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आखिर इस हाल में क्यों हैं नदी जोड़ परियोजनाएं?

Suvigya JainSuvigya Jain   14 Dec 2019 12:49 PM GMT

आखिर इस हाल में क्यों हैं नदी जोड़ परियोजनाएं?

नदी जोड़ परियोजनाओं के बारे में आई नई जानकारी निराश करने वाली है। कहा गया है कि अब तक एक भी परियोजना कार्यान्वयन की स्थिति तक नहीं पहुंची है। यह जानकारी बाकायदा संसद की एक समिति की तरफ से दी गई है। जल संसाधन संबधी स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा में पेश की है। इसीके बाद पता चला कि नदियों को आपस में जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का इस समय क्या हाल है।

जल संकट के इस काल में किसानों को सिंचाई का पानी मुहैया कराने का दिलासा देने के लिए इन परियोजनाओं का ऐलान हुआ था। कुछ साल से इन्ही परियोजनाओं का नाम लेकर कहा जा रहा था कि सूखे और बाढ़ की समस्या का यही उपाय है। गाहे बगाहे यह भी बताया जाता रहा कि परियोजनाओं पर काम चल रहा है। खासतौर पर बेतवा केन नदी जोड़ परियोजना को तीन साल पहले ऐसे बताया जा रहा था जैसे यह परियोजना चालू ही होने वाली है और जल्द ही बुंदेलखंड के बदहाल किसानों के दिन बहुर जाएंगे। लेकिन अब अचानक पता चला है कि बेतवा केन, दमन गंगा पिंजल, पार तापी नर्मदा, और गोदावरी कावेरी नदी जोड़ परियोजनाओं के मामले में तो संबंधित राज्यों के बीच सहमति बनने का काम तक नहीं हो पाया। कहा जरूर गया है कि सहमति बनाने की कोशिश हो रही है।

हालांकि कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट की कमिटी (सी.ई.सी.) ने केन बेतवा जोड़ परियोजना के आर्थिक रूप से व्यावहारिक होने पर ही सवाल उठा दिए थे। परियोजना से होने वाले पर्यावरण और वनजीवों को नुकसान का ब्योरा भी उस रिपोर्ट में दिया गया था। अब जब संसदीय कमिटी की रिपोर्ट आई है तब यह साफ हो जाता है कि परियोजनाओं पर काम शुरू हो पाना अभी दूर की ही बात है। क्योंकि सालों से प्रस्तावित ज्यादातर नदी जोड़ परियोजनाएं पूर्व व्यावहार्यता रिपोर्ट, व्यावहार्यता रिपोर्ट के स्तर पर ही हैं। सिर्फ कुछ की ही डीपीआर यानी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट बन सकी है।



नदी जोड़ परियोजनाओं के जरिए किसानों को पानी का आश्वासन देते हुए देश में कई परियोजनाओं का ऐलान किया गया था। यह विचार वैसे नया नहीं था। सन 1980 में तब के सिंचाई मंत्रालय ने एक नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान बनाया था। जिसमें जिन बेसिन में अधिशेष पानी रहता है वहां से पानी के कमी वाले इलाकों तक पानी पहुंचाने की बात थी। उस योजना के अंदर 30 नदी जोड़ कार्यक्रमों को चिन्हित किया गया था जिनमें 14 देश के उत्तरी हिस्से में थीं जिन्हें हिमालयी घटक कहा गया था।

सोलह परियोजनाएं प्रायद्वीप भारत क्षेत्र की नदियों के लिए थीं जिन्हें प्रायद्वीप घटक कहा जाता है। आज भी कमोबेश उन्हीं नदी जोड़ परियोजनाओं पर सरकार काम करने की बात कर रही है। निराश करने वाली बात यह है कि इनमें से एक भी परियोजना अभी तक काम का श्रीगणेश होने की अवस्था तक नहीं पहुंच पाई है। क्रियान्वन तो दूर की बात है इतने सालों में ज्यादातर परियोजना की कागज पर डीपीआर तक नहीं बन पाई।

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संसद की समिति की रिपोर्ट में कही बातों में जिन्हें मीडिया ने इंगित किया है उनमें एक बात इन परियोजनाओं के लिए धन आबंटन के प्रावधान के बारे में भी है। बेशक यह बात गौरतलब है। समिति ने कहा है कि इन परियोजनाओं के लिए अब तक सांकेतिक बजटीय प्रावधान ही किए गए हैं। लेकिन मीडिया के समाचार विश्लेषणों में इस सांकेतिक बजटीय प्रावधान के बारे में ज्यादा नहीं कहा गया। जबकि यह बिल्कुल उजागर तथ्य है कि जल प्रबंधन परियोजनाएं भरे पूरे बजट प्रावधानों से ही शुरू हो सकती हैं। हो सकता है कि दो चार दिन बाद यह हिसाब भी लगाया जाने लगे कि देश भर में एलान की गईं सभी नदी जोड़ परियोजनाओं का खर्चा क्या बैठ रहा है और उतने धन का प्रबंध कैसे किया जा पाएगा ?

