ग्रामीण भारत की धड़कन बनता गाँव कनेक्शन : अरविंद कुमार सिंह

ग्रामीण भारत की धड़कन बनता गाँव कनेक्शन : अरविंद कुमार सिंहअरविंद कुमार सिंह पिछले 30 वर्षों से खेती और ग्रामीण मुद्दों पर लिखते रहे हैं।

मुझे गाँव देहात की पत्रकारिता करते हुए करीब तीन दशक हो चले हैं। इस दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब में एक से एक बड़े किसान आंदोलनों को देखा और किसानों की आत्महत्याओं से लेकर गांवों की बदलती तस्वीर को भी। संचार और सूचना क्रांति का भी एक नया दौर भी इसी बीच में आया और टीवी चैनलों की बाढ़ भी। लेकिन अखबार हों या टीवी चैनल, भारत का गंवई समाज कभी इनकी मुख्यधारा का विषय नहीं रहा। इसी नाते ग्रामीण भारत का आधा अधूरा या प्रतीकात्मक चेहरा ही इनके माध्यम से हम देख पाते हैं।

मुझे यह देख कर बेहद खुशी हो रही है कि पांच साल के भीतर गाँव कनेक्शन ने ग्रामीण भारत के लिए एक शक्तिशाली मंच तैयार कर लिया है। तमाम दुर्गम इलाकों तक इसने अपनी पहुंच बनायी है और साख भी। ग्रामीण भारत की सफलता की कहानियों से लेकर किसानों की दिक्कतों, उनके ज्वलंत मसलों और साहित्य तक को अपने विस्तारित कैनवास पर उतारने का प्रयास करना और गुणवत्ता को बनाए रखना वाकई छोटा काम नहीं है।

ये भी पढ़ें- पढ़िए रामनाथ गोयनका अवार्ड से सम्मानित स्टोरी : तीन लड़कियां

किसी संस्था को खड़ा करना आसान काम नहीं है। और उसकी बाल्यावस्था यानि आरंभिक पांच साल सबसे कठिन और चुनौतियों भरे होते हैं। उसमें भी खेती किसान और ग्रामीण भारत को केंद्र में रख कर कुछ करना तो और भी कठिन काम है क्योंकि आज की बाजार की शब्दावली में यह घर फूंक तमाशा देखने जैसा है। फिर भी नीलेश मिश्रा और उनकी एक छोटी सी टीम ने जो सपना देखा

खेती किसान और ग्रामीण भारत को केंद्र में रख कर कुछ करना तो और भी कठिन काम है क्योंकि आज की बाजार की शब्दावली में यह घर फूंक तमाशा देखने जैसा है। फिर भी नीलेश मिश्रा और उनकी एक छोटी सी टीम ने जो सपना देखा, वह पांच साल में ऐसी बुलंदी पर पहुंच जाएगा शायद इसकी उन्होंने परिकल्पना नहीं की होगी।

वह पांच साल में ऐसी बुलंदी पर पहुंच जाएगा शायद इसकी उन्होंने परिकल्पना नहीं की होगी। बुलंद इमारत खड़ी हो जाने के बाद उसके बनने के क्रम की आरंभिक कठिनाइयों के बारे में या नींव के पत्थरों के बारे में शायद ही कोई जानने की दिलचस्पी रखता हो लेकिन यह जानना भी जरूरी है। गांव कनेक्शन को खड़ा करने के दौरान नीलेशजी ने बहुत कुछ दांव पर लगा दिया और बड़ा खतरा मोल लिया। लेकिन उनका श्रम सार्थक रहा। आज गांव कनेक्शन और उसकी पूरी टीम को इसकी उपलब्धियों पर नाज हो सकता है। बिना बड़ी पूंजी के या पीछे से किसी बड़े औद्योगिक घराने की मदद के इतना कुछ खड़ा करना खुद में एक बड़ी कहानी है।

ये भी पढ़ें- समय रहते ध्यान न दिया तो गायब हो जाएंगी बुंदेलखंड में नदियां

पिछले पांच सालों में गांव कनेक्शन भारत का सबसे ताकतवर ग्रामीण मीडिया मंच बन गया है। गांव के सुख-दुख को उठाने के साथ सफलता का तमाम कहानियां इसके माध्यम से उजागर हुई हैं। तमाम प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित होने के साथ इसने एक लंबी लकीर भी खींची है। सूचना और संचार क्रांति के साथ अवतरित हुए गांव कनेक्शन का दायरा इतना विस्तारित हो गया है कि इसे किसी सीमित दायरे तक नहीं देखा जाना चाहिए। इससे भी बड़ी बात यह है कि तमाम ग्रामीण पत्रकारों को जोड़ने के साथ कृषि और ग्रामीण पत्रकारों की एक बेहतर प्रशिक्षित टीम भी इसने खड़ी की है। साथ ही खेती बाड़ी के विषय में लिखने पढ़ने वालों को भी अपने इस प्लेटफार्म से जोड़ा भी है। यह सारा प्रयास भविष्य़ की कृषि और ग्रामीण भारत की पत्रकारिता की धारा को एक नयी दिशा देगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।

