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गांव कनेक्शन सर्वे : 40 फीसदी ग्रामीणों ने लॉकडाउन को बताया बहुत कठोर, 51 फीसदी बोले - बीमारी बढ़ने पर फिर हो तालाबंदी

कोरोना को नियंत्रित करने के लिए लगाए गए लॉकडाउन का कितना असर हुआ कहना मुश्किल है। तालाबंदी से आर्थिक रूप से देश को काफी नुकसान पहुंचा। 23 राज्यों में कराए गए सर्वे में 10 में से 4 लोगों ने कहा कि लॉकडाउन काफी सख्त था लेकिन एक बड़ी आबादी मुश्किलें झेलने के बावजूद चाहती है, कोरोना बढ़े तो हो लॉकडाउन

Kushal MishraKushal Mishra   26 Aug 2020 10:30 AM GMT

गांव कनेक्शन सर्वे : 40 फीसदी ग्रामीणों ने लॉकडाउन को बताया बहुत कठोर, 51 फीसदी बोले - बीमारी बढ़ने पर फिर हो तालाबंदी

कोरोना आपदा की वजह से देश में लगे पूर्ण लॉकडाउन के बाद ग्रामीण भारत में किये गए गाँव कनेक्शन सर्वे में कई रोचक तथ्य निकल कर सामने आये। दो चरणों में लगे चालीस दिनों के पूर्ण लॉकडाउन के दौरान जो मुश्किलें ग्रामीणों ने झेलीं, उनमें सर्वे में शामिल 40 फीसदी ग्रामीणों ने कहा कि लॉकडाउन बहुत कठोर था, वहीं 51 फीसदी ग्रामीणों ने यह भी कहा कि अगर कोरोना के मामले बढ़ते हैं तो लॉकडाउन दोबारा लगाना चाहिए।

वास्तव में 24 मार्च को देश में अचानक लॉकडाउन लगने की वजह से लाखों-करोड़ों की संख्या में गांवों से शहरों में रोजगार के लिए गए प्रवासी मजदूर वहीँ कैद होकर रह गए। बेरोजगारी और आर्थिक तंगी के हालातों में जब इनके सामने भुखमरी जैसे हालात बने तो यह पैदल ही अपने गांवों की ओर निकलने को मजबूर हुए। जबकि शहरों से इतर गांवों में लॉकडाउन के दौरान सब कुछ बंद होने से ग्रामीणों को अपने परिवार की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी मुश्किलें झेलनी पड़ीं।

गाँव कनेक्शन सर्वे में जो निष्कर्ष सामने आये उसमें हर पांच में से दो ग्रामीणों ने कहा कि लॉकडाउन बहुत कठोर था, जबकि करीब इतने ही ग्रामीणों ने कहा कि मोदी सरकार द्वारा लगाया गया लॉकडाउन कठोर था, लेकिन इतना पर्याप्त था। इसी तरह 11 फीसदी ग्रामीणों ने यह भी कहा कि लॉकडाउन और कठोर होना चाहिए था, जबकि 4 फीसदी ग्रामीणों ने कहा कि लॉकडाउन लगना ही नहीं चाहिए था।


"दो महीने मुंबई में हम लोग फंसे रहे, काम-धंधा सब बंद हो गया, जो पैसे भी थे तो खत्म हो गए, भूखों मरने की नौबत आ गई, इधर-उधर से मांग कर काम चलाया, फिर बड़ी मुश्किल से हम लोग अपने गाँव लौटे तो यहाँ भी कुछ नहीं है, न काम धंधा न है, ऊपर से जो कर्ज लिया, वो भी चुकाना है, और क्या झेलना बाकी है, लॉकडाउन की वजह से अभी भी मुसीबत में हैं, जैसे लॉकडाउन ने हमारा सब कुछ छीन लिया," मुंबई से झारखण्ड लौटे प्रवासी मजदूर मो. इलियास कहते हैं।

झारखंड के गिरिडीह जिले के बगोदर ब्लॉक के बेको पश्चिम गाँव में रहने वाले मो. इलियास मानते हैं कि लॉकडाउन बहुत कठोर था, खासतौर पर प्रवासी मजदूरों के लिए। अचानक लॉकडाउन लगने की वजह से प्रवासी मजदूरों को बहुत दिक्कतें झेलनी पड़ीं।

झारखण्ड से करीब 250 किलोमीटर दूर बिहार के शेखपुरा जिले के भीखमपुरा गाँव के रहने वाले राजेश कहते हैं, "हमारे पास एपीएल कार्ड है, इसमें राशन भी नहीं मिलता, लॉकडाउन लगा दिए, न राशन मिला, न कोई मदद मिली, हम गरीब लोगों को तो खाने-पीने के लाले पड़ गए। लॉकडाउन में बहुत मुश्किलें झेलनी पड़ीं।" राजेश मानते हैं कि लॉकडाउन में उन्हें परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए बहुत मुश्किलें उठानी पड़ीं।

