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गांव कनेक्शन सर्वेः आधे से अधिक प्रवासी मजदूर फिर से जाएंगे शहर, कहा- गांव में नहीं हो सकेगा गुजारा

कोरोना की बढ़ती महामारी के बीच पेट पालने के लिए बड़े शहरों की तरफ फिर से वापिस लौटने पर मजबूर हो रहे हैं प्रवासी मजदूर। सिर्फ 28 फीसदी ने कहा कि गांव छोड़कर फिर से वापिस शहर नहीं जाना।

Daya SagarDaya Sagar   19 Aug 2020 5:36 AM GMT

पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्यालय और भारत के सबसे बड़े रेलवे स्टेशनों में से एक गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर फिर से चहल-पहल लौटने लगी है। स्टेशन पर अब मुसाफिरों की भारी तादाद फिर से आने लगी है। ये मुसाफिर वापिस शहर की तरफ जाने वाले हैं, जो कि तड़के सुबह से दोपहर के 12 बजे तक स्टेशन पर आ जाते हैं ताकि दिल्ली, मुंबई, सूरत, लुधियाना जैसे महानगरों के लिए अपने ट्रेनों को पकड़ सकें।

दोपहर 12 बजे के बाद इन महानगरों की तरफ जाने वाली लगभग एक दर्जन ट्रेनें गोरखपुर स्टेशन से रोज खुलती हैं, जिस पर गोरखपुर-बस्ती मंडल के सात जिलों (गोरखपुर, संत कबीर नगर, देवरिया, कुशीनगर, सिद्धार्थ नगर, बस्ती और महाराजगंज) के अलावा उत्तर प्रदेश के आजमगढ़-मऊ और बिहार के सिवान, पश्चिमी चंपारण और गोपालगंज जिलों के यात्री सवार होकर महामारी के इन भीषण दिनों में भी 'बाहर कमाने' के लिए जा रहे हैं।

गोरखपुर का जिक्र इसलिए भी जरूरी है कि क्योंकि यह पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के लगभग दर्जन भर जिलों के लोगों का यात्रा का केंद्र है और रोजाना हजारों यात्री यहीं से ट्रेन या बस पकड़ कर सैकड़ों किलोमीटर दूर दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के महानगरों में जाते हैं।

गोरखपुर रेलवे स्टेशन की तरह ही गोरखपुर के पैडलेगंज और नौसड़ बस स्टेशन पर भी ऐसे ही यात्रियों की भीड़ है। जिनको ट्रेन का टिकट नहीं मिला है, वे यहां से चलने वाले प्राइवेट स्लीपर बसों से बड़े शहरों की तरफ जा रहे हैं। कोरोना महामारी का प्रकोप लगाता बढ़ने और देश के अधिकतर हिस्सों में लॉकडाउन के बाद भी सितंबर महीने तक के रेलवे के अधिकांश टिकट बुक हो चुके हैं और लगभग 100 का वेटिंग है, इसलिए इन प्रवासियों को प्राइवेट बसों का सहारा भी लेना पड़ रहा है।

इन यात्रियों के हाथों में वही बैग है, जो वे लॉकडाउन के दौरान शहरों से खाली लेकर वापस आए थे। हालांकि इस बार उनके खाली बैग भरे हुए हैं और साथ में पीले या सफेद रंग का बोरा भी है, जिसमें लगभग एक या दो महीनों के खाने-पीने के सामान और राशन भरे हुए हैं। पूछने पर कोई कहता है, "शहर हमें भले ही खाली हाथ भेज दे, गांव-घर कभी खाली हाथ नहीं भेजते।"

गोरखपुर रेलवे स्टेशन के बाहर अपने ट्रेन के समय होने का इंतजार करते प्रवासी मजदूर, कई लोगों के साथ उनका परिवार भी है

एक तरफ जहां देश में कोरोना से हालात दिन प्रतिदिन बदतर होते जा रहे हैं और संक्रमितों की संख्या 15 लाख के पार चल गई है, वहीं दूसरी तरफ छोटे शहरों और गांवों से महानगरों की तरफ रोजगार के लिए होने वाला पलायन फिर से शुरू हो गया है। जो लोग अभी कुछ महीने पहले ही बहुत मजबूरी और बुरे हालातों में शहरों से वापिस गांवों की तरफ लौटे थे, वहीं लोग फिर से मजबूरी में ही वापिस शहरों की तरफ लौटने लगे हैं।

