दिन का पानी हो जाता है। अभी हमें 10 जून तक कम से कम ऐसे ही पानी देना होगा।

चार महीने पानी देते हो गए हैं। आम मोटा मोटी अनुमान लगाइए तो तीन लाख 80 हजार का कुल खर्च आ रहा है एक महीने का। यानी चार महीने में 7 लाख से ज्यादा खर्च हो जाएंगे। पिछले साल सिर्फ 3 लाख की मौसम्बी ही हुई थी। यानि बाकी बाकी सब घाटा होगा। सिर्फ 2015 ऐसा साल था जब हमें मौसम्बी की खेती से 8 लाख रुपए मिल थे, बाकी कई वर्षों से लगातार घाटा हो रहा है। सिर्फ मौसम्बी ही नहीं पानी के चलते किसान के लिए हर फसल उगाना महंगा हो गया है। कांदा (प्याज) का भी किसान को 200 रुपए कुंतल का भाव मिला। मौसम्बी का 1500-1700 रुपए कुंतल का रेट मिला था पिछले साल ऐसे में किसान लगातार घाटे के चलते कर्ज़ के दलदल में फंसता जा रहा है? महाराष्ट्र में शेतकारी (किसान) पानी के चलते जान दे रहा है। हमारे तालुके में 224 गांव हैं। हर जगह पानी की दिक्कत है।

बहुत सारे किसानों को शिवाजी जी महाराज कर्ज़माफी योजना का भी लाभ नहीं मिला था। मेरे गांव में 300 खातेदार हैं। जिसमें से सिर्फ 89 लोगों का कर्ज़ माफ हुआ था बाकि 211 लोगों को आज भी इंतजार है। पिछले दिनों ही 19 लोगों की बैंक से आरसी आई थी। अब जब खेत में कुछ बचा नहीं है। फसल है नहीं, पशु भूखे मरने की कगार पर हैं किसान बैंक का कर्ज कहां से चुकाएगा। मेरे गांव के आसपास कई किसानों ने आत्महत्या की है। अकेले औरंगाबाद में मेरी जानकारी के मुताबिक 2019 में 300 किसानों ने आत्महत्या की है। 2018 में बीमा मंजूर हुआ था। लेकिन किसान को नहीं मिला, मैंने रिलायंस कंपनी (बीमा कंपनी) को फोन किया, उन्होंने कहा कि पैसा बैंक को भेज दिया गया है लेकिन हम लोगों को तो मिला नहीं। (जाकिर शेख से जैसा की गांव कनेक्शन को फोन पर बताया।"

ये भी देखिए : मराठवाड़ा का किसान पानी के लिए क्यों तरस रहा है?



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<p> पिछले 13 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत अरविंद शुक्ला गांव कनेक्शन में डिप्टी न्यूज एडिटर हैं (डिजिटल हेड)। खेती-किसानी और ग्रामीण विकास के क्षेत्र पर रिपोर्टिंग करते हैं। गांव कनेक्शन से पहले कई अख़बारों और समाचार चैनलों में काम कर चुके हैं।</p>

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