गहने बेच कर शुरू किया महिला मजदूर ने मुर्गी पालन, अब कमा रही मुनाफा

गहने बेच कर शुरू किया महिला मजदूर ने मुर्गी पालन, अब कमा रही मुनाफामुर्गी पालन करती सूरसती देवी।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

बरसठी(जौनपुर)। मजदूरी करके ऊब चुकी एक मजदूर महिला ने जैसे-तैसे पैसों का इंतजाम करके मुर्गी पालन का व्यवसाय शुरू किया । आज वो सिर्फ 40 दिन में अच्छा मुनाफा कमाकर अपनी बेटियों को पढ़ा रही है ।

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"दूसरों के खेत में मजदूरी करते थे दिन के 100-150 रुपए मिल जाते थे, इतने पैसे से दो वक्त की रोटी ही चलाना मुश्किल था, गहने और समूह के पैसे से मुर्गी पालन शुरू किया ।" ये कहना है जौनपुर जिले की रहने वाली सूरसती देवी (40 वर्ष) का ।वो आगे बताती हैं, "ज्यादा खेत नहीं हैं हमारे पास ,पहले हर दिन मजदूरी न मिलने की चिंता रहती थी ,जबसे मुर्गी पालन शुरू किया है मजदूरी की चिंता खत्म हो गयी है,40 दिन में पूरी लागत निकालकर 30-40 हजार रुपए भाव के हिसाब से बच जातें हैं, इतना पैसा मजदूरी करने पर बचाना हम सोंच भी नहीं सकते थे ।"

सूरसती देवी

जौनपुर जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर बरसठी ब्लॉक के बेलौना गाँव की रहने वाली सूरसती देवी एक मजदूर महिला है जिसके पास अपने खुद के ज्यादा खेत नहीं हैं । कई वर्षों से मजदूरी कर रही सूरसती की चार लड़कियां और एक लड़का है ।मजदूरी करके सबका पालन पोषण करना इनके लिए मुश्किल था ।

सूरसती महिला समाख्या के स्वयं सहायता समूह से जुड़ी एक महिला हैं ,जिसमे हर महीने अपने बचत के कुछ पैसे जमा करती हैं । घर का बढ़ता खर्चा देख सूरसती ने जब समूह में अपनी बात रखी और कुछ रोजगार करने को कहा ।महिलाओं के द्वारा जमा किये उस समूह से उधार पैसा लेकर महिला समाख्या की सलाह पर मुर्गी पालन शुरू किया ।

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सूरसती बताती हैं, "हमारा पूरा परिवार मुर्गी फॉर्म पर देखरेख करता हैं,हमे 40 रुपये में एक मुर्गी का बच्चा मिलता है,40 दिन में खिला -पिलाकर 80-100 रुपये में बिक जाता है ।" वो आगे बताती हैं, "एक बार में 1600 मुर्गी के बच्चे पालते हैं,इतना कमा लेते हैं कि हमारे बच्चे अच्छे से पढ़ सकें और घर का खर्चा चल सके ।"सूरसती का कहना है, "हमारे लिए ये काम करना बहुत मुश्किल था,सब बहनों की मदद से शुरू कर दिया,आज अच्छे से खर्चे चल रहे हैं ।"

वो आगे बताती हैं,"दूसरों के खेत की मजदूरी करना बच गया,हमे मुर्गी खरीदने कहीं जाना नहीं पड़ता है,एक प्राइवेट कंपनी मुर्गी से लेकर उनके खाने तक का सारा सामान देकर जाती है ,बच्चे भी यहीं से खरीद ले जाती हैं,हमे सिर्फ देखरेख करनी होती है ।"

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