नर्मदा के साथ-साथ भाग- 4 : घर छोड़ना, गाँव छोड़ना, अपना ही घर तोड़ना फिर ईंटों को ढोना

नर्मदा के साथ-साथ भाग- 4 :  घर छोड़ना, गाँव छोड़ना, अपना ही घर तोड़ना फिर ईंटों को ढोनानर्मदा यात्रा भाग - 4

‘नर्मदा के साथ-साथ’ कड़ी की ये चौथी खबर है। कारवां बढ़ता जा रहा है। कुछ नई बातें भी सामने अा रही हैं। मध्य प्रदेश से अमित की विशेष रिपोर्ट

पहला भाग यहां पढ़ें- नर्मदा के साथ-साथ : पहला दिन, कहानी जलुद की, जहाँ सौ-फीसदी पुनर्वास हो गया है

दूसरा भाग यहां पढ़ें- नर्मदा के साथ-साथ : दूसरा दिन धरमपुरी, एक मात्र डूब प्रभावित क़स्बा

तीसरा भाग - नर्मदा के साथ-साथ भाग-3 : सांयकालीन, “हरसूद था, निसरपुर हो रहा है ‘था’

जलुद गाँव की ज़मीन अगर महेश्वर बांध में डूब रही है तो उन्हें क्यों समस्या होती है? गाँव वालों की ज़मीन जा रही है, तो गाँव वालों को ही आंदोलन करना चाहिए। फिर बड़े-बड़े आयोजन होते हैं, एयर कंडीशनर गाड़ियों में घूमना-फिरना होता है, इस सबके के लिए पैसा कहाँ से आता है? जाहिर है... (आगे क्या कहा होगा, स्वंय अदांजा लगाइए)

दिल्ली से निकलते हुए ये शब्द नर्मदा के किनारे बसे जलुद गाँव में पूर्व सरपंच के भले रहे हों लेकिन हक़ीक़त में बहुत बड़ी संख्या में लोग ऐसा सोचते हैं। दिमाग में ये सब बातें थीं। इस पर चर्चा बाद में, पहले भारत का भूगोल...

उससे पहले यह एक नोट- इस कड़ी को बहुत बेतरतीब तरीके से लिखा गया है। पता नहीं क्यों।

पहले भी मैंने नर्मदा को पार किया है। पहले भी उस उत्तर से दक्षिण गया हूँ। लेकिन कभी भारत के भूगोल को इस तरह से नहीं जिया, जो इस बार जिया है। उत्तर से दक्षिण, सिंधू-गंगा के मैदान से दक्कन का पठार, विध्यन से सतपुड़ा, रिफ्ट घाटी में बहकर पश्चिम में गिरने वाली नर्मदा... भारत की इन्हीं भौगोलिक विविधताओं को याद करते हुए मध्यप्रदेश के धार जनपद से बड़वानी में पहुँच गया। नर्मदा के बाएं तट पर। इससे पहले हम नर्मदा के दांए तट पर चल रहे थे।

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यहाँ पहुँचने पर सबसे पहले यही देखना चाहता था कि क्या वाकई इस आंदोलन को विदेशी पैसे मिलते हैं? अगर हाँ, तो ये लोग किस तरह से काम करते होंगे?

बड़वानी में बस से उतरकर पाँच लोगों से नर्मदा बचाओ आंदोलन का (मुख्य) कार्यालय पूछा। तीन ने जवाब दिया। एक रिहायशी कॉलोनी में मुख्य सड़क से करीब 500-600 मीटर अंदर। 'नर्मदा आशीष'। दो गांड़िया खड़ी हैं। एक बहुत-बहुत पुरानी मार्शल जीप, लगभग 20-25 साल पुरानी तो होगी। अब ना के बराबर चलने की स्थिति में। एक बोलेरो। इसमें कोई 'एसी' नहीं है। संगीत की भी कोई व्यवस्था भी नहीं। इसके अलावा और कोई गाड़ी नहीं है नर्मदा बचाओ आंदोलन चलाने वालों के पास... यहाँ जो स्वयंसेवक मिले, उनमें से एक-दो के पास अपनी-अपनी मोटरसाइकिलें हैं। एक सोलर-सकेंद्रक भी है, लेकिन अब इसका उपयोग नहीं होता। अंदर दीवारों पर जगह-जगह अपने को आत्मनुशासन और प्रेरणादायी देने वाले निर्देश लगे हैं।

