'घोषणा पत्र में शामिल होने चाहिए थे ये महिला मुद्दे'

भारत के प्रमुख महिला संगठनों ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर सभी राजनैतिक दलों के सामने कुछ मांगें रखी थीं। तैंतीस प्रतिशत आरक्षण, शहरों में रोज़गार गारन्टी, महिलाओं के लिए 2000 रुपए प्रतिमाह पेंशन के साथ और भी कई महत्वपूर्ण मुद्दों को इस विज्ञप्ति में मिली है जगह।

Pragya BhartiPragya Bharti   16 April 2019 1:25 PM GMT

लखनऊ। लोकसभा 2019 के चुनाव शुरू हो गए हैं। प्रथम चरण का मतदान पूरा हो गया है और 18 अप्रैल को दूसरे का चरण का मतदान होने वाले हैं। इन चुनावों में महिला मुद्दों को लेकर अखिल भारतीय लोकतांत्रिक महिला संगठन (AIDWA) के साथ भारत के प्रमुख महिला संगठनों ने सभी राजनैतिक दलों के समक्ष कुछ मांगे रखी थीं। उन्होंने 14 मार्च को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपनी मांगों का ज़िक्र किया था।

गाँव कनेक्शन से फोन पर बात करते हुए एआईडीडब्ल्यूए के उत्तर प्रदेश राज्य की प्रदेश अध्यक्ष मधु गर्ग बताती हैं-

"भारत में महिलाओं की आधी आबादी हैं लेकिन महिलाओं के मुद्दों को कभी लिया ही नहीं जाता है। एक लाइन में खत्म कर दिया जाता है, इसलिए हम चाहते हैं कि सभी राजनैतिक दलों के घोषणा पत्र जेंडर सेंसेटिव (लैंगिक रूप से संवेदनशील) हों।"


एआईडीडब्ल्यूए ने मांग की थी कि राजनैतिक दल अपने घोषणा पत्रों में महिला मुद्दों को जगह दें। अखिल भारतीय दलित महिला अधिकार मंच (AIDMAM), अखिल भारतीय महिला सांस्कृतिक संगठन (AIMSS), अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन (AIPWA), गिल्ड ऑफ सर्विस, मुस्लिम महिला फोरम (MWF), राष्ट्रीय भारतीय महिला महासंघ (NFIW) और पुरोगामी महिला संगठन (PMS) ने भी एआईडीडब्ल्यूए की मांगों का समर्थन किया था।

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मधु गर्ग कहती हैं कि, "33 प्रतिशत आरक्षण के लिए हम लोग 15-16 सालों से लड़ रहे हैं लेकिन अभी तक उस पर कोई फैसला नहीं हुआ है। महिलाओं के मत तो आप ले लेते हैं लेकिन उनकी परेशानियों पर ध्यान नहीं देते।"

महिलाओं के मांग-पत्र में ये प्रमुख बातें कही गईं-

1. संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण

महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की बात पिछले दशक से भी ज़्यादा समय से चल रही है। 9 मार्च 2010 को ये महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में पास हो गया था लेकिन लोकसभा में ये बिल कभी पेश ही नहीं हुआ। हर चुनावों में राजनैतिक दल वादा करते हैं कि महिलाओं के आरक्षण बिल को पास किया जाएगा लेकिन अभी तक इस बिल पर सुनवाई नहीं हो पाई है। भारतीय जनता पार्टी ने साल 2014 में हुए आमचुनावों में भी इस बिल को पास करने का वादा किया था। इस बार के भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के घोषणा पत्रों में भी इसका ज़िक्र है लेकिन क्या पता ये बिल कब पास हो पाएगा।


2. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में केवल वो लोग न रहें जो टैक्स भरते हैं, बाकी सभी लोगों को इसमें शामिल किया जाए। सभी घरों को कम से कम 35 किलो अनाज दिया जाए। सभी का राशन कॉर्ड हो, खासकर, अकेली महिलाओं, असंगठित क्षेत्रों के मजदूर, विक्लांगों, प्रवासियों और सड़क पर दुकान लगाने वाले लोगों का।

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3. शहरों में रोज़गार गारन्टी एक्ट लागू हो

सेन्टर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी प्राइवेट लिमिटेड के कंस्यूमर पिरामिड्स हाउसहोल्ड सर्वे के मुताबिक वर्ष 2016 में पुरूष मजदूरों की दर 74.5% थी। वर्ष 2017 में ये घट कर 72.4% हो गई और 2018 में 71.7% रह गई। वहीं महिला मजदूरों की संख्या वर्ष 2016 में 15.5% थी। वर्ष 2017 में 11.9% और 2018 में केवल 11% रह गई। ये आंकड़े साफ ज़ाहिर करते हैं की रोज़गार की दर साल 2016 से 2018 के बीच लगातार कम हुई है।

