देश-विदेश में मेंथा की बढ़ रही मांग से किसानों की खाली जेब भरने की तैयारी

देश-विदेश में मेंथा की बढ़ रही मांग से किसानों की खाली जेब भरने की तैयारीमेंथा की खेती से किसान कमा सकते हैं मुनाफा।

लखनऊ। “देश विदेश में मेंथा ऑयल की बढ़ती मांग और हालातों को देखते हुए अगर किसान इस साल मेंथा की खेती करते हैं तो उन्हें काफी अच्छे रेट मिल सकते हैं। क्योंकि पिछले पांच वर्षों में मेंथा ऑयल के रेट सबसे ज्यादा रहे हैं और इस वर्ष भी यही उम्मीद है।” सीमैप के निदेशक प्रो. अनिल त्रिपाठी कहते हैं।

मेंथा का इस्तेमाल दवाएं, सौंदर्य उत्पाद, टूथपेस्ट के साथ ही कंफ्केशनरी में बहुतायत होता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा मेंथा उत्पादक और निर्यातक है। इंडस्ट्री के आकंड़ों के मुताबिक पिछले वर्ष पूरी दुनिया में 48000 टन उत्पादन हुआ था, जिसमें से अकेले भारत 38000 टन मेंथा का उत्पादन किया था, जिसमें से 20 हजार टन का निर्यात भी हुआ था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मेंथा किसानों को सिंथेटिंक मेंथा ने काफी नुकसान पहुंचाया था, जिसके चलते रेट 700-800 के बीच बने हुए थे। लेकिन 2017 में हालात तेजी से बदले और मेंथा का तेल 1800 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गए थे।

सीमैप के निदेशक प्रो. अनिल कुमार त्रिपाठी व अन्य।

नकदी फसल के रूप में किसानों को मेंथा का उपहार देने वाले केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान 'सीमैप’ ने इस मौके भुनाने की पूरी तैयारी की है। प्रो. अनिल त्रिपाठी बताते हैं, “ सिंथेटिंक मेंथा ने किसान और इंडस्ट्री को काफी नुकसान पहुंचाया था, अब हालात बेहतर हो रहे हैं, बाजार में प्राकृतिक मेंथा की मांग बढ़ी है, सीमैप की अगैती मिंट तकनीक और किस्मों ने किसानों की लागत कम और उत्पादन बढ़ाया है साथ ही दुनिया की सबसे बड़ी सिंथेटिंक मेथा बनाने वाली जर्मन कंपनी बीएएसएफ में हादसे ने किसानों को बड़ा मौका दिया है।”

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बीएएसएसफ में पिछले वर्ष अक्टूबर में आग लग गई थी, जिससे इसका उत्पादन पूरी तरह प्रभावित हुआ है। डॉ. त्रिपाठी के मुताबिक इस वर्ष जब तक किसानों की फसल तैयार होगी, ये कंपनी शायद ही उत्पादन कर पाए, इसलिए मेँथा के रेट अच्छे रहेंगे।

किसान इस मौके का ज्यादा से ज्याद फायदा उठाएं इसलिए इस बार सीमैप ने किसानों को दी जाने वाली मेंथा की जड़ों की मात्रा दोगुनी कर दी है। 31 जनवरी को लखनऊ के कुकरैल स्थित सीमैप में मेले का आयोजन कर देश के 20 राज्यों से आए करीब 7 हजार किसानों में इन्हें वितरित किया जाएगा। डॉ. त्रिपाठी इस बार के मेले को खास बताते हुए कहते हैं, “2017 में हमने 250-300 क्विटंल जड़े बांटी थी, लेकिन इस बार 700 क्विंटल किसानों को देंगे। (इससें से 500 क्विटल लखनऊ और 200 क्विटंल पंथनगर, उत्तराखंड) पिछले वर्ष मेंथा का रेट औसतन 1800 रुपए प्रति किलो रहा था, ये किसानों के लिए आमदनी दोगुनी करने का मौका है। मेंथा ऑयल मार्केट के मुताबिक आने वाले सीजन में ही रेट अच्छे रहेंगे।’

रेट को लेकर अपनी बात को और पुख्ता तरीके से बातते हुए वो कहते हैं, “ मल्टीकमोडिटी एक्सडेंज (एमसीएक्स) वर्ष 2018 में जून महीने के लिए अभी से 1450 रुपए का रेट दिया है। इसके साथ ही सीमैप किसान मेले में किसान और मेंथा इंड्रस्ट्री को आमने सामने ला रहा है। प्रधानमंत्री जी ने आमदनी दोगुनी करने की बात कही है लेकिन मुझे लगता सीमैप की बताई विधियों से खेती करने पर किसान दोगुना नहीं 4 गुना आमदनी बढ़ा सकते हैं।’