यहाँ से निकलने के पहले मैंने जो खाना खाया, या चाय पी, उसमें स्वयंसेवा जरुरी थी। स्वयंसेवा सबके लिए जरुरी है। खाने में दाल और चपातियां थीं। अचार भी था। तो 'विदेशी-पैसों' से चलने वाले आंदोलन के दफ़्तर का आखों देखा हाल कुछ यूं था! जो वहम पालने के शौकीन हैं, वे पालें, हम आगे बढ़ते हैं।

इस दिन हम कुल पाँच गाँव गए। साधन के रुप में नर्मदा बचाओ आंदोलन की वही गाड़ी थी, जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। यह विशेष मेरे लिए नहीं गई थी, दरअसल, इसमें कुछ अन्य लोग थे, जिनके साथ मैं भी एडजस्ट हो गया।

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सबसे पहला गाँव मिला पेंडरा। लोग गाड़ी पर लगे झंडे को देखते ही एक तरह से सलामी देते हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन का नीला झंडा, उनके लिए 'आशा' है। यही उनकी पहचान भी है। गाँवों में पानी देहरी तक आ चुका है। मुआवजे में जो भी पैसे मिले हैं, पीड़ित उनका अधिकतम उपयोग करना चाहते हैं, इसलिए अपने पुराने घरों की ईटों को उखाड़कर ले जा रहे हैं। फिर से पढ़िए। ईटों को उखाड़कर ले जा रहे हैं। बहुत आसान लगता है ना... संसाधनों का अधिकतम और पुनर्उपयोग कर रहे हैं? घर छोड़ना, गाँव छोड़ना, अपना ही घर तोड़ना... फिर ईंटों को ढोना...?

इतना भर तक तो हो भी चल जाए लेकिन सोंदुल गाँव में तो हद ही हो गई है। प्रशासन की नज़र में... तस्वीर को खुद ही देखिए और हद समझिए।

कहानी कुछ यूं है- एक बड़े से परिवार के दो घर, जो एक दीवार से अलग होते हैं। पूरे संयुक्त घर पर एक सा रंग है। समुद्र-तल से इनकी ऊंचाई भी समान है लेकिन यहाँ पानी कुछ यूं आएगा कि दाएं वाला हिस्सा डूब जाएगा लेकिन वाएं वाले हिस्से में एक बूंद भी नहीं आएगा! तभी तो एक को डूब प्रभावित मानकर 5.80 लाख का पैकेज दे दिया गया है, जबकि दूसरे को नहीं मिला है।

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इससे ठीक पहले मैंने गाँव की इस भीड़ में आवाज़ लगाई कि वे लोग सामने आएं जिन्हें प्लॉट भी मिल चुका है और पूरा मुआवजा भी... 25-30 लोगों की भीड़ में सिर्फ एक नाम सामने आया। शिवराम, उन्हें भी अभी सिर्फ कागज़ों में प्लॉट मिला है, फिर भी वे मान कर चल रहे हैं। जबकि सरकारें न्यायालय में दावे करती हैं कि गाँवों का मौसम तो गुलाबी हो गया है। तो... ये प्रश्न, यह लड़ाई व्यवस्था से है। दिल्ली में होने वाली विकास बनाम पर्यावरण की बहसें बेकार हैं।

अवल्दा गाँव: भिलाला आदिवासी बाहुल्य गाँव। जो प्राथमिक जानकारी हमें मिली।

अब 20 गुणा 90 का प्लॉट दिया जा रहा है।

-मुआवजा पहले बिल्कुल नहीं दिया।

-इस गाँव में 2006 और 2013 में पानी आ चुका है। 132 मीटर में ट्यूबवेल डूब जाएगा।

-गाँव में मनरेगा के काम के उदाहरण हमें नहीं मिले।

अवल्दा में चौपाल चर्चा: इस गाँव में 20 लोग गाँव छोड़कर पुनर्वास स्थल पर बस गए हैं, उनका भूअर्जन हो गया था, कुछ मुआवजा भी उन्हें मिल गया था, इसमें 5 लाख 80 हज़ार का कोई पैकेज नहीं मिला। 283 प्लॉट हैं उनमें से 13 अपात्रों ने (जो इस गाँव के नहीं हैं) जबकि इस गाँव में ही 450 परिवार रहते हैं। जनपद प्रशासन के अनुसार मई 2017 तक इस गाँव में 216 परिवार रहते हैं। जबकि हमने एक-एक चीज की गिनती करके सूची तैयार की है। इंसानों की छोड़िए, हमने किसके पास कितने पशु हैं, इसके भी एक-एक आंकड़ा हमारे पास है।