वैसे इतना जरूर कहा जा रहा है कि एक अकेली केन बेतवा जोड़ परियोजना ही कोई 28 हजार करोड़ की है। इससे भी सभी परियोजनाओं के कुल खर्च का मोटा अनुमान लगाया जा सकता है। हालांकि अब तक का अनुभव यह है कि जल परियोजनाओं की अनुमानित लागत का हिसाब हमेशा ही गड़बड़ा जाता है। पिछले कुछ वर्षों में शायद ही कोई परियोजना समय पर पूरी हो पाई हो। बहरहाल अभी मामला इन परियोजनाओं के पूरी होने में देरी का नहीं बल्कि उनके शुरू हाने का है। और इसके आसार भी अभी तो दिखाई नहीं दे रहे।

वैसे यह कोई बहुत ज्यादा निराशाजनक बात नहीं मानी जानी चाहिए। क्योंकि यह काम आसान नहीं था। अगर आसान होता तो नदी जोड़ की संकल्पना को मूर्त रूप देने में 161 साल न लगते। कहते हैं नदी जोड़ का विचार अंग्रेज़ों के जमाने में इंजीनियर आर्थर कॉटन के दिमाग में आया था। उसके बाद आजाद भारत में सत्तर के दशक में तबके जल संसाधन मंत्री केएल राव ने इस विचार को आगे बढ़ाया।


बहरहाल, इन डेढ़ सौ साल में बीच बीच में नदी जोड़ की बातें उठती रहीं और बैठती रहीं। पिछले चार पांच साल से यह विचार बड़े जोरशोर से फिर उठा था। इस तरह से उठा था कि लगने लगा था कि यह काम शुरू हो ही जाएगा। लेकिन अचानक संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट से पता चल रहा है कि इस काम के शुरू होने में अभी तो पक्षकार राज्यों के बीच सहमति बनना ही बाकी है। इन परियोजनाओं के लिए खर्च का इंतजाम होना भी बाकी है।

रही बात सबसे जरूरी चीज खर्च के इंतजाम की तो संसद की समिति ने कहा है कि जब कभी भी इन परियोजनाओं को कार्यान्वित किया जाएगा तब बजट में उसके लिए उपयुक्त रकम का प्रावधान किया जाएगा। वैसे आमतौर पर बजट का प्रावधान होने के बाद परियोजनाएं बड़ी तेजी से कार्यान्वयन की ओर भागने लगती हैं। सांकेतिक बजट की बजाए अगर न्यूनतम बजट आंबंटन भी हो जाए तो पक्षकार राज्यों को अपने हित भी दिखने लग सकते हैं। प्रस्तावित जल बंटवारे और बनने वाली अतिरिक्त बिजली के उपभोग को लेकर राज्यों के बीच सहमति बनने में ज्यादा झंझट होगी नहीं। इसके कुछ आधार हैं।

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1980 के नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान के मुताबिक नदी जोड़ परियोजनाओं से 185 अरब घनमीटर अतिरिक्त वर्षा जल को सिंचाई के लिए भंडारित करने की क्षमता बढ़ेगी। अभी देश में सारे बांधों जलाशयों में वर्षा का सिर्फ 257 अरब घनमीटर पानी ही भंडारित हो पाता है। यानी इन परियोजनाओं के जरिए देश में पौने दो गुना पानी इस्तेमाल के लिए उपलब्ध होने लगेगा। ये पानी हर साल बाढ़ की तबाही मचाता हुआ वापस समुद्र में चला जाता है। इन परियोजनाओं से भंडारित हुआ 185 अरब घनमीटर पानी साढे़ तीन करोड़ हैक्टेअर खेती की असंचित जमीन को सिंचित जमीन में तब्दील कर देगा।

इतना ही नहीं नदी जोड़ परियोजनाएं 40,000 मेगावाट पनबिजली उत्पादन सुनिश्चित करने वाली हैं। अभी यह हिसाब लगा नहीं है कि इतनी पनबिजली पर्यावरण के बचाव में कितनी बड़ी भूमिका निमाएगी। यानी कोयले से बनने वाली बिजली पर निर्भरता कम होगी। बाढ़ और सूखे से होने वाली तबाही से बचाव के रूप में बड़ा भारी फायदा होना तय है।

हिसाब देखें तो नदी जोड़ परियोजनाओं से लाभ ही लाभ दिखाई देता है, लेकिन देखना लागत को भी पड़ेगा। अगर लाभ लागत का अनुपात सही बैठता है तो इन परियोजनाओं के लिए धन तो कहीं से भी आ जाएगा। और अगर लागत लाभ से ज्याद बैठती है तो नदी जोड़ो परियोजना के नारे को चलाए रखना बेकार की बात है। देश के मौजूदा आर्थिक हालात के मददेनजर यह ऐलान करने में हिचकना नहीं चाहिए कि नदी जोड़ परियोजनाओं के लिए अभी ज़रा और रूकना पड़ेगा।


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