गाँव कनेक्शन सर्वे में यह भी सामने आया कि हरियाणा, जम्मू-कश्मीर-लद्दाख, त्रिपुरा, असम, अरुणाचल, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के आधे से ज्यादा ग्रामीणों ने कहा कि लॉकडाउन बहुत कठोर था। ये वो राज्य रहे जहाँ लॉकडाउन के दौरान शुरुवाती दो महीने में कोरोना वायरस से जुड़े इतने मामले सामने नहीं आये था और अन्य राज्यों की तरह इतने ज्यादा प्रभावित नहीं थे। गाँव कनेक्शन के अलग-अलग राज्यों के आंकड़ों पर गौर करें तो तस्वीर और साफ़ होती नजर आती है।


हरियाणा में सबसे ज्यादा 82 प्रतिशत ग्रामीणों ने कहा कि लॉकडाउन बहुत कठोर था, वहीं यही आंकड़ा केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में 76 फीसदी था। इसी तरह त्रिपुरा, असम, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में यही आंकड़ा क्रमशः 74, 60, 60, 53 और 50 प्रतिशत रहा, यानी कि इन राज्यों में आधे से ज्यादा ग्रामीणों ने कहा कि मोदी सरकार की ओर से लगाया गया लॉकडाउन बहुत कठोर था।

जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर जिले के गाँव हजरतबल के रहने वाले मो. इलियास पेशे से दिहाड़ी मजदूर हैं। किसी तरह रोज कमाकर वो अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं। गाँव कनेक्शन से बातचीत में मो. इलियास कहते हैं, "खाने-पीने की बहुत परेशानी है, न काम है न मजदूरी, चावल-गेहूं भी कुछ नहीं, हम गरीब लोग भूखा है, हम लोगों को किसी की कोई मदद नहीं मिली।"

लॉकडाउन में जिन ग्रामीणों का काम-धंधा बंद हो गया, जिनकी नौकरियां लॉकडाउन की वजह से सबसे अधिक बाधित हुईं, उनके लिए भी लॉकडाउन बहुत कठोर होने की सम्भावना दिखी। जिन ग्रामीणों ने माना कि लॉकडाउन बहुत कठोर था, उनमें 52 प्रतिशत ग्रामीणों का काम लॉकडाउन के दौरान पूरी तरह से ठहराव पर था।


उत्तराखंड के चम्पावत जिले में सयाली गाँव के क्षितिज कुमार 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "अचानक लॉकडाउन से बहुत मार झेलनी पड़ी, मैं दिल्ली में नौकरी करता था, एक तो नौकरी में पैसे भी नहीं मिले, ऊपर से मकान मालिक का किराया, खाने-पीने के लिए भी राशन नहीं था हम लोगों के पास, गाँव आने के भी पैसे नहीं थे, कर्जा लेकर पहुंचे, बहुत प्रताड़ित किया गया, इतने पैसे नहीं थे कि एक गिलास पानी खरीद कर पी सकें, लॉकडाउन में बहुत बुरी मार झेलनी पड़ी है।"

लॉकडाउन की वजह से काम-धंधा बंद हो गया, ग्रामीणों को लम्बे समय तक आर्थिक तंगी से जूझना पड़ा, ऐसे में यह समस्या उनके लिए कहीं ज्यादा थी जो अपने पत्नी और बच्चों के साथ दूसरे शहरों में कमाने के लिए गए थे या अपने परिजनों के साथ लॉकडाउन में शहरों में ही फंसे रह गए और अंत में बेरोजगारी और भुखमरी के हालातों में उन्हें अपने गाँव की ओर परिवार के साथ निकलने के लिए मजबूर होना पड़ा।

गाँव कनेक्शन सर्वे में सामने आया कि लॉकडाउन के दौरान दूसरे शहरों में फंसे और अंत में अपने परिवार के साथ घरों की ओर निकलने को मजबूर हुए ग्रामीणों के लिए लॉकडाउन कहीं ज्यादा कठोर था। परिवार के साथ गांवों की ओर निकलने वाले 49 प्रतिशत ग्रामीणों ने कहा कि लॉकडाउन बहुत कठोर था।


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले की पार्वती भी इन्हीं प्रवासी मजदूरों में से एक थीं, जो अपने परिवार के साथ लॉकडाउन के दौरान लखनऊ में ही फँसी रह गईं। मगर अंत में उन्हें भी अपने पति और एक साल के बच्चे को गोद में लेकर करीब 700 दूर किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ के लिए पैदल ही निकलना पड़ा।

पार्वती 'गाँव कनेक्शन' से बताती हैं, "मार्च और अप्रैल में मुश्किल से मकान का किराया दे पाए, पैसा नहीं बचा था तो घर को निकलना पड़ा। वहां रहते तो भूख से मरते, इससे अच्छा था कि पैदल चलो, तो सड़क पर मरेंगे। तब भगवान भरोसे निकले थे कि बच गये तो ठीक है।"

