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महिला किसान दिवस विशेष : महिलाओं को मिले बराबरी का हक तो बदल सकती है खेती-किसानी की सूरत

लखनऊ। महिलाओं को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का रीढ़ कहा जाता है। विकासशील देशों में इनकी भूमिका और महत्वपूर्ण है, बावजूद इसके महिलाओं को ज्यादातर मजदूर ही समझा जाता है। किसी घर में जमीन की हिस्सेदारी में होती भी हो तो वो जमीन के बहुत छोटे हिस्से पर। ज्यादातर महिलाओं को न तो खेती के लिए बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है औ न ही बेहतर फसल होने पर उन्हें शाबासी मिलती है।

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जानकारों का मानना है कि कृषि कार्यों में महिलाओं की बढ़ती संख्या से उत्पादन में बढ़ोतरी हो सकती है, भूख और कुपोषण को भी रोका जा सकता है। इसके अलावा ग्रामीण अजीविका में सुधार होगा, इसका फायदा पुरुष और महिलाओं, दोनों को होगा। संयुक्त राष्ट्र के भोजन और कृषि संगठन के सर्वे में महिलाएं कृषि मामले में पुरुषों से हर क्षेत्र में आगे हैं, बस अधिकारों और सुविधाओं को छोड़कर।

कृषि कार्यों में क्यों जरूरी हैं महिलाएं

आर्थिक विकास में महिलाओं का योगदान बराबरी का

विकासशील देशों में औसतन कृषि श्रमिक बल में 43% महिलाएं शामिल हैं जो विश्व में अनुमानित 60 करोड़ गरीबों में से हैं, यानि दो-तिहाई हिस्सेदारी है, ये आंकड़ें चिंतित करने वाले हैं। वहीं आबादी के अनुसार देश के आर्थिक विकास में कृषि के माध्यम से योगदान देने वाली महिलाओं की बात करें तो लैटिन अमेरिका और कैरेबियन में इनकी संख्या 1980 की अपेक्षा 2010 तक 20 प्रतिशत, नॉर्थ इस्ट और नॉर्थ इस्ट अफ्रीका में 41 प्रतिशत साउथ एशिया में 32 प्रतिशत, पूर्व दक्षिण एशिया में 45 फीसदी और उप सहारा अफ्रीका में सबसे ज्यादा 48 प्रतिशत के आसपास है।

क्षेत्रानुसार योगदान के आंकड़ों पर एक नजर

जिन विकसित देशों में महिलाएं आर्थिक रूप से अपना योगदान दे रहीं उनमें 79 प्रतिशत महिलाएं कृषि क्षेत्र से हैं, जबकि पूरी दुनिया में यह आंकड़ा 48 प्रतिशत तक है। विकसित देशों में आर्थिक रूप से योगदान देने में 38% महिलाएं हैं जबकि पुरुष 36 प्रतिशत ही हैं। वहीं इंडस्ट्री में पुरुषों की संख्या 50 फीसदी जबकि महिलाओं की संख्या 42% ही है।

बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जिनका नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं, जबकि उनकी पहुंच को आज भी सीमित रखा गया है। अगर गांवों में महिला नेतृत्व वाले परिवारों की बात की जाए तो पूर्वी अफ्रीका के इरीट्रिया में सबसे ज्यादा 43.2 फीसदी, ज़िम्बाब्वे में 43.6, रवांडा में 34, केन्या में 33.8, कॉमोरोस में 31.9, यूगांडा में 29.3, मोजांबिक में 26.3, मालावी में 26.3, तंजानिया 25, मेडागास्कर में 20.6, इथोपिया में 20.1 प्रतिशत है, जबकि मध्य अफ्रिकन देशों गाबोन में 25.4 प्रतिशत, कांगो में 23.4, केमेरून में 22.9, कांगो में 21.8, चाड में 19.1 प्रतिशत है।

ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा काम करती हैं महिलाएं

ग्रामीण महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा घंटे काम करती हैं। जबकि महिलाएं कृषि कार्य करने के साथ-साथ घर और बच्चों की देखभाल भी करती हैं। पारिवारिक कार्य अवैतनिक ही होता है। आंकड़ों में देखें तो ओशिनिया में कृषि में महिला कर्मचारियों की संख्या 69 प्रतिशत है जबकि पारिवारिक कार्यों में लगभग 60 प्रतिशत महिलाएं व्यस्त रहती हैं। उप सहारा अफ्रीका में ये आकड़ा 60,40, दक्षिणी एशिया में 40,55, उत्तरी अफ्रीका में 40,20, पूर्वी अफ्रीका में 38,20 प्रतिशत है।

