दीपावली में बच्चों के जीवन में ‘सोलर लाइट’ से रोशनी लाया ‘चनका रेसीडेंसी’

दीपावली में बच्चों के जीवन में ‘सोलर लाइट’ से रोशनी लाया ‘चनका रेसीडेंसी’चनका रेसीडेंसी में बच्चों को सोलर लैंप बांटते पुलिस अधीक्षक निशांत कुमार तिवारी व अन्य गणमान्य लोग।

पूर्णिया (बिहार)/लखनऊ। दीपावली में इस बार बिहार के चनका गाँव में अनोखी पहल की शुरुआत की गई। चनका गाँव में इस साल दीप, मोमबत्ती और पटाखों से अलग हटकर सौर ऊर्जा के जरिए दीपावली मनाने की योजना बनाई गई। बिहार के पूर्णिया जिले से 25 किलोमीटर दूर चनका गाँव में ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने वाली 'चनका रेसीडेंसी' ने यह कोशिश की है।

त्योहार पर बच्चों को बांटी गई सोलर लालटेन

'चनका रेसीडेंसी' गाँव के आठवीं से दसवीं कक्षा तक के बच्चों को सोलर लालटेन दी गई है। 'रूरल टूरिज्म' को प्रमोट करने के लिए जिले के श्रीनगर प्रखंड के चनका गाँव में 'चनका रेसीडेंसी' चलाने वाले ब्लॉगर, लेखक और किसान गिरीन्द्र नाथ झा बताते हैं, "दीपावली त्यौहार के समय दीप, मोमबत्ती और पटाखों से अलग हटकर भी हम बहुत कुछ कर सकते हैं। इसी के तहत चनका रेसीडेंसी ने इस बार चनका के बच्चों को शाम में पढ़ाई करने के लिए सोलर लालटेन बांटी गई हैं।" गिरीन्द्र आगे बताते हैं, "इसके तहत 10 से 15 सोलर लालटेन के जरिए हमनें इस मुहिम की शुरुआत की हैं। लालटेन की तरह हल्का और एलईडी लाइट वाला यह लालटेन बहुत काम की चीज है।"

सोशल मीडिया के जरिए दोस्तों के सहयोग से योजना हुई साकार

गिरीन्द्र नाथ झा बताते हैं, "सोशल मीडिया के जरिए दोस्तों के सहयोग से कुछ फंड इकट्ठा कर 'चनका रेसीडेंसी' ने बच्चों के बीच सोलर लालटेन बांटने की योजना की शुरुआत की है। इस दीपावली एक सोलर प्लेट और एक सोलर लालटेन से हम कुछ बच्चों की आंखों तक शब्द पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।"

संबंधित खबर :- बिहार के एक गाँव में अनोखा ‘रेसीडेंसी’

"अब लिखने में आँख दर्द नहीं कर रहा है भैया"

गिरीन्द्र नाथ झा बताते हैं, "शाम में जब बच्चों को सोलर की दूधिया रौशनी में पढ़ाई करते देखा तो लगा कि हाँ, सपने साकार हो सकते हैं।" वहीं पाँचवीं में पढ़ाई कर रही काजल ने गिरीन्द्र से कहा, "अब लिखने में आँख दर्द नहीं कर रहा है भैया। अब देर रात तक कर सकते हैं। एक चीज़ और, हम सबको कोई दूसरा स्कूल घुमाने ले जाइएगा।"

बच्चों की पढ़ाई के लिए सोलर लैंप योजना

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा, "हम दीपावली में सैकड़ों रुपये पटाखों में खर्च करते हैं, लेकिन अभी भी गाँव में ऐसे कई घर हैं जहां बच्चे प्रकाश के अभाव में पढ़ाई नहीं कर पाते हैं। शाम में पढ़ाई के वक्त बिजली का अभाव रहता है, इसलिए मैंने ऐसे बच्चों तक सोलर लालटेन पहुंचाने की योजना बनाई। शिक्षा के क्षेत्र में हम सब अपने स्तर पर कुछ न कुछ कर सकते हैं। हर समस्या के लिए हम सब केवल सवाल उठा देते हैं। जबकि हम अपने स्तर पर कुछ बदलाव तो कर ही सकते हैं।

ये भी पढ़ें:- खेती से हर दिन कैसे कमाएं मुनाफा, ऑस्ट्रेलिया से लौटी इस महिला किसान से समझिए

चनका रेसीडेंसी में अलग क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल

गौरतलब है कि चनका रेसीडेंसी में साहित्य, कला, संगीत, विज्ञान और समाज के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े ऐसे लोग शामिल होते हैं, जिनकी रुचि ग्रामीण परिवेश में है। इस कार्यक्रम के जरिए गिरीन्द्र बिहार में ग्राम्य पर्यटन को बढ़ावा दे रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पूर्णिया के पुलिस अधीक्षक निशांत कुमार तिवारी की पहल से चनका में 'मेरी पाठशाला' भी चलती है, जहां शाम में बच्चे पढ़ाई करते हैं।

ये भी पढ़ें:- 9 हजार रुपये महीने कमाने वाला ये सेल्समैन आधी से ज्यादा सैलरी नए पौधे लगाने में खर्च करता है...

चनका रेसीडेंसी का क्या है उद्देश्य

आमतौर पर गाँव को लेकर हम सभी के जेहन में एक ही बात घूमती है, किसान और किसानी, लेकिन, बिहार के पूर्णिया जिले चनका में ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक किसान और लेखक गिरींद्र नाथ झा ने 'चनका रेसीडेंसी' की शुरुआत की। चनका रेसीडेंसी में साहित्य, कला, संगीत, विज्ञान और समाज के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े ऐसे लोग शामिल होते हैं, जिनकी रुचि ग्रामीण परिवेश में है। चनका रेसीडेंसी शुरू करने वाले किसान और लेखक गिरींद्र नाथ झा ने बताया, "गाँव की संस्कृति की बात हम सभी करते हैं, लेकिन गाँव में रहने से कतराते हैं। मेरी इच्छा है कि रेसीडेंसी में कला, साहित्य, पत्रकारिता और अन्य विषयों में रुचि रखने वाले लोग आएं और गाँव-घर में वक्त गुजारें। गाँव को समझे-बूझें। खेत-पथार, तलाब, कुआं, ग्राम्य गीत आदि को नजदीक से देखें।

ये भी पढ़ें:- बास्केटबॉल की एक ऐसी खिलाड़ी, जिसने व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे जीते कई गोल्ड मेडल

लोगों को आदिवासी संस्कृति से कराया जाता है रूबरू

चनका रेसीडेंसी में शामिल लोगों को गांव की आदिवासी संस्कृति, लोक संगीत, कला आदि से रू-ब-रू करवाया जाता है। बिहार में यह खुद में एक अनोखा प्रयोग है। गिरींद्र ने बताया कि वे शुरुआत में केवल एक ही गेस्ट रेसीडेंट को रखेंगे, लेकिन बाद में इसकी संख्या बढ़ाएंगे। इस रेसीडेंसी को ग्रामीण पर्यटन से जोड़कर भी देखा जा सकता है, क्योंकि इसी बहाने महानगरों में रह रहे लोग गाँव को नजदीक से समझेंगे और यहां की लोक कलाओं को जान पाएंगे, जिसके लिए वे अब तक केवल इंटरनेट पर आश्रित रहे हैं।

ये भी पढ़ें:- एक बीघा धान की खेती में लागत से लेकर मुनाफे तक का पूरा गणित, समझिए यहां...

एक डाकघर की कहानी: चिट्ठियों से लेकर ई-पोस्ट तक का सफर

Share it
Top