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इसका मतलब है कि अगर हम सब एक साथ चलें जाएं, जैसा सरकार और प्रशासन चाहता है तो क्या होगा? अब एक समस्या और देखिए... पूरे परिवार को एक साथ नहीं दिया गया। परिवार का विकेंद्रीकरण कर दिया गया है। समस्याएं सिर्फ इतनी ही नहीं हैं। एक मंदिर के पीछे इतने हज़ारों लोग मर गए हैं और यहाँ हर गाँव में 4-5 पूजा-स्थल डूब रहे हैं, उनकी तो कहीं कोई गिनती ही नहीं है। सरकार से हमारी यही विनती है कि जो अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, बस उतना कर दो, हम नई जगहों में बस जाएंगे।

अवल्दा के चौपाल चबूतरे पर जब यह चर्चा हो रही थी, मैं अपने हाल ही में बने मित्र से गाड़ी में बैठा-बैठा प्रश्नोत्तर के रुप में कुछ चर्चा कर रहा था। चर्चा कुछ यूं थी...

सबसे पहले तो अपना नाम बताइए...

राजपाल

किस कक्षा में पढ़ते हैं?

सातवीं

नरेंद्र मोदी कौन हैं?

वे टीवी में आते हैं

शिवराज सिंह चौहान कौन हैं?

वे भी टीवी में आते हैं। ये तो बुड्डे हो गए हैं।

स्कूल में कितने मास्टर हैं, हफ़्ते़ में कितने दिन आते हैं?

सात, जिसमें दो मैडम हैं। सब लोग रोज आते हैं।

स्कूल में खाना मिलता है? खाने में क्या मिलता है?

सब कुछ... रोटी, खिचड़ी, दाल...

दूध या अंडा?

नहीं, खीर मिलती है। हफ्ते में एक दिन।

रोटियां कितनी मिलती हैं?

दो...

सिर्फ दो? इसके बाद कोई मांगता है तो?

मास्टर कहते हैं, ख़त्म हो गईं। जिसको भूख लगती है, वह अपने घर आकर खाना खाता है।

पिछौड़ी गाँवः सीताराम नवासा के शब्द, (ये दिव्यांग हैं) 1970 में नर्मदा में बाढ़ आई थी, उस समय एक व्यक्ति ने अपनी पांच एकड़ ज़मीन देकर गाँव को फिर से बसाया था। इसका मतलब है हम पहले भी उजड़ चुके हैं।

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साल 1998 में पौने दो एकड़ ज़मीन डूब में गई, उसके बदले 50 हज़ार का मुआवजा मिला। हम संतुष्ट नहीं हुए। सर्वोच्च न्यायालय में लड़ाई लड़ी, जीते। 15 मार्च 2005 को फैसला आया। 2006 में सरकार को ज़मीन के बदले ज़मीन देने का आदेश दिया गया। लेकिन सरकार ने फिर भी हमें पैसा देकर संतुष्ट करने की कोशिश की। अब 2012 में ज़मीन मिल चुकी है। पाँच एकड़, माता जी के नाम। प्लॉट मिल चुका है। लेकिन मुआवजा नहीं मिला।

मैंने इनसे कहा कि मान लीजिए आपके सामने तुरंत अभी हाल में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आ जाएं और आपको उनसे तीन चीजें मांगने का मौका मिले तो वे क्या-क्या होंगी?

