खेत खलिहान में मुद्दा : आखिर कब होगा कृषि शिक्षा का कायाकल्प ?

खेत खलिहान में मुद्दा : आखिर कब होगा कृषि शिक्षा का कायाकल्प ?शहरी पृष्ठभूमि के छात्र पौधों के बारे में भी अनभिज्ञ हैं।

आज राष्ट्रीय कृषि शिक्षा दिवस है। खेती किसानी को बढ़ावा देने में कृषि शिक्षा का बड़ा योगदान है #RashtriyaKrishiShikshaDiwas #agriculture

हाल में भारतीय कृषि अनुसंधान परिसर की संस्था राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्र में हिंदी दिवस समारोह में कृषि वैज्ञानिकों के बीच अतिथि के रूप में जाना हुआ। वहां जाने माने कृषि वैज्ञानिक प्रो. एन.के. सिंह ने बातचीत में यह जानकारी दी कि उच्च कृषि शिक्षा संस्थाओं में शहरी पृष्ठभूमि के कई ऐसे छात्र आ रहे हैं जो फसलों और पौधों के बारे में भी अनभिज्ञ हैं। राजनेताओं के बारे में तो ऐसे तमाम किस्से कहानियां हमें सुनने को मिलती रही हैं। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में ऐसा होना हमारी शिक्षा पद्धति में खेती की हैसियत को बताता ही है, हमारी जड़ों के खोखला होने का भी संकेतक है।

यह सही है कि खेती बाड़ी की हैसियत आज पहले सी नहीं है और किसानों की एक अलग तस्वीर बनाने की कोशिश हो रही है। फिर भी इस तथ्य को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि खेती भारत की रीढ़ है। सवा सौ करोड़ से अधिक की आबादी वाले विशाल भारत में हरित क्रांति और कृषि अनुसंधान तंत्र के फैलाव के बाद भी परंपरागत तरीके से खेती करने वालों की बड़ी संख्या है। कृषि शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में वैसे तो काफी प्रगति हुई है लेकिन किसानों को इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया है।

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हाल में गांधीजी की प्रयोगभूमि चंपारण के करीब सभी हिस्सों का दौरा करने के दौरान खेती बाड़ी की त्रासद तस्वीर भी दिखी। केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह इसी इलाके से सांसद हैं और उनके प्रयासों से कृषि शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में काफी काम हुआ है। यह इलाका गौरवशाली राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के दायरे में आता है। मैने यहां के प्रगतिशील किसान विजय पांडेय और दूसरे किसानों से जानने की कोशिश की कि कृषि शिक्षा और अनुंसधान का उनको कितना फायदा मिला, तो उनकी राय चौंकाने वाली थी। उनकी राय थी कि कृषि अनुसंधान विमान की गति से चलता हैं, जबकि प्रसार तंत्र बैलगाडी की रफ्तार से। यानि खोजें जमीन तक पहुंचने की गति बहुत धीमी है।

हरित क्रांति और तमाम बदलावों के पीछे हमारे कृषि अनुसंधान तंत्र और कृषि विश्वविद्यालयों का अहम योगदान रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 100 से अधिक संस्थानों ने भी सराहनीय भूमिका निभायी है जो 73 कृषि विश्वविद्यालयों और 368 कालेजों के साथ राज्यों में कृषि विस्तार में भी मदद देता है। हमारे पास तीन केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय और बाकी राज्यों के अधीन के कृषि विश्वविद्यालय हैं। किसानों और इन संस्थाओं के सामूहिक प्रयासों का नतीजा है कि 1950-51 से हमारा अनाज उत्पादन चार गुणा, बागवानी छह गुणा, मछली उत्पादन नौ गुणा और दूध उत्पादन में छह गुना बढ़ा है।

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भारत सरकार ने कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग की स्थापना दिसम्बर, 1973 में की थी। यही देश में कृषि शिक्षा और अनुसंधान का आधार तय करता है। हमारे कृषि विश्वविद्यालयों से सालाना करीब 50,000 से अधिक छात्र निकलते हैं। कृषि और कृषि शिक्षा राज्यों का विषय है। लेकिन कृषि शिक्षा में बहुत सी खामियां हैं और इसी नाते डॉक्टरों की तरह कृषि वैज्ञानिकों की गांवों में जाने में रुचि नहीं होती है। चंद नामों को छोड़ तो आम तौर पर कृषि विश्वविद्यालय भी व्यापक सफलता वाले गांवों का मॉडल तैयार नहीं कर पाये हैं।