गांव कनेक्शन ने खेती-बाड़ी के विषय में लिखने पढ़ने वालों को भी अपने इस प्लेटफार्म से जोड़ा भी है। यह सारा प्रयास भविष्य़ की कृषि और ग्रामीण भारत की पत्रकारिता की धारा को एक नयी दिशा देगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।

यह ध्यान रखने की बात है कि आज से 100 साल से भी पहले और 1914 में भारत में पहला कृषि पत्र बंशीधर तिवारी के संपादन में कृषि सुधार और कृषि 1918 में आगरा से प्रकाशित हुआ। इसके बाद कई भाषाओं में पत्र छपने लगे। लेकिन उनका जीवन बहुत सीमित रहा। 1946 में खेती और 1950 में कुरुक्षेत्र का प्रकाशन आरंभ हुआ। 1950 से 1960 के दौरान सेवाग्राम, सहकारी,पशुपालन, किसानी समाचार और कृषक समाचार आदि पत्रों ने जन्म लिया। इसी तरह भारत के पहले कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर से लेकर कई दूसरे कृषि विश्वविद्यालयों ने खेती-बाड़ी के कई प्रकाशन निकाले। 1969 में भारतीय कृषि पत्रकार संघ की स्थापना भी की गयी। लेकिन इन सबके बाद भी ग्रामीण या कृषि संबंधी पत्रकारिता कभी मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पायी।

ये भी पढ़ें- आप अगर संकल्प कर लें तो पत्रकारिता में एक नई तरह की पत्रकारिता कर सकते हैं : राजदीप सरदेसाई

खेती-बाड़ी के मसले में रेडियो और दूरदर्शन की भूमिका को हम नजरंदाज नहीं कर सकते हैं। कृषि दर्शन 26 जनवरी 1966 से चल रहा है, जिसका मकसद था किसानों तक खेती बाड़ी से जुड़ी सारी जरूरी सूचनाओं को पहुंचाना। हरित क्रांति ने इसमें अहम भूमिका निभायी। बाद में इसका विस्तार होता रहा और एक नया चैनल किसान टीवी भी आरंभ हो गया। निजी चैनलों का भी काफी विकास हुआ लेकिन गांव उनके एजेंडे में नही। रसोई से लेकर मोबाइल और नयी गाड़ियों पर चर्चा होती है लेकिन गांवों पर नहीं।

खेती-किसानी के मुद्दे भारत ही नहीं दुनिया भर की मीडिया की दिलचस्पी से बाहर का विषय बनते जा रहे हैं। अलजजीरा की एक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर के मीडिया कवरेज में खेती का दखल बमुश्किल एक फीसदी भी नहीं है क्योंकि किसान, गांव और खेती मीडिया के लिए डाउन मार्केट विषय हैं। इन पर किया जाने वाला खर्च बेकार है। किसान आंदोलन करें तो करते रहें, वाजिब दाम के लिए जंग करें तो करते रहें, दिल्ली में उनको मीडिया तभी जगह देगा, अगर दो चार लाशें गिर जाएं। आज खेती की लागत में वृद्धि, भंडारण से लेकर बीज और बाजार तक हरेक क्षेत्रों में किसानो के साथ संकट है। अगर मुख्यधारा का मीडिया इनकी तरफ ध्यान देता तो शायद गांव की दिक्कतें इस कदर नहीं बढ़तीं। हालांकि कई क्षेत्रीय अखबार किसानों के मसले उठा रहे हैं लेकिन उनकी पहुंच नीति निर्माताओं तक नहीं है।

ये भी पढ़ें- गांव कनेक्शन : ईमानदारी की पत्रकारिता के पांच साल

आज आलम यह है कि हमारे साहित्य से भी गांव ओझल होते जा रहे हैं और फिल्मों से भी। ग्रामीण इलाकों के पत्रकारों की दशा भी ठीक नहीं है और उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। अखबार हों या चैनल उनकी खबरों के साथ न्याय नहीं करते औऱ मानदेय के नाम पर पत्रम पुष्पम देते हैं। आज हकीकत यह है कि मीडिया महानगरीय होता जा रहा है और गांव देहात उसकी परिधि से दूर होते जा रहे हैं। शायद इसी नाते नेशनल सैंपल सर्वे आर्गनाइजेशन द्वारा किए गए किसानों की स्थिति आकलन संबंधी सर्वेक्षण में यह बात उजागर हुई कि 71 फीसदी किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य की अवधारणा को भी नहीं जानते या समझते हैं।

‘उपराष्ट्रपति का खेती पर भाषण भी मीडिया से गायब था’