कोरोना लॉकडाउन से उपजी निराशाजनक स्थिति का जमीनी और देशव्यापी जायजा लेने के लिए देश के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन ने देश भर के 20 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के 179 जिलों में 25,000 से ज्यादा ग्रामीणों के बीच एक सर्वे किया। यह सर्वे 30 मई से 16 जुलाई के बीच चला, जिसमें 25,371 लोगों ने हिस्सा लिया। इन 25,371 में से लगभग 1000 प्रवासी मजदूर थे, जो लॉकडाउन के दौरान महानगरों और बड़े शहरों से वापिस अपने घर-गांव लौटे थे। इस सर्वे में भी अधिकतर प्रवासी मजदूरों ने कहा कि हालात कुछ सुधरने पर उन्हें वापिस महानगरों की तरफ लौटना ही होगा क्योंकि गांवों में रोजगार के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं और जिस तरह वे लॉकडाउन के दौरान शहरों में भूखमरी के कगार पर पहुंच गए थे, अगर वे फिर से पलायन नहीं किए तो वैसे ही हालात गांवों में भी हो सकते हैं।

बिहार के नवादा जिले के लखपत बिगा गांव के मनकी यादव कहते हैं, "गांव आए अब कई दिन हो गए हैं, लेकिन अभी तक कोई काम नहीं मिला है। उधर जहां मैं काम करता था, वहां फैक्ट्री फिर से खुल गई है। इसलिए अब लग रहा है कि गुड़गांव के लिए फिर से वापस निकलना होगा।" मनकी के बातों में घर ना रूक पाने की निराशा होती है।

गांव कनेक्शन के सर्वे में लोगों से सवाल पूछा गया कि 'लॉकडाउन में जब ढील दी जाने लगेगी या कोरोना महामारी का प्रकोप कम होने लगेगा, तो क्या वे फिर से शहरों की तरफ पलायन करेंगे?' इसके जवाब में 33 फीसदी ने तुरंत हां में उत्तर दिया, जबकि 8 फीसदी लोगों ने कहा कि वह शहर तो जाएंगे लेकिन किसी दूसरे शहर जाएंगे। वहीं 15 फीसदी लोग असमंजस में भी दिखें। हालांकि उन्होंने भी माना कि उन्हें मजबूरन ही सही पर वापिस जाना पड़ सकता है। इस तरह से कुल 56 फीसदी लोग ऐसे मिले, जिन्होंने कहा कि उन्हें रोजी-रोटी के चक्कर में फिर से पलायन की चक्की में पिसना होगा।

हालांकि 16 फीसदी लोग ऐसे भी थे जो अभी तय नहीं कर पाए हैं कि वे क्या करें। जबकि 28 फीसदी लोगों ने नहीं में जवाब दिया, इसका अर्थ है कि सिर्फ 28 फीसदी लोग अब फिर से वापिस नहीं जाना चाहते।


गौरतलब है कि लॉकडाउन के दौरान एक करोड़ से अधिक लोग दिल्ली, मुंबई, गुड़गांव, लुधियाना, सूरत और चेन्नई जैसे बड़े शहरों से अपने राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल की तरफ लौट आए थे। भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि लगभग 97 लाख प्रवासी मजदूर लॉकडाउन के दौरान वापस घर गए। राज्यों के श्रम विभाग के सरकारी रिपोर्ट्स के मुताबिक, बिहार में 23.6 लाख, उत्तर प्रदेश में 35 लाख, राजस्थान में 12.9 लाख और मध्य प्रदेश में 10.72 लाख लोग लॉकडाउन के दौरान दूसरे राज्यों से लौटकर आएं।

