जब डकैतों के डर से महिलाएं घरों से नहीं निकलती थीं, ये महिला 30 एकड़ की खेती करती थी

जब डकैतों के डर से महिलाएं घरों से नहीं निकलती थीं, ये महिला  30 एकड़ की खेती करती थीट्रैक्टर चलाती इंद्रा राजपूत।

नीतू सिंह/अरविन्द सिंह परमार

ललितपुर। बुंदेलखंड में जब महिलाएं डकैतों के डर के कारण घर से बाहर निकलने में सौ बार सोचती थीं, तब जब क्षेत्र में डकैतों का तांडव हुआ करता था, वहीं उस समय भी एक चालीस वर्षीय महिला रात के 12 बजे भी अपने खेतों में बेखाैफ आया-जाया करती थी।

वो दुबली-पतली महिला इंद्रा जब साड़ी का पल्लू कमर में लपेटकर ट्रैक्टर की ड्राइविंग सीट पर सवार होकर निकलती थी तो राहगीरों की नजरें उन पर टिक सी जाती थीं। ये महिला पिछले 17 वर्षों से 30 एकड़ खेत की जुताई से लेकर कटाई तक की जिम्मेदारी खुद सम्भाल रही हैं। वो सफल महिला किसान हैं।

हम बात कर रहे हैं ललितपुर जिले की इंद्रा राजपूत की। इंद्रा अपने बारे में बताती हैं “बचपन से ही मुझे आजादी से रहने की आजादी थी। मैं जो भी काम सोच लूं उसे पूरा करके ही मानती हूँ, 12 साल की उम्र में माँ-बाप ने शादी कर दी। शादी के बाद दो तीन बार ही ससुराल गयी, मुझे घर के अन्दर रहकर चूल्हा चौका करना रास नहीं आया। इसलिए ससुराल छोड़कर मायके आ गयी, तबसे ट्रैक्टर चलाकर अपनी 30 एकड़ खेती मैं खुद ही कर रही हूँ।" इंद्रा जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर महरौनी ब्लॉक के सेतपुर गाँव की रहने वाली हैं।

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हम जब भी कभी कामकाजी महिलाओं की बात करते हैं तो हमारे मन में टैंपो, बसों में, कारों में और ट्रेनों में हर रोज़ दफ्तर जाने वाली महिलाओं की छवि अपने आप बन जाती है। लेकिन हम यह नहीं जानते कि देश में हर रोज़ खेतों में करोड़ों की संख्या में महिला किसान काम करती हैं। उन्ही करोड़ों महिलाओं में एक इंद्रा राजपूत भी हैं।

इंद्रा न सिर्फ ट्रैक्टर चलाकर 30 एकड़ खेती करने की जिम्मेदारी सम्भालती हैं बल्कि अपने क्षेत्र की महिलाओं के लिए एक मिसाल भी कायम की। देश में महिला किसानों को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने उन्हें वर्ष में अपना एक पूरा दिन दिया है। सरकार अब हर वर्ष 15 अक्टूबर का दिन महिला किसान दिवस के रूप में मानाएगी। सरकार का यह फैसला इंद्रा की तरह उन तमाम महिला किसानों के लिए अहम होगा जो वर्षों से खेती करती आ रही हैं।

इंद्रा अपने ट्रैक्टर चलाने को लेकर अपना अनुभव साझा करते हुए बताती हैं, “मुझे एक बात कभी समझ नहीं आयी कि आखिर महिला और पुरुषों का काम क्यों बांटा गया। यही सोचकर मैंने ट्रैक्टर चलाना शुरू किया, लोग हमारे बारे में क्या सोचेगे इसकी हमने कभी परवाह नहीं की।" वो आगे बताती हैं, “डर मुझे कभी लगा नहीं, आधी रात खेतों में पानी लगाना, जुताई करना ये सब हमारे लिए हमेशा से सामन्य रहा। हमारे घर में कभी रोकटोक नहीं रही, जो भी हमने करना चाहा उसे किया, आज भी चूल्हे में रोटी बनाने से कतराती हूँ।"

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गृहिणी न बनकर कुशल किसान बनी इंद्रा

बचपन से ही इंद्रा को घरेलू कार्यों में कम रूचि थी। वे पूरी जिन्दगी घर में रहकर आम महिलाओं की तरह चूल्हा चौका नहीं करना चाहती थीं। इंद्रा का कहना है, “चारदीवारी के अन्दर कैद रहना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा, ससुराल में कोई कमी नहीं थी लेकिन मुझे अपनी मर्जी से काम करने की आजादी नहीं थी इसलिए ससुराल छोड़ दिया। पिता जी की 30 एकड़ खेती थी, जिसे पहले मजदूरों से करवाया जाता था। मेरे आने के बाद इस जिम्मेदारी को मैंने खुद सम्भाला।" वो आगे बताती हैं, “मै कुशल गृहिणी तो नहीं बन पायी, पर मुझे लगता है कि मैं किसान जरूर बन गयी हूँ, कब कौन सी फसल बोनी है, कब काटनी है, जुताई करने और पानी लगाने का सही समय क्या है। खेत की तैयारी से लेकर फसल कटाई तक सबकुछ करना आता है।"

महिला किसान दिवस मनाना महिला किसानों के लिए सरकार का सराहनीय प्रयास

केन्द्रीय मंत्री राधा मोहन सिंह ने फरवरी में एक ट्वीट के माध्यम से बताया था कि देश में महिला किसानों को बढ़ावा देने के लिए अब हर वर्ष 15 अक्टूबर को महिला किसान दिवस के रूप में मनाया जाएगा। भारतीय जनगणना 2011 के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में छह करोड़ से ज़्यादा महिलाएं खेती के व्यवसाय से जुड़ी हैं। महिला किसान दिवस मनाने से खेती-किसानी को व्यवसाय के तौर पर अपनाने के लिए महिलाओं को जागरूक किया जाएगा। इतना ही नहीं अपने क्षेत्र की कृषि में बड़े योगदान के लिए महिला कृषकों को सरकार द्वारा सम्मानित भी किया जाएगा। इसके अलावा कृषि क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण के लिए महिला किसान दिवस के ज़रिए कई जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे। इस दिवस को मनाने से इंद्रा जैसी कई महिलाएं लाभान्वित होगी।

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इंद्रा ट्रैक्टर चलाने, खेत की जुताई तक ही सीमित नहीं हैं। वे ट्रैक्टर से मड़ाई-कटाई भी खुद कर लेती हैं। इंद्रा ने कहा, “ट्रैक्टर कभी हमे किसी ने सिखाया नहीं, जब ड्राइवर ट्रैक्टर चलाता हो हम ध्यान से देखते थे, इस तरह अपने आप ही ट्रैक्टर चलाना सीख लिया। ट्रैक्टर चलाने से कभी डर नहीं लगा, मड़ाई और कटाई भी खुद करती हूँ, दूसरे के खेतों में कभी चलाने का मौका नहीं मिला क्योंकि हमारे पास खुद की ही बहुत खेती है इसी खेती को करने में पूरा समय गुजर जाता है।" वो आगे बताती हैं, “खुद जुताई और मड़ाई करने डीजल का ही कम तो खर्चा आता है ही, साथ ही ये भी फायदा है कि जब जिस समय मन हो काम शुरू कर सकते हैं।”

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