एक असंभव सपना देखने की ज़िद... स्टोरी टेलर के सपने की कहानी

एक असंभव सपना देखने की ज़िद... स्टोरी टेलर के सपने की कहानीनीलेश मिसरा

एक वाक्य सुनने की अब आदत सी पड़ गयी है। मुंबई की मायानगरी से लेकर उत्तर प्रदेश के गाँवों के गलियारों तक जब भी मैंने जीवन में कुछ नया किया है, मुझे अलग अलग शब्दों में यही बताया गया है: “दिस इज अ ब्रिलियंट आइडिया, इट विल नेवर वर्क” (ये एक बेहतरीन आइडिया है, ये कभी काम नहीं करेगा)। जब रेडियो पर कहानियां सुनानी शुरू कीं, जब किस्सागोई वाला म्यूजिक बैंड बनाया, या जब गाँव का अख़बार शुरू करने की बात की।

हमें भी यकीन नहीं था कि हम कभी सफल होंगे। गाँव कनेक्शन की शुरुआत पांच साल पहले, दो दिसंबर 2012 को नोएडा के एक चार बेडरूम फ्लैट को बेच कर हुई। इस मकान को इसलिए बेचना पड़ा क्योंकि स्वतंत्र पत्रकारिता को जिंदा रखना आज की सबसे बड़ी लड़ाई है और अगर ये ईमानदारी से करना है तो ये एक असंभव लड़ाई है। कई लोग हमें बेवक़ूफ़ ही तो कहेंगे।

आज के युग में जब मार्केटिंग डिपार्टमेंट पत्रकारिता पर हावी हैं, गाँव कनेक्शन में पेड न्यूज़ की सख्त मनाही है। पेड न्यूज़ यानि बिकी हुई न्यूज़-- यानि खबर की शक्ल में परोसा गया विज्ञापन।
गाँव कनेक्शन का रिपोर्टर विज्ञापन नहीं लाता। पत्रकारिता में भ्रष्टाचार के और भी पड़ाव आये होंगे, लेकिन मेरी नज़र में सबसे बड़ा आघात तब हुआ जब बड़े बड़े हिंदी अख़बारों ने अपने रिपोर्टरों को, ख़ास कर जिलों के रिपोर्टरों को, विज्ञापन लाने के मोटे लक्ष्य देने शुरू कर दिए। गाँव कनेक्शन में किसी भी रिपोर्टर के पास अच्छी ख़बरें करने के अलावा कोई काम नहीं है। हमें पत्रकारिता से प्यार है, हमें ज़मीनी स्तर की रिपोर्टिंग पसंद है और हम किसी भी राजनैतिक दल का न बंद आंखों से समर्थन करते हैं न विरोध।

यह भी पढ़ें : किसानों के लिए एक उम्मीद की तरह है गाँव कनेक्शन : वरुण गांधी


गाँव कनेक्शन की शुरुआत एक ग्रामीण अख़बार के रूप में हुई। आज इसके कई अंग हैं-- डिजिटल, प्रिंट, भारत की सबसे बड़ी मीडिया सर्वे टीम, ऑडियो व विडिओ कंटेंट और जिलों, ब्लॉक और ग्राम पंचायत स्तर पर स्मार्टफोन से लैस हमारे प्रतिनिधियों के साथ ये भारत का सबसे बड़ा ग्रामीण मीडिया प्लेटफार्म बन चुका है। अपनी पत्रकारिता के लिए गाँव कनेक्शन दो बार देश का सबसे बड़ा पत्रकारिता पुरस्कार रामनाथ गोयनका अवार्ड, और महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर पत्रकारिता के लिए यूएनएफपीए समर्थित लाडली अवार्ड से पांच बार सम्मानित हो चुका है।

पीछे मुड़ के देखते हैं तो यकीन नहीं होता कि हम इतने कम समय में अपने बलबूते पर यहां पहुंच पाए उत्तर प्रदेश के बाद गाँव कनेक्शन शीघ्र ही बिहार और झारखण्ड में प्रवेश करने जा रहा है और जल्द ही सभी हिन्दी भाषी राज्यों में वहां की ग्रामीण जनता की आवाज बनेगा और उम्मीद है कि अब हमसे कोई ये नहीं कहेगा: “दिस इज अ ब्रिलियंट आइडिया, इट विल नेवर वर्क।”

ये भी पढ़ें : गाँव की तरक्की बिना देश की तरक्की संभव नहीं : मालिनी अवस्थी

जानिए कैसे आज वो भारत का सबसे बड़ा ग्रामीण मीडिया प्लेटफार्म है

पढ़िए, आज तक के मैनेजिंग एडिटर सुप्रिय प्रसाद ने गांव कनेक्शन के 5 साल पूरे होने पर क्या कहा

First Published: 2017-12-02 18:51:41.0

Share it
Share it
Share it
Top