गिरती जीडीपी की चिंता में कृषि क्षेत्र फिर हाशिए पर

Suvigya JainSuvigya Jain   30 Nov 2019 8:07 AM GMT

गिरती जीडीपी की चिंता में कृषि क्षेत्र फिर हाशिए पर

देश की माली हालत बताने वाले नए आंकड़े चिंताजनक हैं। इस साल की दूसरी तिमाही के आंकड़ों में जीडीपी की दर और नीचे चली आई है। पिछली तिमाही में यह पांच फीसदी तक आ गई थी लेकिन इस बार और घटकर साढ़े चार फीसद रह गई है। वैसे यह कोई अचानक घटी घटना नहीं है। पिछले छह महीने से देश में आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती बढ़ती ही जा रही थी। खासतौर पर औद्योगिक क्षेत्र के गिरते आंकड़े देखकर विशेषज्ञों के लिए हैरान होने का कोई कारण नहीं है। क्योंकि औद्योगिक उत्पादन घटने की खबरें कई तिमाहियों से बढ़ रही थीं। लेकिन कृषि क्षेत्र की वृद्धिदर पिछले साल की दूसरी तिमाही के 4 दशमलव 9 फीसद से घटकर इस साल की दूसरी तिमाही में सिर्फ 2 दशमलव एक फीसद बची है। यह आंकड़ा हद से ज्यादा चैंकाने वाला है। लेकिन यह एक बड़ा रहस्य है कि इसकी चर्चा और विश्लेषण होते नहीं दिख रहे।

तीन महीने पहले की ही बात है। बात उठी थी कि गांवों में रोजमर्रा की जरूरत की चीजों की खपत घट रही है। हमें तभी समझ जाना चाहिए था कि देश में आर्थिक गतिविघियों पर आगे क्या असर पड़ने वाला है। उसके बाद पांच रूपए वाले बिस्किट के पैकेट की बिक्री घट जाने की खबर ने चैंकाया था। जिससे पता चल रहा था कि गरीबों और गांव वालों की जेब की क्या हालत हो गई है। तब वह बात आई गई भले हो गई हो लेकिन आज जब देश में जीडीपी के नए आंकड़े आए हैं तब हमें उन खबरों को याद करना चाहिए। हम उन्हें अर्थतंत्र का थर्मामीटर मानकर सचेत हो सकते थे। वैसे सचेत अभी भी हो सकते है।

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इस समय विशेषज्ञों की राय यह बन रही है कि देश में खपत बढ़ाए बगैर यानी उपभोग बढ़ाए बगैर आर्थिक गाड़ी को फिर से पटरी पर लाया जाना मुश्किल है। बात सही भी है। क्योंकि अगर उत्पाद बिकेगा ही नहीं तो बनेगा कैसा। यानी सिर्फ उत्पादन बढ़ाने से काम नहीं चलता। बल्कि मांग बढ़ना जरूरी है। उपभोक्ताओं की मांग तब बढ़ती है जब उसके जेब में पैसे हों। इस तरह कहा जा सकता है कि घटती जीडीपी का कारण अधिसंख्य आबादी की जेब में पैसे कम हो जाना है। यह दोहराने की जरूरत नहीं कि देश की आधी से ज्यादा आबादी अभी भी गांव में रहती है और इस आबादी में ज्यादातर किसान हैं। और इन सबकी मुफलिसी दिन पर दिन बढ़ती जा रही है।

गौरतलब है कि इस साल बारिश की बेतरतीब चाल और कई क्षेत्रों में फसल बर्बाद होने के बाद तुरंत राहत पहुंचाने पर किसी सरकार ने मुस्तैदी नहीं दिखाई। जबकि इस आपदा का एक इस्तेमाल अर्थतंत्र को पुनर्जीवित करने के एक मौके के तौर पर भी किया जा सकता था। कृषि क्षेत्र की वृद्धिदर 4 दशमलव 9 फीसद से धटकर 2 दशमलव एक फीसद रह जाना कृषि गतिविघियों का कम होने और फसल बर्बादी का नतीजा भी माना जा सकता है। लेकिन कृषि विशेषज्ञों और विश्लेषकों ने कृषि वृद्धिदर में भारी गिरावट पर चर्चा शुरू ही नहीं की है। पूरा ध्यान औद्योगिक क्षेत्र के आठ बुनियादी उपक्षेत्रों में गिरावट पर ही लगा दिख रहा है। दरअसल मसला औद्योगिक क्षेत्र के लिए और ज्यादा राहत पैकेज की तैयारी का दिख रहा है।

