ढाक के तीन पात वाली कहावत सुनी होगी, लेकिन ये पत्ते सैकड़ों लोगों की कमाई का जरिया भी है

ढाक के तीन पात वाली कहावत सुनी होगी, लेकिन ये पत्ते सैकड़ों लोगों की कमाई का जरिया भी हैबदलते वक्त के साथ ही इनके हुनरमन्द हाथों ने कमाई के दूसरे माध्यम खोज लिए।

स्वयं कम्युनिटी जर्नलिस्ट

बाराबंकी। जिला मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर विशुनपुर कस्बे के पथरकट मोहल्ले के लोगों के लिए ढाक के पत्ते रोजगार का जरिया बने हुए हैं। करीब एक दशक पूर्व पत्थर का पुश्तैनी धंधा ठप हो जाने के बाद पत्थरकटों के सामने रोजी-रोटी की समस्या खड़ी हो गई थी।

बदलते वक्त के साथ ही इनके हुनरमन्द हाथों ने कमाई के दूसरे माध्यम खोज लिए। घर के पुरुष जहां अन्य धंधों में जुट गए वहीं महिलाओं ने ढाक के पत्तों से पत्तल बनाकर परिवार की आमदनी में हाथ बंटाने का जरिया ढूंढ निकाला है। ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी बिक्री कर आज यह महिलाएं अपने परिवार की गाड़ी खींचने में अपनी भूमिका निभा रही हैं। पथरकट टोला निवासी सुशीला (40 वर्ष) बताती हैं, “घर के पुरुष जंगलों से ढाक के पत्ते तोड़ लाते हैं।

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फिर घर की महिलाएं इनसे पत्तल का निर्माण करती हैं। लगन के दौरान गाँवों में इनकी बिक्री हो जाती है, जिससे थोडा बहुत खर्च चल जाता है।” कस्बे का पथरकट टोला कभी छेनी हथौड़ी की खटखट से गुलजार रहता था। वक्त बदलने के साथ पत्थर से बनने वाली सिल-बट्टा, दराती आदि की मांग नगण्य हो गई। आधुनिकता की मार से ज्यादातर हुनरमन्द हाथ बेरोजगार हो गए। घर के पुरुष सदस्यों ने रोजगार के अन्य जरिये खोज लिए।

वहीं महिलाएं ढाक के पत्तों से पत्तल निर्माण के रोजगार में जुट गईं। हालांकि यह धंधा भी आधुनिकता की चपेट में है फिर भी लगन के दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी बिक्री कर यह परिवार अपने घर का खर्च चलाने भर की आमदनी कर लेती हैं। वहीं आशा (35 वर्ष) बताती हैं, “घर में खाली बैठने के बजाय मोहल्ले की ज्यादातर महिलाएं पत्तल बनाने का काम करती हैं। वर्तमान में इनकी मांग तो कम हुई है फिर भी खर्च भर की पत्तल बिक जाती है।” 40 से 50 रुपए सैकड़ा बिकने वाली यह पत्तल सहालग भर इन परिवारों की कमाई का जरिया बनी हैं।

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