हालांकि प्रवासी मजदूरों पर शोध करने वाले शोधार्थियों और विशेषज्ञों का कहना है कि यह संख्या और अधिक थी और ऐसे प्रभावित मजदूरों की संख्या 2 करोड़ से 2.2 करोड़ तक रही। विशेषज्ञों ने इसे विभाजन के बाद आजाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा रिवर्स पलायन कहा था। दी इकोनॉमिक सर्वे, 2017 के अनुसार देश भर में प्रवासी मजदूरों की कुल संख्या 6 करोड़ से अधिक है, जो रोजी-रोटी की तलाश में ग्रामीण भारत से शहरों की तरफ जाते हैं।

बिहार के नवादा जिले के लखपत बिगा गांव के मनकी यादव कहते हैं, "गांव आए अब कई दिन हो गए हैं, लेकिन अभी तक कोई काम नहीं मिला है। उधर जहां मैं काम करता था, वहां फैक्ट्री फिर से खुल गई है। इसलिए अब लग रहा है कि गुड़गांव के लिए फिर से वापस निकलना होगा।" मनकी के बातों में घर ना रूक पाने की निराशा होती है।

लखपत बिगा की तरह कुछ ऐसी ही बातें छत्तीसगढ़ की बलोद बाजार की सिमगा देवी भी कहती हैं। वह महाराष्ट्र के पुणे में रहकर एक प्राइवेट फैक्ट्री में मजदूरी का काम करती थीं। वह कहती हैं, "यहां गांव में कोई काम नहीं है, लेकिन पेट पालने के लिए कुछ ना कुछ तो करना ही होगा। अगर सरकार कोई सहायता करती तो शायद हमें कुछ काम मिल जाए, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है। हम परिवार सहित फिर से वापसी की सोच रहे हैं।"

गांव कनेक्शन के इस सर्वे के अनुसार जो प्रवासी मजदूर दूसरे राज्यों से अपने गांव लौटे हैं, फिर से वापिस जाने वालों की संख्या भी उन्हीं की अधिक है। 70 फीसदी ऐसे प्रवासी फिर से दूसरे राज्यों के बड़े शहरों की तरफ जाना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के गंगापुर के चंद्रिका प्रसाद दिल्ली में रहकर इलेक्ट्रिशियन का काम करते थे। लॉकडाउन के दौरान घर वापसी के क्रम में उन्हें अधिकतर दूरी पैदल ही तय करनी पड़ी थी। इसके अलावा उन्हें पुलिस प्रताड़ना का सामना भी करना पड़ा था। तब वे फिर से शहर वापिस ना जाने की कसमें खा रहे थे।

लेकिन घर वापसी के तीन महीने बाद उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि क्या किया जाए क्योंकि उनके गांव में ऐसा कोई काम नहीं है, जो वे वर्षों से दिल्ली में रहकर करते आ रहे थे। वह कहते हैं, "सरकार ने हमारी वापसी के दौरान कहा था कि लोगों को उनके हुनर के मुताबिक काम दिया जाएगा। हम जब शहर से वापस आए थे तो क्वारंटीन सेंटर में हमारे स्किल के बारे में भी पूछा गया था, लेकिन इन तीन महीनों के दौरान हमें कुछ काम नहीं मिला।"

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तराखंड समेत कई राज्य सरकारों ने वादा किया था कि वह वापिस आने वाले प्रवासी मजदूरों का स्किल मैपिंग करेंगे और उन्हें फिर से वापस नहीं जाने दिया जाएगा। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने भी स्किल मैपिंग कर संबंधित रोजगार देने की अपील राज्य सरकारों से की थी। लेकिन मनरेगा के अलावा इन योजनाओं का क्या हुआ, अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया है।


दूसरे राज्यों से वापस आने वाले प्रवासी फिर से जाना चाहते हैं परदेस, देखें ग्राफ

कोरोना के बढ़ते प्रकोप के बीच क्या शहर जाना है सुरक्षित?