हो सकता है कि कृषि पर ध्यान अगली तिमाही के आंकड़ों के बाद जाए। तभी समझ आएगा कि औद्योगिक उत्पाद की मांग बढ़ाने का एक तरीका गांव और किसान की माली हालत सुधारने का भी है। हालांकि तब तक देर हो चुकी होगी। क्योंकि सरकारी खर्च की भी एक सीमा है। वह गुंजाइश उद्योगजगत को मदद पहुंचाने में खत्म हो चुकी होगी। अभी सारा घ्यान कारपोरेट टैक्स कम करने, रियल एस्टेट और आटो क्षेत्र को राहत पहुंचाने में ही लगाया गया है और उसी पर इतना भारी भरकम खर्च हो चुका है कि दूसरे क्षेत्रों पर खर्च के आसार ही कम हो गए हैं।

विनिर्माण क्षेत्र के लिए बैंकों के दरवाजे और ज्यादा खोलने की कवायद का भी कोई नतीजा आता नज़र नहीं आ रहा है। मंदी के मारे उद्योग जगत इतना डरा हुआ है कि वह कर्ज लेकर उत्पादन बढ़ाने का जोखिम लेता नहीं दिखता। किस्सा वहां भी मांग का घटना है। जब उपभोक्ता पर घ्यान नहीं दिया जाता तब सारे उत्पाद धरे रह जाते हैं। उपभोक्ताओं का कमजोर पड़ जाना मंदी का सबसे बड़ा लक्षण है। मंदी की सबसे सरल परिभाषा यही मानी जाती है।

ऐसा भी नहीं कि गांव और किसान पर बिल्कुल भी नही दिया गया। इस साल आम चुनाव के पहले जब किसानों को पांच सौ रूप्ए महीने दिए जाने का एलान हुआ था तो उसके पीछे जितने भी तर्क दिए गए उनमें एक तर्क यह भी था कि गांव तक 90 हजार करोड़ पहुंचेगे। गांव वाले बाजार जाकर खर्च करेंगे और आर्थिक चक्के को कुछ तेज हाने का मौका बनेगा। वैसे तो 135 करोड़ आबादी के लिए यह रकम कोई ज्यादा बड़ी नहीं थी फिर भी इसका असर कुछ न कुछ जरूर पड़ता। इस समय यह बात करने की जरूरत है कि साल भर में 90 हजार करोड़ गांव तक पहुंचाने का यह लक्ष्य कितना पूरा हुआ। इस आंकड़े को अलग से जारी करने की दरकार है कि किसान मानधन की कितनी रकम गांव की जेब तक पहुंची है।

किसान मानधन अपनी जगह है। लेकिन किसान की अपनी मेहनत से उगी फसल का कितना दाम उसे मिल पा रहा है? उसकी आमदनी का क्या हाल है? अगर वह अपनी जरूरत का सामान खरीदने के लिए शहर आना कम करता जा रहा है तो देश में आर्थिक सुस्ती का एक कारण तो यह माना ही जाना चाहिए। हम कितना भी कहते रहें कि देश की जीडीपी में कृषि का योगदान सिर्फ 15 फीसद के करीब है सो उसे लेकर ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके उत्पाद का वाजिब दाम लगाकर चलें तो यह आंकड़ा देश के विनिर्माण क्षेत्र के उत्पादन को टक्कर देता नज़र आने लगेगा। और अगर मंदी को बेरोज़गारी की समस्या से जोड़कर देखना चाहें तो गांव में बढ़ती बेरोज़गारी की फौज योजनाकारों के हाथपैर फुला सकती है। याद दिलाया जा सकता है कि देश की आबादी का 75 फीसद हिस्सा आज भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप् से कृषि संबंधी गतिविधियों में लगा है। इसीलिए कुछ अर्थशास्त्री कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ यूं ही नहीं कहते रहे हैं।

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