ग्रामीण क्षेत्र के मुकाबले शहरी क्षेत्रों में महिला मजदूरों की संख्या में ज़्यादा गिरावट आई है। शहरी इलाकों में वर्ष 2016 में जहां उनकी संख्या 15.2 प्रतिशत थी तो वहीं वर्ष 2018 में ये घट कर 10.5 प्रतिशत रह गई। ग्रामीण क्षेत्रों में वर्ष 2016 में 15.6 प्रतिशत महिला मजदूर थीं। वर्ष 2018 में इनकी संख्या केवल 11.3 प्रतिशत रह गई।


सेन्टर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी प्राइवेट लिमिटेड (Centre for Monitoring Indian Economy Pvt. Ltd.) 1976 से संचालित एक निजी संगठन है जो व्यापार के बारे में जानकारी मुहैया कराने का काम करती है।

शहरों में महिला मज़दूरों की संख्या में अधिक गिरावट देखी गई है।

4. पचपन साल से अधिक उम्र की महिलाओं को दो हज़ार रुपए प्रतिमाह पेंशन दी जाए। साथ ही विधवा और विक्लांग महिलाओं को बिना किसी उम्र की बंदिश के पेंशन दी जानी चाहिए।

data.gov.in वेबसाइट के मुताबिक, साल 2015 से 16 के बीच भारत में वृद्धावस्था पेंशन के लिए पांच लाख 56 हज़ार 269.0696 रुपए खर्च किए गए। वृद्धावस्था पेंशन में सरकार हर राज्य में अलग-अलग जिलावार तरीके से वृद्ध लोगों को पेंशन देती है। किसी राज्य में 200, 300 तो अब किन्हीं राज्यों में 600 रुपए तक वृद्धावस्था पेंशन के रुप में दिए जा रहे हैं।

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5. भूमिहीन परिवारों को महिलाओं के संयुक्त पट्टे के साथ अतिरिक्त सीलिंग ज़मीन दी जाए।

नेशनल काउंसिल ऑफ अपलाएड इकॉनमिक रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के कृषि क्षेत्र में 42 प्रतिशत महिलाएं हैं लेकिन केवल दो प्रतिशत महिलाएं हैं जिनके नाम खेतिहर ज़मीन है।


6. महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में जल्द-से-जल्द सुनवाई हो। ऑनर किलिंग के नाम पर होने वाले अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की साल 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं के विरूद्ध 3 लाख 38 हज़ार 954 अपराध रजिस्टर किए गए थे। साथ ही महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर 55.2 फीसदी है। ये दर साल 2015 से 16 के बीच 2.9 प्रतिशत की दर से बढ़ी है।

महिलाओं के खिलाफ दर्ज किए गए अपराधों में सबसे अधिक 32.6 प्रतिशत अपराध महिला के पति या जान पहचान वाले व्यक्ति द्वारा किए गए हैं। महिला को अपमानित करने की मंशा से किए गए अपराधों की संख्या 25 प्रतिशत है तो वहीं महिलाओं के अपहरण और बलात्कार की घटनाएं 19 प्रतिशत हैं।


7. महिलाओं और बच्चों को मानव तस्करी से बचाने के लिए सख्त कानून हों।

एआईडीडब्ल्यूए महिलाओं और बच्चों को मानव तस्करी से बचाने के लिए सख्त कानूनों की मांग करता है। data.gov.in वेबसाइट के मुताबिक, साल 2016 में 23 हज़ार 117 इन्सानों की तस्करी की गई। इनमें से 4980 महिलाओं की यौन शोषण के लिए तस्करी की गई थी।

इन मुख्य मुद्दों में से 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को छोड़ दिया जाए तो और किसी भी मुद्दे को भारत की प्रमुख राजनैतिक पार्टियों ने अपने घोषणा पत्रों में शामिल नहीं किया है। हालांकि, कांग्रेस ने महिलाओं को समान वेतन देने की बात कही तो वहीं भाजपा ने महिलाओं के आर्थिक विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धता बढ़ाने का ज़िक्र किया था।


महिलाओं के मुद्दों पर भाजपा और कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्रों में क्या कहा - महिला सुरक्षा: घोषणा पत्र में जगह लेकिन कितनी कारगर योजनाएं?



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