प्रवासी मजदूरों के साथ दो चरणों में लगे 40 दिन के पूर्ण लॉकडाउन के दौरान कोरोना आपदा का यह समय उन ग्रामीणों के लिए भी बेहद मुश्किलों से गुजरा जिन्हें अपनी पारिवार की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए बहुत कठिनाई उठानी पड़ी।

गाँव कनेक्शन सर्वे में सामने आया कि जिन ग्रामीणों के लिए लॉकडाउन काफी कठोर रहा, उनमें से 43 प्रतिशत ग्रामीणों को अपने परिवार की मूलभूत जरूरतें पूरी करने में बहुत मुश्किलें झेलनी पड़ीं, खास तौर पर राशन सम्बन्धी जरूरतों को लेकर।


छत्तीसगढ़ के बालूदा बाजार जिले के गाँव ग्राम गुर्रा के रहने वाले राकेश कुमार मनहरे 'गाँव कनेक्शन' से बताते हैं, "लॉकडाउन में बहुत असुविधा का सामना करना पड़ा, पैसे से लेकर राशन तक, हर महीने राशन के नाम पर सिर्फ चावल मिला बाकी कोई सुविधा नहीं थी, सब्जी से लेकर दवाई सबके लिए बहुत ज्यादा तकलीफ का सामना करना पड़ा, बहुत मुश्किलें झेलनी पड़ीं।"

छत्तीसगढ़ से 500 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में करिगी गाँव की भगवती पनिका का भी यही हाल था, उन्हें लॉकडाउन के दौरान सरकार से राशन भी नहीं मिल सका।

भगवती 'गाँव कनेक्शन' से बताती हैं, "सरकार हमें कुछ नहीं दिए, राशन के लिए गए तो जाति का मांगते हैं, हम लॉकडाउन में जाति बनवाई फिरी, न मिट्टी का तेल मिले, न गेहूं मिले, न चावल मिले, दो चार खेत बाड़ी हैं वहां न जाओ, कोरोना लगा दिया, कोरोना के चक्कर में तो हम गरीब भूख से मर गए।"

इस बीच गाँव कनेक्शन सर्वे में ग्रामीणों से जब यह पूछा कि कोरोना वायरस के मरीज भविष्य में बढ़ने पर क्या सरकार को लॉकडाउन फिर से लगाना चाहिए, तो 51 % ग्रामीणों ने कहा कि अगर कोरोना के मरीज बढ़ते हैं तो लॉकडाउन लगाना चाहिए, जबकि 41 प्रतिशत ऐसे थे, जिन्होंने कहा कि मामले बढ़ने पर लॉकडाउन नहीं लगाना चाहिए, जबकि 08 प्रतिशत ने कोई जवाब नहीं दिया।


गाँव कनेक्शन सर्वे के दौरान बिहार के अररिया जिले में फुलसारा गाँव के करीब 65 साल के मो. रशीद कहते हैं, "अगर कोरोना के मामले बढ़ते हैं तो निश्चित रूप से लॉकडाउन लगाया जाना चाहिए, कोरोना जैसी बीमारी को दूर करने के लिए अगर और कड़ाई की जरूरत पड़े तो उसे भी लागू करना चाहिए।"

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि कोरोना आपदा के समय में बेरोजगारी, आर्थिक तंगी और भुखमरी के हालातों में देश के लोगों ने वास्तव में असल भारत की तस्वीर देखी। शहरों से इतर ग्रामीण भारत में लोगों की जिंदगी लॉकडाउन से कहीं ज्यादा प्रभावित हुई। एक तरफ घरों में कैद होने से काम धंधा चौपट हो गया, दूसरी ओर ग्रामीणों के सामने भूखों मरने की नौबत सामने आई। मगर इनमें आधे से ज्यादा ग्रामीण इस बात से भी सहमत दिखे कि अगर भविष्य में कोरोना के मामले बढ़ते हैं तो सरकार को दोबारा लॉकडाउन लगाना चाहिए।

सर्वेक्षण की पद्धति

भारत के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन ने लॉकडाउन का ग्रामीण जीवन पर प्रभाव के लिए कराए गए इस राष्ट्रीय सर्वे को दिल्ली स्थित देश की प्रमुख शोध संस्था सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के लोकनीति कार्यक्रम के परामर्श से पूरे भारत में कराया गया।

देश के 20 राज्यों, 3 केंद्रीय शासित राज्यों के 179 जिलों में 30 मई से लेकर 16 जुलाई 2020 के बीच 25,371 लोगों के बीच ये सर्वे किया गया।

ये पूरा सर्वे गांव कनेक्शन के सर्वेयर द्वारा गांव में जाकर फेस टू फेस एप्प के जरिए मोबाइल पर डाटा लिया गया। इस दौरान कोविड गाइडलाइंस (मास्क, उचित दूरी, हैंड सैनेटाइजर) आदि का पूरा ध्यान रखा।

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