कोरोना की बढ़ती महामारी के बीच वापिस शहर जाने के बारे में जब इन प्रवासी मजदूरों से पूछा गया तो सिर्फ 26 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अभी शहर वापिस जाना सुरक्षित नहीं है, वहीं लगभग 70 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वह शहर जाना चाहते हैं क्योंकि कोरोना का जितना खतरा पहले शहरों में था, उतना अब गांवों में भी है और गांवों में कमाई के कोई साधन उपलब्ध नहीं हैं।

गौरतलब है कि समय बीतने के साथ-साथ कोरोना शहरी भारत से ग्रामीण भारत में भी तेजी से फैला है। यूपी-बिहार के प्रत्येक जिलों में हर रोज औसतन 50 कोरोना मरीज मिल रहे हैं। कुछ ऐसा ही हाल झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल का भी है, जहां से सबसे अधिक प्रवासी मजदूर पलायन करते हैं।

पश्चिम बंगाल के बर्दवान जिले के राहुल दत्ता असम के गुवाहाटी में रहकर अपना गुजर-बसर करते थे। वह महीने में 10 हजार रूपये तक कमा लेते थे, लेकिन इस समय उनके हाथ में एक हजार रूपया नहीं है और उन्हें दोस्तों और पड़ोसियों से उधार मांगकर काम चलाना पड़ रहा है।

वह कहते हैं, "अब हमारे जिले में भी कोरोना का उतना ही खतरा है, जितना मैं जहां काम करता था। इसलिए अब वहां जाना ही बेहतर है क्योंकि कोरोना का खतरा तो दोनों जगह है लेकिन कम से कम वहां पेट पालने के लिए रोजी-रोटी तो मिल सकेगी।"

यूपी के संत कबीर नगर के अरविंद साहनी भी कुछ ऐसी ही बात करते हैं। वह हरियाणा के वल्लभगढ़ की एक ऑटो मोबाइल कंपनी में बिल्डिंग मशीन ऑपरेटर का काम करते थे। वापस जाने के सवाल पर वह कहते हैं, "जाना तो पड़ेगा ही, गांव में रहकर क्या ही करेंगे। खेती भी नहीं है कि खेती कर लें। खेती होती तो गांव-घर छोड़कर कभी जाते ही नहीं। अब अपने गांव-जिले में भी कोरोना का खतरा उतना ही है, जितना परदेस में इसलिए अब वहां जाना ही ठीक है।" 6 लोगों के परिवार को चलाने की जिम्मेदारी अरविंद और उनके भाई गोविंद के कंधों पर है। इसलिए फिर से वापिस जाने के सवाल पर अरविंद अपनी मजबूरी जाहिर करते हैं।

मनरेगा में काम मिलने के सवाल पर अरविंद कहते हैं, "कभी कुदाल-फावड़ा चलाया नहीं, आईटीआई करके बस मशीन ही चलाए हैं। इसलिए मनरेगा में काम मिल भी जाएगा तो भी नहीं हो पाएगा। सरकार हमारे लायक कोई और काम दे तो हम जरूर नहीं जाएं परदेस।" पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रवासियों के लिए सामान्यतया 'परदेस कमाने वाले' और 'परदेसी' जैसे शब्दों का ही प्रयोग किया जाता है।


ग्राफ- अधिकतर प्रवासी मजदूरों ने माना कि अब फिर से शहर लौटना सुरक्षित है

गांव कनेक्शन के सर्वे में एक और दिलचस्प आंकड़ा यह निकल कर आया कि लॉकडाउन के दौरान अपना पेट पालने में और शहरों से वापस आने में जिन्हें सबसे अधिक दिक्कत हुई थी, वे ही अब फिर से शहर वापिस जाना चाहते हैं या उनके लिए शहर जाना अब अधिक सुरक्षित है। ऐसे लोगों की संख्या 71 प्रतिशत है, जो वापिस जाने को कहीं ना कहीं सुरक्षित मानते हैं।

गांव कनेक्शन के इस सर्वे के अनुसार, महानगरों में फिर से वापिस जाने को सुरक्षित मानने का राज्यवार आंकड़ा कुछ इस तरह है, जिसमें देश के पूर्वी राज्यों बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल का दबदबा है। उत्तर प्रदेश के बाद इन्हीं राज्यों में सबसे अधिक लोग वापिस आए थे। हरियाणा इस सूची में दूसरे स्थान पर है क्योंकि यहां के लोग भी अपने राज्य में ही काम के लिए गुड़गांव और मानेसर जैसे औद्योगिक शहरों की तरफ पलायन करते हैं।