हालांकि भारत सरकार ने पिछले तीन सालों में कृषि शिक्षा के बजट में 47 फीसदी से अधिक बढ़ोत्तरी की है। हर साल तीन दिसंबर को कृषि शिक्षा दिवस के रूप में मनाने का फैसला भी हुआ है। विश्व बैंक के सहयोग से एक हजार करोड़ रुपए के साथ राष्ट्रीय कृषि शिक्षा परियोजना शुरू हो रही है। छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिए स्कालरशिप की राशि में भी काफी बढ़ोत्तरी की है।

सरकार ने कृषि शिक्षा में गुणवत्ता सुनिश्चितता के लिए प्रत्यायन बोर्ड स्थापित किया है। साथ ही स्नातक स्तर पर कृषि विश्वविद्यालयों में संशोधित पाठ्यक्रम की भी मंजूरी दी गयी है और कौशल विकास के तहत कुछ अहम कदम उठे हैं। कृषि शिक्षा में छात्राओं को बढ़ावा देने के लिए भी कुछ पहल की गयी है। कृषि विज्ञान की स्नातक स्तर की सभी डिग्रियों को व्यावसायिक डिग्री घोषित किया गया है। इन प्रयासों से छात्रों का नामांकन तेजी से बढ़ा है और शहरी छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

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आज खेती में भले ही युवा जाने से कतरा रहा हो लेकिन हमारे कृषि स्नातकों की मांग केंद्र और राज्य सरकारों के अनुसंधान-विकास संगठनों, वाणिज्यिक बैंकों के साथ बीमा क्षेत्र, एनजीओ, खाद और रसायन कंपनियों, सहकारिता क्षेत्र की कंपनियों और कृषि उपकरण बनाने वाली औद्योगिक इकाइयों के साथ बड़े दायरे में फैली निजी और बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों में बढ़ रही है। वानिकी और फलोत्पादन क्षेत्र में भी नए मौके पैदा हुए हैं। इस रोजगार का फायदा उठाने में शहरी औऱ देहाती इलाकों के छात्रों में होड़ मची है।

लेकिन जमीनी हकीकत देंखें तो चिंता पैदा होती है। भारत में 13.78 करोड़ कृषि भूमि धारकों में से लगभग 11.71 करोड़ छोटे और मझोले किसान हैं। आबादी बढ़ने के साथ ही कृषि जोतें छोटी और अनुत्पादक होती जा रही हैं और छोटे किसानों की टिकाऊ आजीविका पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है। इन किसानों की हैसियत लायक ऐसी कम किस्में विकसित हो पायी हैं जो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को झेल सकने की क्षमता रखती हैं।

वहीं हमारे तमाम किसानों ने अनुभवों के आधार पर बहुतों को शिक्षित करने के साथ बिना प्रयोगशाला और किताबों के कृषि क्षेत्र को उन्नत बनाया है। अंग्रेजी राज में जब गांवों का स्वरूप बदला और अकालों का लंबा दौर चला तब कहीं जाकर आधुनिक कृषि शिक्षा की नींव पड़ी और 1907 में कानपुर, पुणे, सेबोर, नागपुर, लायलपुर और कोयंबटूर में कृषि महाविद्य़ालय खोले गए। उसके पहले पूसा में 1905 में इंपीरियल एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट खुल गया था, जिसे आज भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के नाम से जाना जाता है।

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लेकिन आजादी के बाद पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय देश के लिए एक अनूठा माडल बना। 1949 में उच्च शिक्षा पर बनी डॉ. एस.राधाकृष्णन समिति ने ग्रामीण विश्वविद्यालय खोलने की वकालत की थी। 1960 में 16 हजार एकड़ के विशाल भूक्षेत्र में अमेरिका के लैंड ग्रांट पैटर्न के तहत पंतनगर में उत्तर प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय खुला। इसे पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देश के कृषक पुत्र-पुत्रियों को समर्पित किया।

1964-66 के दौरान भारत सरकार ने दूसरे शिक्षा आयोग की सिफारिशों के तहत हर राज्य में कमसे कम एक कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिश की। पंतनगर में बीएससी कृषि पाठ्यक्रम में छात्रों को आवंटित खेती की जमीन पर खुद खेती करना होता है। आठ सदस्यों के एक समूह को एक हेक्टेयर जमीन मिलती है और आदान सरकार देती है, जबकि जुताई-बुवाई से लेकर कटाई तक का सारा काम छात्र-छात्राएं करते हैं। एक दौर में अधिकतर काम बैलों से होता था लेकिन बाद में ट्रैक्टर और दूसरे कृषि उपकरण आने से काम आसान हो गया।