बाजार में प्राकृतिक मेंथा की मांग बढ़ी है, सीमैप की अगैती मिंट तकनीक और किस्मों ने किसानों की लागत कम और उत्पादन बढ़ाया है साथ ही दुनिया की सबसे बड़ी सिंथेटिंक मेथा बनाने वाली जर्मन कंपनी बीएएसएफ में हादसे ने किसानों को बड़ा मौका दिया है।
प्रो. अनिल त्रिपाठी, निदेशक, सीमैप

31 जनवरी को आयोजित मेले में मुख्य अतिथि के रूप में सूक्ष्य, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय में राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) गिरिराज सिंह शामिल हो रहे हैं तो उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही विशिष्ट अतिथि होंगे। इसके साथ ही सीएसआईआर की 14 और आईसीएआर की 3 प्रयोगशालाओं समेत 20 वो सरकारी प्रयोगशालाएं अपनी कृषि और किसान उपयोगी तकनीकों का प्रदर्शन करेंगी साथ ही सगंध आैर आैषधि इंडस्ट्री के लोग भी आएंगे।

मेले के आयोजक डॉ. अलोक कालरा बताते हैं, “सीमैप किसानों को यहां जिरेनियम (सगंध पौधा) का तोहफा देने की तैयारी में है। इसका तेल काफी कीमती होती है। फिलहाल इसकी कीमत 20 से 25 हजार रुपए प्रति किलो है। सीमैप में इस वर्ष प्रयोग के तौर पर 10-15 किसानों के खेतों में इसका परीक्षण करेगा सफल होने पर इसकी व्यवसायिक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। इससे किसानों को आसानी से प्रति हेक्टेयर 2 से ढाई लाख की शुद्ध बचत हो सकेगी।’

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जिरेनियम अभी तक पहाड़ी इलाकों में पैदा किया जाता था क्योंकि बरसात में इसके पौधे सड़ जाते हैं, जिससे नई फसल के लिए नर्सरी नहीं बचती है। डॉ. त्रिपाठी के मुताबिक सीमैप में मेंथा की किसान उपयोगी की किस्में विकसित करने वाले वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सौदान सिंह ने जिरेनियम को मैदानी इलाकों में फसल लेने के लिए सरल तकनीकी विकसित की है, जिससे प्रति प्लांट की लागत 30-35 रुपए से घटकर महज 1-2 रुपए रह जाएगी।’

सीमैप के निदेशक जिरेनियम को भविष्य में आमदनी देने वाली फसल बताते है, “ मेंथा ने लाखों किसानों की आमदनी दी है, लेकिन इसमें पानी खपत ज्यादा है, दूसरा सिंथेटिक मेंथा फिर बाजार पर कब्जा कर सकता है, ऐसे में किसानों को विकल्प के रुप में जिरेनियम देने की कोशिश है। इसका औसतन उत्पादन प्रति हेक्टेयर 15-20 लीटर हो सकता है।

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राष्ट्रीय एरोमा मिशन के तहत सरकार किसानों को सगंध और औषधीय पौधों की खेती की प्रेरित कर रही है, जिसमें सीमैप का अहम रोल है। मेंथा, अश्वगंधा, कालमेघ, एलोवेरा, तुलसी, सतावर, खस समेत कई दर्जन फसलों को किसानों के बीच प्रमोट किया जा रहा है। 31 जनवरी को होने वाले मेले में किसानों को इस संबंध में न सिर्फ नई तकनीक परिचित कराया जाएगा बल्कि सीमैप के फील्ड एरिया में उन्हें प्रशिक्षण दिया जाएगा।

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मेले में बिहार के भी हजारों किसान आ रहे हैं। एरोमा मिशन के तहत बिहार में मेंथा और खस समेत कई फसलों की खेतों के लिए किसानों को प्रेरित किया जा रहा है। मेले के सचिव और संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक संजन कुमार बताते हैं, पिछले वर्ष बिहार में 20 हजार हेक्टेयर में मेंथा की खेती हुई थी, इस बार उसमें 20-30 फीसदी बढ़ोतरी की संभावना है। इसके साथी कोसी समेत बाढ़ प्रभावित इलाकों में खस की खेती को बढ़ाया जा रहा है, क्योंकि ये बाढ़ वाली जमीन के लिए काफी मुफीद है और इससे किसानों की आमदनी तेजी से बढ़ेगी।

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