मराठवाड़ा का किसान पानी के लिए क्यों तरस रहा है?

सरकार ने जल संरक्षण के लिए नई व्यस्थाएं शुरु की हैं, लेकिन इतने कम पानी में ऐसे कैसे संभव है। हम हर दिन तीन-पांच किमी. पीने का पानी लेने जाते हैं। हम आठ सौ रुपए में टैंकर पानी खरीदते हैं, जो हमारे खेत में सिंचाई में प्रयोग होता है।

Shubham KoulShubham Koul   22 April 2019 9:03 AM GMT

औरंगाबाद (महाराष्ट्र)। खाली पड़े खेत, घरों में लगे ताले, सूखे हैंडपंप, ये हाल है औरंगाबाद जिले के पारुंदी गाँव का, जहां पिछले कुछ वर्षों से लगातार होती कम बारिश ने किसानों की कमर तोड़ दी है। हालत ये है कि अब किसानों को खेती के लिए टैंकर में पानी खरीद कर लाना पड़ता है।

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के औरंगाबाद जिले में सूखे की मार सबसे ज्यादा किसानों पर पड़ी है। परुंदी गाँव के किसान सवोदाराम पाटिल की मौसम्बी के बाग के 600 पौधे सुखी लकड़ियों में बदल गए हैं। लेकिन ये अकेले उन्हीं की परेशानी नहीं है। उनके गाँव के युवा किसान जाकिर खान कहते हैं, "2018 सबसे खराब मानसून वर्ष था, हमें अपनी खरीफ की उपज में भारी नुकसान हुआ, जिसमें कपास, मक्का की फसल शामिल हैं, अगर ऐसा ही रहा तो अगले साल तक हमारे लिए खेती करना मुश्किल हो जाएगा।"

आईएमडी के अनुसार, मराठवाड़ा में 2014 में 42 प्रतिशत और 2015 में 50 प्रतिशत कम बारिश हुई। अगर पिछले पांच वर्षों में मराठवाड़ा के औरंगाबाद जिले में प्राप्त हुए आंकड़ों के अनुसार ये सामान्य से कम वर्षा के आंकड़े हैं। नीचे दी गई तालिका औरंगाबाद के पिछले 5 वर्षों के वर्षा रिकॉर्ड को दर्शाती है।


सूखे की समस्या से निपटने के लिए राज्य सरकार ने पहले पानी के संरक्षण के लिए कई उपाय किए हैं। दिसंबर 2014 में, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने जलयुक्त शिवार अभियान (JSA) शुरू किया।

"राज्य का लगभग 82 प्रतिशत क्षेत्र वर्षा आधारित क्षेत्र में आता है और 52 प्रतिशत क्षेत्र अनिश्चित, अपर्याप्त और अनियमित वर्षा के कारण सूखा है, जो कृषि को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है।" जेएसए इस प्रकार 5,000 गांवों को हर साल पानी की कमी से मुक्त बनाने और लाने का लक्ष्य रखता है। अगले पांच वर्षों में 25,000 सूखाग्रस्त गांवों को जल सशक्तिकरण।

महाराष्ट्र के जल संसाधन विनियामक प्राधिकरण के सचिव सुरेश कुलकर्णी कहते हैं, "पानी को संरक्षित करने के लिए, पानी को रिचार्ज करना होगा, नहीं तो पीने के लिए भी पानी नहीं बचेगा।"

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लेकिन औरंगाबाद के पारुंदी गाँव के भगवान छड़े अलग कहानी बताते हैं, ''सरकार ने जल संरक्षण के लिए नई व्यस्थाएं शुरु की हैं, लेकिन इतने कम पानी में ऐसे कैसे संभव है। हम हर दिन तीन-पांच किमी. पीने का पानी लेने जाते हैं। हम आठ सौ रुपए में टैंकर पानी खरीदते हैं, जो हमारे खेत में सिंचाई में प्रयोग होता है। हम एक एकड़ कपास के खेत में 12 हजार से 15 हजार रुपए खर्च करते हैं। फर्टिलाइजर के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं, मजदूरी बढ़ रही है। लेकिन फसल का उतना दाम नहीं मिल पाता है। हमारे क्षेत्र में ज्यादातर घरों में ताले लग गए हैं लोग नौकरी की तलाश में शहर जा रहे हैं।


हाई रेजुलेशन साउथ एशिया ड्रॉट मानिटर ने 6 अप्रैल 2019 को जारी 'ड्रॉट अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (डीईडब्ल्यूएस) इंडिया' नाम से जारी अपनी रिपोर्ट में बताया कि भारत का 16.59 फीसदी हिस्सा इस वक्त लगभग भीषण सूखे से जूझ रहा है। जबकि 41 फीसदी हिस्से में सूखे जैसे हालात हैं। इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि 6 अप्रैल 2018 को देश का मात्र 10.81 फीसदी हिस्सा भीषण सूखे की चपेट में था।

डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार, मराठवाड़ा में हर दिन 1300 टैंकरों से 983 गाँवों और 513 वाड़ियों में पानी की आपूर्ति की जाती है। सोलापुर जिले के उज्जानी बांध से ट्रेन से मराठवाड़ा तक पानी पहुंचाया जा रहा है। पूरे महाराष्ट्र में 2,000 टैंकर पानी की आपूर्ति कर रहे हैं।

जयकवाड़ी बांध का निर्माण 1976 में औरंगाबाद जिले में गोदावरी नदी पर किया गया था। निसर्ग मित्र मंडल के विवे दीवान कहते हैं, "बांध का उद्देश्य सूखे मराठवाड़ा में सिंचाई के लिए सेवा करना था। हालाँकि इसका मृत स्टॉक 26TMC है। इसका एक बड़ा हिस्सा गाद से भर गया है, जिससे पानी की वास्तविक उपलब्धता कम हो जाती है। सरकार को महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र में लोगों को राहत देने के लिए पारंपरिक जल निकायों और तालाबों को पुनर्जीवित करना चाहिए था।"

ग्रामीणों ने किया लोकसभा चुनाव का बहिष्कार

35 गाँवों के किसानों ने लोकसभा चुनाव का बहिष्कार करने का फैसला किया है। ये सभी गाँव पैठण तालुका में आते हैं। पैठण तालुका लोकसभा चुनाव के लिए जालना निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आता है, और भारतीय जनता पार्टी के रावसाहेब दानवे पिछले दो कार्यकाल से जालना से संसद के सदस्य रहे हैं। वह 4 बार जालौन सीट से जीते हैं।



औरंगाबाद के किसान अनीश राजुरकर ने बताते हैं, "जिन गांवों ने चुनावों का बहिष्कार करने का फैसला किया है उनमें नानेगांव, पुसगांव, डडगांव, बालांगर, डेडखेड़ी, खड़गांव, सोनवाड़ी, दावणडी, बलांगर, मोतीटांडा, हरसी बीके शामिल हैं। सभी पैठण तालुका के अंतर्गत आते हैं।

"गाँव वाले ऋण माफी, बांध को पूरा करने की मांग कर रहे हैं, जो उन्हें पानी की आपूर्ति कर सकता है, लेकिन उनकी कोई भी मांग पूरी नहीं हुई है, "औरंगाबाद के परौंदी गांव से संजय रामनाथ बताते हैं।

मराठवाड़ा क्षेत्र में किसानों की आत्महत्या

सूखती फसलों के साथ ही किसानों की आत्महत्याएं भी बढ़ रही हैं। बिजनेसलाइन ने हाल ही में बताया कि पिछले पांच वर्षों (2014-2018) में, 14,034 किसानों (यानी एक दिन में आठ किसानों) ने अपना जीवन समाप्त कर लिया और महाराष्ट्र सरकार द्वारा जून 2017 में किसानों के 34,000-करोड़ के ऋण माफी की घोषणा के बाद महाराष्ट्र में 4,500 से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली।



निसर्ग मित्र मंडल के अध्यक्ष विजय दीवान आगे कहते हैं, "रेनफेड क्रॉपिंग पैटर्न में बदलाव आया है, 1960- 1980 के दौरान मराठवाड़ा में लोग ज्वार, मक्का, मूंगफली पर निर्भर रहते थे, लेकिन बदलते समय के साथ उन्होंने गन्ने और कपास की फसल पर बहुत अधिक निर्भर रहना शुरू कर दिया है। कपास मराठवाड़ा की पारंपरिक फसल है। इसमें नकदी फसलों की तुलना में कम पानी की आवश्यकता होती है। कृषि के लिए पानी पर निर्भर लोगों के लिए, कृषि प्रसंस्करण इकाइयों का होना जरूरी है, जिससे वर्षा की कमी होने पर भी किसानों को बेहतर खेती करने में मदद मिल सके।

"महाराष्ट्र के साथ ही आंध्र प्रदेश उत्तरी तमिलनाडु, झाराखंड और बिहार के कुछ जिलों में समस्या ज्यादा गंभीर है। जिन इलाकों में भू-जल की स्थिति ठीक है। वहां ज्यादा समस्या नहीं होगी, बाकि इलाकों में स्थिति बदतर हो सकती है। दूसरी बात इस वक्त ये निर्भर करेगा कि स्टोरेज पानी (जलाशय आदि) का हम उपयोग कैसे करते है।" प्रो. विमल मिश्रा, आईआईटी गांधीनगर ने बताया।

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