अगर दुनिया के अन्य देशों को देखें तो पता चलता है कि अधिकतर जगहों पर समर्पित कृषि शिक्षा का तंत्र नहीं है। ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में विज्ञान, कला, चिकित्सा, इंजीनियरिंग के साथ विश्वविद्यालयों में कृषि संकाय हैं। हमारे यहां अलग से कृषि विश्वविद्यालय तो हैं लेकिन अधिकतर राज्यों के पास कमजोर ढांचा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अगर इनकी मदद न करे तो दयनीय स्थिति हो जाये। परिषद के पास लंबा चौड़ा तंत्र है लेकिन अनुसंधान और विकास मद में भारत सरकार द्वारा आवंटित कुल रकम का 14 फीसदी हिस्सा ही कृषि अनुसंधान औऱ शिक्षा के हिस्से में आता है। वहीं परिषद के बजट का आधा हिस्सा कृषि विश्वविद्यालयों पर व्यय हो जाता है।

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लेकिन अरसे तक परंपरागत खेती हमारे पाठ्यक्रमों का हिस्सा नहीं रही। अब जरूर इस दिशा में कुछ काम हो रहा है और ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था पर भी कुछ नयी पहल हुई है। स्नातक स्तर के 11 विषयों में कई बदलाव हो रहे हैं। अब पहले साल के पाठ्यक्रमों में परंपरागत कृषि जबकि दूसरे साल में भारतीय प्रौद्योगिकी पर जोर दिया जा रहा है। तीसरे साल में प्रतिभा विकास और चौथे साल में जमीनी अनुभवों पर। किसानों के साथ रहते हुए छात्र उनको तमाम मसलों का हल बताते हुए खुद सीखेंगे। ऐसा पाठ्यक्रम तैयार किया गया है, जिसमें करीब 62 फीसदी से 67 फीसदी तक प्रैक्टिकल है। बेशक यह एक अच्छी पहल है।

लेकिन भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पंतनगर और कुछ गिने चुने संस्थाओं को छोड़ दें तो बाकियों का प्रदर्शन निराशाजनक है। कई संस्थान राजनीति, भाई भतीजावाद और बहुत सी कमजोरियों के शिकार हो चुके हैं। इन पहलुओं पर ध्यान देने के साथ खास तौर पर ग्रामीण विद्यालयों में कृषि शिक्षा को अनिवार्य विषय बनाने की जरूरत है। इससे हमारी नींव मजबूत होगी और उच्च कृषि शिक्षा का आधार भी। हाल के सालों में कृषि शिक्षा में बहुराष्ट्रीय कंपनियों में रोजगार की संभावनाओं को देखते हुए बड़ी संख्या में शहरी छात्र आ रहे रहें हैं और ग्रामीण छात्रों का मोह भंग हो रहा है।

कृषि शिक्षा और अनुसंधान की भाषा नीति पर भी नए सिरे से विचार की जरूरत है क्योंकि इसमें अभी भी अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। इसी तरह प्रयोगशाला से खेतों की दूरियों को घटाने की भी जरूरत है। आज देश भर में 668 कृषि विज्ञान केंद्र खुले हैं और उन पर भारत सरकार सालाना करीब 878 करोड़ रुपए व्यय कर रही है, लेकिन राज्यों का कृषि विस्तार तंत्र कमजोर होने से जमीनी स्तर पर कृषि खोजों का वैसा फायदा नहीं मिल रहा है जो मिलना चाहिए।

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यह ध्यान रखने की बात है कि जब हमारे पास कोई कृषि विश्वविद्यालय नहीं था तो 1960 के पहले भारत और चीन का कृषि उत्पादन करीब बराबर था, लेकिन बाद में भारत पीछे होता चला गया। आज चीन के मुकाबले भारत में प्रमुख फसलों की उपज लगभग आधी है। मक्का, और दालों की पैदावार में भारत पाकिस्तान बंगलादेश और म्यांमार से भी पीछे है। फिर भी हम अनाज उत्पादन में नए नए कीर्तिमान बना रहे हैं।

भारत आज दूध उत्पादन में नंबर एक पर है जबकि फल और सब्जी में दूसरे और अनाज में तीसरे नंबर पर है। पूंजी का केंद्र महानगर बन गए हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। इन सारे पक्षों को ध्यान में रख कर हमें जमीनी स्तर से कृषि शिक्षा को मजबूत बनाने की जरूरत है।

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