शिवराज सिंह चौहान से तीन मांगेः
-पूरे गाँव का एक जगह पुनर्वास हो।

-सबको मुआवजा मिले

-गाँव के पशुओं के लिए चरवासा, पानी की व्यवस्था

पत्रकारों से निवेदन करते हैं कि जो ज़मीन पर हक़ीक़त है, उसे बताइए बस... मेधा दीदी (पाटकार) ने 15-16 दिन अनशन किया, उसे ठीक से बताना तो दूर, पत्रकार उसके विरोध में लिखने में लगे हैं। आप बताइए जो सरकार सब कुछ अच्छा होने का दावा करती हैं, क्या आपको कहीं दिख रहा है?

विरोध करने पर पुलिस ने जो लाठियां भांजी, जिसमें पिन (कीलें) लगी थीं। सरकार कहती है कि कहीं कोई लाठीचार्ज नहीं किया गया। यह पिछौड़ी में बताया गया। ऐसे आरोप एक अन्य गाँव में भी सुनने को मिले।

पानी का हक़ः (पिछौड़ी गाँव में एक महिला, जिसका पारिवारिक धंधा मछली पकड़ना हैं) हमें 5 लाख 80 हज़ार का पैकेज नहीं चाहिए। हमें पानी चाहिए, जिसमें मछलियां मिल सकें, हमारा गुजारा हो सके, क्योंकि किसानों या अन्य धंधा करने वालों के विपरीत हमारे पास कुछ नहीं है। अगर हमने पानी छोड़ दिया था तो हम तो मर ही जाएंगे। हमारे बाप-दादा सदियों से इसी नर्मदा के किनारे रहते आया हैं, यहीं मरते आए हैं। हम ही मछली पकड़ंगे, हम ही बेचेंगे। ठेकेदार को हम नहीं घुसने देंगे। कल के दिन आप पेप्सी-कोला वाले को या अंबानी को भेजेंगे... हम उन्हें नहीं घुसने नहीं देंगे।

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नर्मदा बचाओ आंदोलन से कुछ प्रश्नः पुनर्वास और मुआवजा नीति का निर्माण ही ठीक नहीं हुआ या इसके क्रियान्वयन में समस्या है?

जैसे गाँव अभी हैं, ठीक वैसी सुविधा युक्त ऩए बसाए गए गाँव होने चाहिए। ना पानी का ठिकाना, ना बिजली का ठिकाना... सिर्फ टीन-शेड लगा दिया, कैसे रहेगा इनमें कोई? नर्मदा विकास प्राधिकरण ने आदर्श गाँव के लिए बोला था, कहाँ बसाए गए हैं आदर्श गाँव? जिन लोगों की 25 फीसदी ज़मीन गई है, उनके लिए ज़मीन का प्रावधान था, कहा है ज़मीन? ज़मीन दी भी गई तो गुजरात ले जाकर उन्हें फंसाया है। मध्यप्रदेश में सिर्फ 53 लोगों को (खेती के लिए) ज़मीन दी गई है। जो नीतियां बनाई गईं हैं, उसका एक-चौथाई भी हक़ीक़त में नहीं बनाया गया है।

ज़मीन के बदले ज़मीन देने का प्रावधान लागू करना संभव है? जैसे किसी गाँव की एक-सौ एकड़ ज़मीन अगर डूब प्रभावित हो रही है तो सरकार इतनी ज़मीन कहाँ से लाएगी? (क्या उसे जबरन अधिग्रहण करना चाहिए, हद-बंदी जैसा कुछ उपाय अपनाकर)

यह संभव है। सरकार के पास तमाम कृषि फार्म हैं, हम चाहते हैं कि कृषि-योग्य उसी भूमि को सरकार इन लोगों को उपलब्ध करवाए।

1994 में दिग्विजय सरकार ने न्यायालय का यह बताया था कि बांध की ऊंचाई 436 फीट ही रहनी चाहिए। इसको 455 फीट करने पर हम पुनर्वास कर ही नहीं पाएगें। अंत में कांग्रेस और भाजपा में इस मसले पर बहुत अंतर नहीं है। हाँ, अंतर है तो बस इतना कि उनके राज में संवाद होता था, यहाँ तो सब बंद है। संवाद से ही समाधान निकलता है।

नर्मदा के साथ-साथ श्रृंखला में मध्यप्रदेश से यह आख़िरी कड़ी है। श्रृंखला की अंतिम कड़ी गुजरात के सरदार सरोवर बाँध से होगी।

विदा मध्यप्रदेश!

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