सीए की नौकरी छोड़ कर रहे हैं खेती , हर साल होती है 50 लाख की कमाई

सीए की नौकरी छोड़ कर रहे हैं खेती , हर साल होती है 50 लाख की कमाईराजीव बिट्टू रांची के ओरमांझी ब्लॉक में लीज पर खेती कर रहे हैं

कॉमर्स की पढ़ायी करने के बाद हर कोई चार्टर्ड अकांउटेंट (सीए) बनने का सपना देखता है लेकिन झारखंड के राजीव बिट्टू ने ये चलन ही बदल दिया, वो सीए तो बन गए, लेकिन इसे उन्होंने अपना पेशा नहीं बनाया और अपना रुख खेती की तरफ किया।

राजीव आज रांची के ओरमांझी ब्लॉक में लीज पर खेती कर रहे हैं। राजीव ने फोन पर गाँव कनेक्शन को बताया, ''मुझे हमेशा से लगता कि जो किसान हमारे लिए अनाज, सब्ज़ियां, फल उगाते हैं उन्हें हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं जो सही नहीं है। इसलिए मैंने ये फैसला किया कि अब मैं भी खेती करूंगा और लोगों को किसानों की कीमत समझाने की कोशिश करूंगा।''

खेती के शुरुआती दिनों के बारे में बताते हुए राजीव कहते हैं, ''खेती ने मेरी ज़िन्दगी बदल दी है मैं रांची में रहता हूं और यहां से रोज 28 किलोमीटर दूर अपने खेतों तक जाता हूं। सीए करने के बाद जब नौकरी करने की बारी आई तो मुझे लगा कि मैं चाहरदीवारी में खुद को कैद करके नहीं रख सकता हूं। मुझे प्रकृति से प्रेम है इसने हमारी जिंदगी को सबकुछ दिया है इसीलिए मैं खेती कर रहा हूं।''

उस वाकये ने बदल दी सोच

2003 में सीए की परीक्षा पास करने के बाद राजीव ने रांची में ही 5000 रुपये के मासिक किराए पर 150 वर्ग फीट का एक कमरा लिया और सीए की प्रैक्टिस करने लगे। वह हर महीने 40,000 रुपए के आसपास कमा लेते थे। 2009 में उन्होंने प्लास्टिक इंजीनियर रश्मि सहाय से शादी कर ली। 2013 का साल राजीव के लिए काफी बदलाव वाला साल था। उस साल जब राजीव अपनी तीन साल की बेटी के साथ बिहार के गोपालगंज में स्थित अपने गाँव गए तो देखा कि उनकी बेटी गाँव वालों के साथ घुलमिल गई है और काफी खुश भी है, लेकिन उन्हें आश्चर्य हुआ जब एक किसान ने उनकी बेटी को अपने गोद में लेना चाहा। उनकी बेटी इसलिए किसान की गोद में जाने को राजी नहीं थी क्योंकि उनके कपड़ों में मिट्टी लगी थी।

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सीखे खेती के गुर

बेटी के इस रवैये से राजीव काफी चिंतित हुए। उन्हें लगा कि जो किसान हमें अनाज मुहैया कराते हैं उन्हें हम इस तरह नजरअंदाज नहीं कर सकते। इसके बाद उन्होंने तय कर लिया कि वह खेती करेंगे।वह खेती से जुड़ी हुई तमाम जानकारियां जुटाने लगे। वह कई सारी यूनिवर्सिटी के कृषि विभाग में गए वहां के प्रोफेसरों से मदद और सलाह मांगी। वह लोकल किसानों के पास भी गए और उनसे खेती के गुर सीखे।

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केले की तैयारी। प्रतीकात्मक तस्वीर

नहीं थी खेती के लिए ज़मीन

वह बताते हैं कि जब मैंने खेती करने के बारे में सोचा तो सबसे बड़ी समस्या ये थी कि मेरे पास खेती के लिए ज़मीन तक नहीं थी। इसके लिए मैंने रांची से 28 किलोमीटर दूर एक गाँव के किसान से उसकी दस एकड़ जमीन लीज पर ले ली। लेकिन शर्त थी कि वह पूरे मुनाफे का 33 प्रतिशत उस किसान को देना होगा। राजीव ने उस साल लगभग 2.50 लाख रुपये खेती पर खर्च कर दिए। उन्होंने जैविक तरीके से लगभग सात एकड़ में तरबूज और खरबूजे की खेती की। काफी मेहनत के बाद जनवरी के अंत में उनकी फसल तैयार हो गई और लगभग 19 लाख रुपये में बिक भी गई। उन्हें इससे लगभग 7-8 लाख रुपये का फायदा हुआ। इससे राजीव का हौसला बढ़ा और वह खेती के नए-नए प्रयोग करने लग गए। अब उनके खेत में लगभग 45 मजदूर काम करते हैं।

एक करोड़ के टर्नओवर का है लक्ष्य

राजीव ने उसी गाँव में 13 एकड़ और जमीन लीज पर ली और वहां भी खेती करने लगे। 2016 के अंत में उन्होंने इसी खेती से लगभग 40-45 लाख का कारोबार किया। उन्होंने हाल ही में कुचू गाँव में तीन एकड़ जमीन और लीज पर ली है जहां वे सब्जियां उगाते हैं। राजीव का लक्ष्य सालाना एक करोड़ का टर्नओवर करने का है। बाढ़ और सूखे जैसे हालात की चिंता उन्हें हमेशा रहती है क्योंकि इससे खेती को काफी नुकसान पहुंचता है और अचानक से सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है। राजीव के इस काम में उनके दो साथी देवराज (37 वर्ष) और शिव कुमार (33 वर्ष) भी हाथ बंटाते हैं। आजकल राजीव 32 एकड़ में खेती कर रहे है मल्चिंग और ड्रिप इरीगेशन से खेती कर रहे हैं और साल में लगभग 50 लाख रुपये का मुनाफा कमाते हैं।

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ऐसी थी शुरुआती ज़िंदगी

राजीव बिहार के सीवान जिले के गोपालगंज में पैदा हुए थे। वह अपने तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उनके पिता बिहार सरकार में सिंचाई विभाग में इंजीनियर थे। बिहार में शुरुआती पढ़ाई करने के बाद राजीव को झारखंड भेज दिया गया। वह हजारीबाग के एक स्कूल में सरकारी हॉस्टल में रहा करते थे। उसके बाद वह आगे की पढ़ाई करने के लिए रांची चले आए।

1996 में 12वीं करने के बाद उन्होंने आईआईटी की कोचिंग जॉइन की, लेकिन परीक्षा पास नहीं कर सके। इसके बाद उऩ्होंने रांची में ही बीकॉम. में दाखिला ले लिया। उसी साल उन्होंने सीए में भी एनरोलमेंट करवा लिया। वह अंकुर रूरल एंड ट्राइबल डेवलपमेंट सोसाइटी नाम से एक एनजीओ भी चलाते हैं जो किसानों और ग्रामीणों की मदद करता है। बिहार में शुरुआती पढ़ाई करने के बाद राजीव को झारखंड भेज दिया गया। वह हजारीबाग के एक स्कूल में सरकारी हॉस्टल में रहा करते थे। उसके बाद वह आगे की पढ़ाई करने के लिए रांची चले आए।

खेती की अधिक जानकारी के लिए आप भी राजीव बिट्टू से 9431701141 इस पर संपर्क कर सकते हैं।

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