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इसके अलावा लगभग सभी देशों में कृषि कार्य कर रहीं महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा मेहनताना भी बहुत कम मिलता है। ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादातन महिलाएं खेतों में काम करने के बाद घर का भी काम करते हैं जबकि पुरुष अपना समय मनोरंजन में खपाते हैं। बावजूद इसके ग्रामीण महिलाओं को बराबरी का हक नहीं मिलता।

उच्च मूल्य वाले कृषि उद्योगों में महिला कर्मचारियों का योगदान

ज्यादा कमाई देने वाले उत्पादों में भी महिलाएं आगे हैं। कई देशों में महिलाओं की संख्या 70 प्रतिशत से भी ज्यादा है। केन्या में केले के उत्पादन में 75 प्रतिशत हिस्सेदारी महिलाओं की है। इसी तरह सेंगल में पैदा होने वाले टमाटर में 60 प्रतिशत, युगांडा के फूलों में 60, साउथ अफ्रीका में पैदा होने वाले फलों में 53 प्रतिशत शेयर महिलाओं का होता है। मैक्सिको में सब्जियों के उत्पदान में महिलाओं की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत है।

लिंग अंतर प्रमुख वजह

जमीनों पर अधिकार

ज्यादा मेहनत और उत्पादन करने के बावजूद कृषि लायक खेतों का मालिकाना हक पुरुषों के पास ही है। लैटिन अमेरिका में 80 फीसदी जमीन पर हक पुरुषों का है। एशियन देशों में तो स्थिति और खराब है। एशिया के देशों में जमीन पर महिलाओं का हक 10 प्रतिशत से भी कम है। इसके अलावा तकनीकी और नई शिक्षा के मामलों में भी महिलाओं को बराबर का अधिकार नहीं दिया जा रहा है।

हाथ से काम करने के मामले में महिलाओं की संख्या 90 फीसदी

अफ्रिकन देशों में पैदा होने वाले 250 मीट्रिक टन अनाज का 75 प्रतिशत हिस्सा छोटे किसानों से आता है। 75 प्रतिशत पैदावार में मशीनों की मदद नहीं ली जाती है। इतनी फसल पैदा करने में जो समय लगता है उसका 50 से 70 प्रतिशत हाथ से खेती करते की वजह से खर्च होता है। हाथ से की जाने वाले कृषि कार्य में 90 प्रतिशत संख्या महिलाओं की ही होती हैं। 97 देशों में केवल पांच प्रतिशत महिलाओं को ही तवज्जो दी जाती है, जबकि केवल 15 फीसदी महिलाओं को ही विशुद्ध रूप से किसान की संज्ञा दी जाती है।

कृषि में लिंग अंतर से क्या हो रहा नुकसान

आंकड़ों के मुताबिक कृषि उत्पादनों में महिलाओं का योगदान 20 से 30 प्रतिशत ही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर महिला और पुरुषों में भेद कम किया जाए तो स्थिति सुधर सकती है। अगर अंतर कम किया जाए और कृषि में महिलाओं को बराबर का दर्जा दिया जाए तो खाद्व और पोषण की समस्या को खत्म किया जा सकता है।

भारत में 6 करोड़ महिलाएं खेती के व्यवसाय से जुड़ी हैं

भारतीय जनगणना 2011 के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में छह करोड़ से ज़्यादा महिलाएं खेती के व्यवसाय से जुड़ी हैं। महिला किसान दिवस की मदद से खेती- किसानी को व्यवसाय के तौर पर अपनाने के लिए महिलाओं को जागरूक किया जाएगा। अपने क्षेत्र की कृषि में बड़े योगदान के लिए महिला कृषकों को सरकार व्दारा सम्मानित भी किया जाएगा।

इसके अलावा कृषि क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण के लिए महिला किसान दिवस के ज़रिए कई जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे। संतकबीर नगर जिले के मेंधावल गाँव की सम्मानित महिला किसान गुजराती देवी (50 वर्ष) बताती हैं,'' खेती में आज से समय में महिलाओं के पिछड़ने का सबसे बड़ा कारण तकनीकी ज्ञान की कमी है। अगर किसान महिला दिवस में सरकार महिलाओं को अाधुनिक खेती के बारे में जागरूक कर सके, तो यह प्रयास सराहनीय होगा।''

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इस वर्ष बजट में कृषि क्षेत्र में महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने की बात को प्रमुखता से उठाते हुए देश में प्रमुख कृषि वैज्ञानिकों में से एक डॉ. एमएस स्वामिनाथन ने यह बात रखी थी कि देश में खेती से जुड़े 50 फीसदी से अधिक कार्यों में महिलाएं शामिल हैं। इसके बावजूद भारत में महिला किसानों के लिए कोई बड़ी सरकारी निति नहीं बनाई गई है।ऐसे में किसान महिला दिवस के माध्यम से देश की करोड़ों महिला किसानों को मदद मिल सकेगी।

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