अर्थशास्त्री डीएम दिवाकर कहते हैं कि वापसी किए प्रवासी मजदूरों में से उनके लिए स्थितियां सबसे खराब है जिनके पास कोई खेत, पूंजी या कोई स्किल सीख कर नहीं आए हैं। "जिनके पास इन तीनों चीजों में से एक भी नहीं है, उनके लिए काफी मुश्किल होने वाली है और उन्हें ना चाहते हुए भी फिर से वापिस शहर पलायन करना पड़ रहा है।"

वह आगे कहते हैं कि यह स्थानीय राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि जो मजदूर शहरों से कुछ स्किल सीखकर आए हैं, उन्हें राज्य संसाधन के रूप में उपयोग करे ताकि मजदूरों के पलायन का सिलसिला कम से कम हो। लेकिन स्किल मैपिंग की बातें अभी तक कागजों में हैं, जमीन पर नहीं दिखाई दी।

वहीं वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार अरविंद सिंह कहते हैं, "सरकार कितना भी दावा कर लें लेकिन यह सच्चाई है कि ग्रामीण भारत के पास रोजगार के संसाधन और अवसर कम है, इसलिए हम देख रहे हैं कि जो मजदूर काफी कठिनाई सह के अपने घर वापस आए थे और कभी शहर ना जाने की बातें कर रहे थे, वे तीन महीने के भीतर ही फिर से शहर जाने लगे हैं।"

"दरअसल स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने के लिए सरकारों को एक विस्तृत रोडमैप तैयार करना होगा और यह कोई एक दिन या एक महीने का काम नहीं है। इसलिए जो मजदूर फिर से बाहर जा रहे हैं, उन्हें झूठे उम्मीद देकर रोके रहना बेमानी है। उन्हें जाने देना चाहिए और सरकार को उनके लिए फिर से ट्रेन या बसों की व्यवस्था करनी चाहिए जैसे उनके आने के लिए ही देर से ही सही लेकिन किया गया था," वह आगे कहते हैं।

पलायन के पीछे की कहानी

कुल 56 फीसदी श्रमिकों ने कहा कि वापस शहर लौटना ही होगा, नहीं है कोई चारा

दूसरे राज्यों से आए 70 फीसदी प्रवासी फिर से वापस लौटना चाहते हैं।

70 फीसदी लोग मानते हैं कि शहर लौटना अधिक सुरक्षित, क्योंकि शहरों में भी कोरोना का उतना ही खतरा जितना अब गांवों में

जिन्हें हुई सबसे अधिक दिक्कत उन्होंने ही कहा- शहर लौटना अब सुरक्षित

5 में से 3 लोगों (60%) ने माना गांव में रोजगार नहीं इसलिए जाते हैं शहर

19 % यानि हर पांचवें व्यक्ति ने कहा पलायन की वजह शहर में अच्छी मजदूरी

सिर्फ 28 % लोगों ने कहा अब कमाने के लिए बड़े शहरों को नहीं जाएंगे

नहीं में जवाब देने वाले 37 % लोगों ने कहा कि वो शहर जाने की बजाय गांव में खेती कर पेट पालेंगे, मनरेगा नहीं है प्राथमिकता

80 % लोगों ने कहा लॉकडाउन में मनेरगा में नहीं मिला काम

56 % प्रवासी जो गांव लौटे 35 वर्ष से कम उम्र की थे


सर्वेक्षण की पद्धति

भारत के सबसे बड़े ग्रामीण मीडिया संस्थान गांव कनेक्शन ने लॉकडाउन का ग्रामीण जीवन पर प्रभाव के लिए कराए गए इस राष्ट्रीय सर्वे को दिल्ली स्थित देश की प्रमुख शोध संस्था सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के लोकनीति कार्यक्रम के परामर्श से पूरे भारत में कराया गया। देश के 20 राज्यों, 3 केंद्रीय शाषित राज्यों के 179 जिलों में 30 मई से लेकर 16 जुलाई 2020 के बीच 25371 लोगों के बीच ये सर्वे किया गया। जिन राज्यों में सर्वे किया गया उनमें राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, असम, अरुणांचल प्रदेश, मनीपुर, त्रिपुरा, ओडिशा, केरला, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और चंडीगढ़ शामिल थे, इसके अलावा जम्मू-कश्मीर, लद्धाख, अंडमान एडं निकोबार द्वीप समूह में भी सर्वे किया गया।