आज तक किसानों की बदहाली पर मीडिया खामोश है। संसद और विधान सभाओं में यह मुद्दा उठता भी है तो भी मीडिया से बाहर रहता है। अगस्त में उप राष्ट्रपति एम.वेंकैया नायडू ने सभापति राज्य सभा के रूप में अपने पहले भाषण में एक अहम मुद्दा उठाया था। उनका कहना था कि कृषि संकट पर हुई चर्चा में उन्होंने बहुत तैयारी के साथ अपनी बातें रखीं लेकिन पाया कि मीडिया से वह गायब है। यह आम बात है।

मसला उठता भी है तो मीडिया किसानों की समस्याओं के प्रति आंखें फेर लेता है। उनके बड़े से बड़े आंदोलनों को भी राष्ट्रीय स्तर पर नजरंदाज किया जाता है। हाल में किसान मुक्ति संसद दिल्ली में हुई जिसमें पहली बार महिला किसानों का मसला प्रमुखता से उठा। इतिहास में पहली बार 187 किसान संगठन एक झंडे तले आए लेकिन दिल्ली की मुख्यधारा की मीडिया ने इस खबर को नजरअंदाज तो नहीं किया लेकिन इससे न्याय नहीं किया। गांव कनेक्शन की टीम ने जरूर उनकी बातों को सलीके से प्रस्तुत करने का गंभीर प्रयास किया।

इन सारी कमजोरियों को कोई संगठन रातों रात दूर कर लेगा ऐसा सोचना भी उसके प्रति अन्याय करना है। लेकिन अब किसानों और ग्रामीण भारत को गांव कनेक्शन के नाम से एक ताकतवर मंच मिल गया है। ऐसे खांटी और समर्पित पत्रकारों की टीम तैयार हो रही है जो ग्रामीण भारत की असली तस्वीर को दुनिया तक पहुंचाएगी और जो रिक्तिता रही है, उसे दूर करने में मदद करेगी, ऐसा विश्वास करता हूं। अब जबकि पांच साल में एक हष्ट पुष्ट बालक के रूप में गांव कनेक्शन अपने पांवों पर खड़ा हो गया है तो आगे यह तेज रफ्तार से चलेगा ही।

कृषि पत्रकारिता का सबसे बड़ा पुरस्कार पाने वाले अरविंद कुमार सिंह का परिचय

पत्रकारिता में पिछले 3 दशकों से कार्यरत अरविंद कुमार सिंह देश में खेती किसानी और संसदीय मामलों के सबसे जानकार पत्रकारों में से एक हैं। वर्तमान में राज्यसभा टीवी में कार्यरत अरविंद सिंह ने अपने पत्रकारिता की शुरुआत 1983 में जनसत्ता के साथ की। फिर 12 साल तक अमर उजाला से जुड़े रहे। हरिभूमि में संपादक के तौर पर उन्होंने खेती-किसानी और ग्रामीण मुद्दों पर प्रमुखता से प्रकाशित किया।

भारतीय रेल और डाक सेवा में गहरी रुचि रखने वाले अरविंद कुमार सिंह रेल मंत्रालय में सलाहकार भी रहे। 2011 से आप राज्यसभा टीवी के साथ हैं। अरविंद कुमार सिंह को भारत का सबसे बड़ा कृषि पत्रकारिता पुरस्कार चौधरी चरण सिंह कृषि पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है तो ग्रामीण मुद्दों को आवाज़ देने के लिए अपने स्वर्ण जयंती वर्ष में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने ग्रामीण पत्रकारिता पुरस्कार से नवाजा। इसके साथ ही दिल्ली साहित्यकार सम्मान भी उन्हें दिया जा चुका है।

देखिए तस्वीरें..

पत्रकार के साथ आप लेखक भी हैं। भारतीय डाक (सदियों का सफरनामा) पुस्तक पांच भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी है तो डाक टिकटों पर भी एक किताब लिखी है। रेलवे पर लिखी किताब को काफी सराहना मिली थी तो अयोध्या कांड पर लिखी किताब ‘अयोध्या विवाद (एक पत्रकार की डायरी)’ कई अपने में कई कहानियां समेटे है। भारत में जल परिवहन पर आपकी जल्द एक किताब प्रकाशित होने वाली है।

खोजी पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के लेखन को सीबीसीआई हिंदी ने अपने पाठयक्रम में शामिल किया है। आवठीं बाकायदा उनकी किताब पर एक पाठ है। वर्ष 1965 को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में जन्में अरविंद कुमार सिंह वर्तमान में खुद किसान और ग्रामीण मुद्दों की मुखर आवाज हैं। आपके लेखों को गांव कनेक्शऩ में खेत-खलिहान नाम से प्रकाशित होते हैं, लेख यहां पढ़िए।

ये भी पढ़ें- खेत-खलिहान : आखिर गुस्से में क्यों हैं गन्ना किसान


खेत खलिहान में मुद्दा : आखिर कब होगा कृषि शिक्षा का कायाकल्प ?

Share it
Top