इन सभी राज्यों में घर के मुख्य कमाने वाले का इंटरव्यू किया गया साथ उन लोगों का अलग से सर्वे किया गया जो लॉकाडउन के बाद शहरों से अपने गांवों को लौटे थे। जिनकी संख्या 963 थी। सर्वे का अनुमान 25000 था, जिसमें राज्यों के अनुपात में वहां इंटरव्यू निर्धारित किए गए थे। इसमें से 79.1 फीसदी पुरुष थे और और 20.1 फीसदी महिलाएं। सर्वे में शामिल 53.7 फीसदी लोग 26 से 45 साल के बीच के थे। इनमें से 33.1 फीसदी लोग या तो निरक्षर थे या फिर प्राइमरी से नीचे पढ़े हुए सिर्फ 15 फीसदी लोग स्नातक थे। सर्वे में शामिल 43.00 लोग गरीब, 24.9 फीसदी लोवर क्लास और 25. फीसदी लोग मध्यम आय वर्ग के थे। ये पूरा सर्वे गांव कनेक्शन के सर्वेयर द्वारा गांव में जाकर फेस टू फेस एप के जरिए मोबाइल पर डाटा लिया गया। इस दौरान कोविड गाइडलाइंस (मास्क, उचित दूरी, हैंड सैनेटाइजर) आदि का पूरा ध्यान रखा गया।


गांव कनेक्शन के संस्थापक नीलेश मिश्रा ने इस सर्वे को जारी करते हुए कहा, "कोरोना संकट की इस घड़ी में ग्रामीण भारत, मेनस्ट्रीम राष्ट्रीय मीडिया के एजेंडे का हिस्सा नहीं रहा। यह सर्वे एक सशक्त दस्तावेज है जो बताता है कि ग्रामीण भारत अब तक इस संकट से कैसे निपटा और आगे उसकी क्या योजनाएं है? जैसे- क्या वे शहरों की ओर फिर लौटेंगे? क्या वे अपने खर्च करने के तरीकों में बदलाव करेंगे, ताकि संकट की स्थिति में वे तैयार रहें और फिर से उन्हें आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़े।"

सीएसडीएस, नई दिल्ली के प्रोफेसर संजय कुमार ने कहा, "सर्वे की विविधता, व्यापकता और इसके सैंपल साइज के आधार पर मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि यह अपनी तरह का पहला व्यापक सर्वे है, जो ग्रामीण भारत पर लॉकडाउन से पड़े प्रभाव पर फोकस करता है। लॉकडाउन के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क और अन्य सरकारी नियमों का पालन करते हुए यह सर्वे गांव कनेक्शन के द्वारा आयोजित किया गया, जिसमें उत्तरदाताओं का फेस टू फेस इंटरव्यू करते हुए डाटा इकट्ठा किए गए।"

"पूरे सर्वे में जहां, उत्तरदाता शत प्रतिशत यानी की 25000 हैं, वहां प्रॉबेबिलिटी सैम्पलिंग विधि का प्रयोग हुआ है और 95 प्रतिशत जगहों पर संभावित त्रुटि की संभावना सिर्फ +/- 1 प्रतिशत है। हालांकि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से उनके जनसंख्या के अनुसार एक निश्चित और समान आनुपातिक मात्रा में सैंपल नहीं लिए गए हैं, इसलिए कई लॉजिस्टिक और कोविड संबंधी कुछ मुद्दों में गैर प्रॉबेबिलिटी सैम्पलिंग विधि का प्रयोग हुआ है और वहां पर हम संभावित त्रुटि की गणना करने की स्थिति में नहीं हैं," संजय कुमार आगे कहते हैं।

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